झुंड में तरतीब से शिकार करके पेट भरना फिर पूरे दिन गर्म रेत पर सुस्ताना। ये नजारा आजकल गंगा किनारे का है। हस्तिनापुर के मखदूमपुर, भीकुंड और खेड़ी घाट समेत आसपास के गांवों में छिछले पानी में विदेशी पक्षियों की अठखेलियां पक्षी प्रेमियों को खासा आकर्षित कर रही हैं। हर साल 60 से अधिक प्रजाति के हजारों प्रवासी पक्षी हजारों मील की यात्रा कर यहां आते हैं और सर्दी खत्म होने पर लौट जाते हैं।
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हस्तिनापुर सेंचुरी
- फोटो : अमर उजाला
मखदूमपुर घाट पर आजकल साइबेरिया और यूरेशिया के पक्षियों का बसेरा है। इनमें साइबेरियन क्रेन, ब्लू थोरेट, शॉक्लर, ब्रह्मी डक सहित किंगफिशर, कामन टेल, कॉम्ब बतख जैसे दर्जनों प्रजाति के विदेशी पक्षी हैं। एक हाथ से लेकर पांच फीट तक लंबे ये पक्षी अपने-अपने तरीके से शिकार करते हैं। कुछ एकांत में भोजन की तलाश करते हैं तो कुछ झुंड बनाकर मछलियों को घेर लेते हैं।
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सात से दस दिन करते हैं सफर
प्रवासी पक्षी 7 से 10 दिन की यात्रा कर मखदूमपुर सहित देश के अन्य हिस्सों में पहुंचते हैं। खास बात यह है ये पक्षी हर बार एक ही रास्ता प्रयोग करते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बर्फ से ढके हिमालय पर्वत का क्षेत्र यह पक्षी तीन दिन में पार करते हैं। करीब 10 हजार किलोमीटर से भी अधिक का सफर यह विदेशी मेहमान तय करते हैं।
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आसमान में दिखता है अनुशासन
अपने देश से चलते समय यह विदेशी मेहमान एक आकृति में दूरी तय करते हैं। ये आकृतियां ज्यादातर वी-शेप में होती हैं। सबसे आगे ग्रुप का मुखिया होता है। बीच में बच्चे और पीछे वयस्क पक्षी होते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि ये पक्षी हवा, धूप और दबाव के अनुसार अपनी उड़ने की आकृतियों में बदलाव करते हैं।
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यात्रा में ऐसे पाते हैं ऊर्जा
माइग्रेट से पहले इन पक्षियों का शरीर हाइपरफैगिया में चला जाता है। इसके तहत शरीर में हार्मोंस की अधिकता होती है, जिससे इनके शरीर में फैट जमा हो जाता है। इससे इन्हें ऊर्जा मिलती है। वहीं झुंड का आकार भी ऊर्जा क्षय को कम करता है।