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अलीगढ़ की नुमाइश को नज्म में बयां किया है शकील बदायूंनी ने

Sun, 07 Feb 2021 12:59 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 07 Feb 2021 12:59 AM IST
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Shakeel Badauni has described Aligarh's exhibition in Najm
शकील बदायूंनी, मशहूर शायर - फोटो : CITY OFFICE
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व छात्र व मशहूर शायर शकील बदायूंनी ने राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी (नुमाइश) पर एक नज्म लिखी थी, नुमाइश के मंजर को समेटती हुई यह नज्म भले ही आज अतीत के पन्नों में छिपी हो, लेकिन इसकी ताजगी अभी वैसी की वैसी ही है।
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एएमयू की उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि शकील बदायूंनी सन 1936 में विश्वविद्यालय में पढ़ने आए थे। उन्होंने यहां से बीए किया। यहीं पर रहते हुए वह अपने समय के मशहूर लेखकों और साहित्यकारों के संपर्क में आए। उस समय अलीगढ़ की नुमाइश बड़ा आकर्षण हुआ करती थी। एएमयू में पढ़ने वाले विद्यार्थी शेरवानी पहन कर नुमाइश जाया करते थे, जो उनकी पहचान हुआ करती थी। नुमाइश का वह मंजर शकील ने अपनी नज्म नुमाइश ए अलीगढ़ में बयां किया है। यह नज्म शकील के काव्य संग्रह कुल्लियात शकील में भी शामिल है।
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नज्म का उनवान (शीर्षक) है नुमाइश ए अलीगढ़, उसका एक अंश
वो नमकीन आग़ाज-ए-शब अल्लाह अल्लाह
नुमाइश की वो ताब-ओ-तब अल्लाह अल्लाह
वो बाब-ए-मुजम्मिल पे जश्न-ए-चराग़ाँ
फ़लक पर हों जैसे सितारे दरख़्शाँ
फ़जाओं में गूँजे हुए वो तराने
वो जाँ-बख़्श नग़्मे वो पुर-लुत्फ़ गाने
वो हर सम्त हुस्न-ओ-लताफ़त की जानें
वो आरास्ता साफ़ सुथरी दुकानें
कहीं पर है नज्जारा कारीगरी का
कहीं गर्म होटल है पेशावरी का
ब-क़द्र-ए-सुकूँ वो दिलों का बहलना
अमीरों ग़रीबों का यकजा टहलना
नुमायाँ नुमायाँ वो यारान-ए-कॉलेज
वो इशरत-ब-दामाँ जवानान-ए-कॉलेज
नक़ाबों में वो बे-नक़ाबी का आलम
जो लाता है दिल पर ख़राबी का आलम
किसी का वो चेहरे से आँचल उठाना
किसी का किसी से निगाहें चुराना
कभी यक-ब-यक चलते चलते ठहरना
निगाहों से जल्वों की इस्लाह करना
कभी इक तवज्जोह दुकानों की जानिब
कभी इक नजर नौजवानों की जानिब
तमाशा ग़रज कामयाब आ रहा था
नुमाइश पे गोया शबाब आ रहा था
तिरी तरह जल्वा-नुमा है नुमाइश
तिरे हुस्न का आइना है नुमाइश
नुमाइश में तेरी लताफ़त है पिन्हाँ
नुमाइश में तेरी नजाकत है पिन्हाँ
निगाहों को नाहक़ तिरी जुस्तुजू है
यक़ीनन नुमाइश के पर्दे में तू है
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