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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Uttarakhand: 58 Percent of the border-region Darma Valley is on the verge of landslides, reveals Wadia Institu

उत्तराखंड: सीमांत दारमा वैली का 58 फीसदी इलाका भूस्खलन के मुहाने पर, वाडिया संस्थान के अध्ययन में हुआ खुलासा

Sun, 30 Aug 2026 11:50 AM IST
Alka Tyagi विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Alka Tyagi Updated Sun, 30 Aug 2026 11:50 AM IST
सार

वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने 1364 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन दो साल पहले शुरू किया था। इस दौरान अध्ययन में भूस्खलन को लेकर जो बातें सामने आईं उन्होंने वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ा दी।

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Uttarakhand: 58 Percent of the border-region Darma Valley is on the verge of landslides, reveals Wadia Institu
दारमा वैली - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पिथौरागढ़ जिले की सीमांत दारमा वैली (घाटी) में भूस्खलन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (देहरादून) के हालिया अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इस घाटी का 58 प्रतिशत इलाका भूस्खलन की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 वर्षों (2015 से 2025) के भीतर ही यहां भूस्खलन की 295 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिहाज से भी यह घाटी बहुत महत्वपूर्ण है।

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अध्ययन दल में शामिल वैज्ञानिक मो. शावेज ने बताया कि दारमा वैली में 4000 मीटर की ऊंचाई तक आबादी बसी हुई है। शोध के दौरान घाटी में एक किलोमीटर से लेकर 700 मीटर तक के दायरे वाले कई भूस्खलन क्षेत्र मिले हैं। इस महत्वपूर्ण शोध में मो. शावेज के साथ वैज्ञानिक संदीप कुमार, विक्रम गुप्ता, प्रवीण कुमार और गौतम रावत शामिल रहे। 

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तीखा ढलान और दरकते पहाड़ बढ़ा रहे खतरा

भूस्खलन के लिए ढलान, ऊंचाई और ड्रेनेज व्यवस्था समेत 15 मुख्य कारणों की पहचान की गई है। घाटी में 45 से 55 डिग्री का तीखा ढलान है, जो खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। इसके अलावा दक्षिण दिशा की तरफ वाले पहाड़ों पर दिन में धूप अधिक देर तक रहने से चट्टानें गर्म हो जाती हैं और रात में अत्यधिक ठंड के कारण सिकुड़ती हैं। इस प्रक्रिया से पहाड़ों में दरारें आ रही हैं, जो भूस्खलन का बड़ा कारण बन रही हैं।

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बारिश के बदलते पैटर्न ने किया ट्रिगर का काम

वैज्ञानिक मो. शावेज के मुताबिक, पहले इस क्षेत्र में लगातार तीन-चार दिनों तक बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब बारिश का पैटर्न बदल गया है। बारिश के दिनों की संख्या बढ़ने से मिट्टी के अंदर पानी सोखने की क्षमता कम हो गई है। पोर वॉटर प्रेशर (मिट्टी के कणों के बीच पानी का दबाव) बढ़ने से जमीन ढीली हो जाती है और खिसकने लगती है। भारी बारिश के साथ छोटे-छोटे भूकंप के झटके यहां ट्रिगर का काम कर रहे हैं।

बड़े भूकंप और बारिश का संयुक्त रिस्क मैप तैयार

वाडिया के वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग मॉडल और सैटेलाइट नक्शों की मदद से भविष्य की आपदाओं का रिस्क मैप भी तैयार किया है। इसमें रिक्टर स्केल पर सात से आठ की तीव्रता वाले बड़े भूकंप और तेज बारिश के संयुक्त प्रभाव का आकलन किया गया है। अध्ययन के अनुसार, दारमा घाटी का करीब नौ प्रतिशत इलाका हाई से वेरी-हाई रिस्क (अत्यधिक खतरे) जोन में आता है, जबकि 22 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम खतरे के दायरे में है।

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