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Auraiya News: बाबरपुर नगर पंचायत से जुड़े जमीन के मामले में दोबारा सुनवाई के आदेश

Wed, 20 May 2026 11:38 PM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया Updated Wed, 20 May 2026 11:38 PM IST
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Order for re-hearing in the land case related to Babarpur Nagar Panchayat
औरैया। बाबरपुर नगर पंचायत से जुड़े जमीन के मामले में दोबारा सुनवाई के आदेश दिए गए हैं।
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जिला जज मयंक चौहान की अदालत ने अधीनस्थ सिविल जज के एकपक्षीय फैसले को निरस्त कर दिया है। जिला जज ने मामले को वापस विचारण न्यायालय भेजते हुए आदेश दिए हैं कि सभी वाद बिंदुओं पर दोबारा नया निर्णय पारित किया जाए।
अजीतमल तहसील के गांव गढ़िया राय सिंह निवासी अभिनव दुबे व आलोक दुबे आदि ने नगर पंचायत बाबरपुर अजीतमल के खिलाफ जिला अदालत में एक सिविल अपील दायर की थी। यह अपील सिविल जज ने 18 फरवरी 2025 को पारित उस एकपक्षीय आदेश के खिलाफ थी, जिसमें अदालत ने वादीगण का मुकदमा एकपक्षीय रूप से निरस्त कर दिया था।
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2018 में दायर वाद में मूल वादी रामलखन दुबे का दावा था कि सराय बाबरपुर स्थित उनकी चार दुकानें 70 वर्षों से हैं। पूर्व से कब्जा होने के कारण तत्कालीन ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास कर 150 रुपये लेकर उन्हें यह भूमि आवंटित की थी। 28 जनवरी 1969 को तत्कालीन प्रधान ने इसकी रसीद दी थी। साल 1970 में दुकानों का निर्माण भी करा लिया गया था। नगर पंचायत के अस्तित्व में आने से बहुत पहले का निर्माण होने के कारण इस पर नगर पालिका अधिनियम लागू नहीं होता।
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वादी पक्ष ने गुहार लगाई थी कि नगर पंचायत उन्हें बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए दुकानों से बेदखल न करे। दूसरी ओर, नगर पंचायत बाबरपुर की तरफ से जवाब दाखिल कर कहा गया था कि वादी का दावा पूरी तरह निराधार है। वादी ने नगर पंचायत की तालाब की संपत्ति पर बिना किसी हक और अधिकार के अवैध निर्माण कर रखा है और सरकारी अभिलेखों में उनका कोई नाम दर्ज नहीं है।
अपील की सुनवाई के दौरान अपीलार्थी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विचारण न्यायालय ने पत्रावली पर उपलब्ध 16 प्रलेखीय और तीन मौखिक साक्ष्यों को बिना पढ़े ही सरसरी तौर पर निर्णय सुना दिया। जिला जज मयंक चौहान ने मामले की पत्रावली और साक्ष्यों के तहत पाया कि विचारण न्यायालय ने साल 2021 में इस मामले में कुल नौ वाद बिंदु तय किए गए थे।

अदालत को सभी तय बिंदुओं पर अपना निष्कर्ष देना अनिवार्य था लेकिन विचारण न्यायालय ने ऐसा किए बिना ही एकपक्षीय रूप से वाद को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने इसे गंभीर विधिक त्रुटि मानते हुए सिविल जज के आदेश को रद्द कर दिया और पत्रावली को दिशा-निर्देशों के साथ वापस भेज दिया है।
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