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दिव्यांग दंपती का दर्द: साहब! ADA वालों ने उखाड़ फेंका खोखा, भूख से मर रहे बच्चे...मुझे अपनी दुकान लगा लेने दो

Wed, 02 Aug 2023 02:42 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला, आगरा
अमर उजाला, आगरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Wed, 02 Aug 2023 02:42 PM IST
सार

आगरा में दिव्यांग दंपती का दर्द सामने आया है। उन्होंने बताया कि साहब ADA वालों ने मेरा खोखा उखाड़ फेंका है। इससे बच्चे भूख से मर रहे हैं। बस मुझे अपनी दुकान लगा लेने दो। 

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ADA workers uprooted hollow of disabled couple In Agra he wandering from office to office to set up his shop
आगरा में दिव्यांग दंपती का दर्द: साहब! मुझे अपनी दुकान लगा लेने दो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश के आगरा में अधिकारियों की बेरुखी दिखाई दे रही है। यहां जिम्मेदारों ने अतिक्रमण के नाम पर दिव्यांग दंपती का खोखा उकाड़ फेंका, जो उनके लिए दो वक्त की रोटी का सहारा था। अब वह पाई-पाई के लिए मोहताज हैं। कमाई का जरिया खत्म होने से कई बार तो उन्हें पानी पीकर ही सो जाना पड़ता है। पीड़ा बताने के बावजूद अधिकारी पसीजने को तैयार नहीं हैं। 

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आमतौर पर तो शहर के हर चौराहे, तिराहे या फिर भीड़भाड़ वाले इलाके में ठेले या जमीन पर दुकान लगाकर लोग परिवार पाल रहे हैं। बताया जाता है कि जिम्मेदारों का यहां से हफ्ता बंधा होता है। इस कारण उन्हें थोड़ी कम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन कई जगहों पर ठेला या खोखा लगाने वालों को इनकी बेरुखी या यूं कहें कि पद का आतंक झेलना पड़ता है। 
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ऐसी ही एक कहानी दिव्यांग दंपती भागीरथ और अनीता की है। भागीरथ ने बताया कि उनको तीन बेटियां और एक बेटा है। दंपती को मिलाकर छह लोगों का परिवार है। पति-पत्नी दोनों दिव्यांग हैं। वह ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं हैं। लिहाजा उनके पास घर चलाने के लिए कोई अच्छी नौकरी या बड़ा व्यवसाय नहीं है। वह शास्त्रीपुरम में फ्लाईओवर के पास फुटपाथ पर एक खोखा रखकर दुकान चलाते थे। 

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भागीरथ ने बताया कि खोखा चलाकर जो आमदनी मिलती थी, उसी से वह अपना व बच्चों का पालन-पोषण कर रहे थे। सब बहुत अच्छा तो नहीं लेकिन बहुत खराब भी नहीं चल रहा था। फिर एक दिन आगरा विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की बेरुखी ने उनके जीवन में दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा कर दिया।

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उन्होंने बताया कि करीब एक महीने पहले आगरा विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने अतिक्रमण करने पर उनके खोखे को उखाड़ फेंका। विनती करने पर भी वह लोग नहीं पसीजे। उन्होंने कहा कि मैंने उस जगह को छोड़कर कहीं अन्य जगह भी खोखा लगाने की बात स्वीकार कर ली लेकिन अधिकारियों ने इजाजत नहीं दी। 

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भागीरथ ने बताया कि जो थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी, हफ्ते भर तक तो खाना पीना हो गया लेकिन फिर धीरे-धीरे खाने का संकट खड़ा हो गया। इसके लिए वह जिलाधिकारी कार्यालय भी गए। उन्होंने अपनी पीड़ा बताते हुए खोखा लगाने की अनुमति मांगी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वहां से भी उन्हें सिर्फ निराशा ही मिली।

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बताया कि बच्चों को भूखा देखकर पोड़ेसियों ने मदद की। पड़ोसी राशन और खाने का अन्य सामान दे गए। यह कहते हुए उनका गला भर आया कि कई बार तो पानी पीकर ही रात गुजारी। ताकि बच्चे भूखें न रहें। भागीरथ की मांग कोई आलीशान होटल या रेस्टोरेंट बनाने की नहीं है। उनकी नियत भूमाफिया की तरह सरकारी जमीन कब्जाने की भी नहीं है। 

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भागीरथ तो बस एक खोखा लगाकर अपना परिवार पालना चाहते हैं। विश्व विख्यात इस ताजनगरी में उनके लिए यह भी संभव नहीं हो पा रहा है। उनकी बेबसी के आंसू की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। भागीरथ ने कहा कि अब तो बस जिलाधिकारी से ही कुछ उम्मीद है। यदि वह कुछ मदद करेंगे तो वह फिर से अपने परिवार का पालन कर सकेगा।     
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