मेरठ के मलियाना कांड की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस जीएल श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई होना तो दूर रिपोर्ट तक सार्वजनिक नहीं की गई। आयोग ने दंगे में पीएसी की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
मलियाना नरसंहार: 63 लोगों की गई थी जान, PAC की भूमिका पर उठे थे बड़े सवाल, आज मिलेगी फैसले की कॉपी
छोटे लाल बंसल बताते हैं कि जिन 93 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी, उनमें से दो की मौत दंगे से सात साल पहले, तो दो की मौत 10 साल पहले हो गई थी। पूरी एफआईआर तत्कालीन थानेदार ने अपने हिसाब से लिखाई थी। उसने मतदाता सूची ली और उसमें से 50 परिवारों के लोगों के नाम लिखा दिए, यह भी नहीं देखा कि जिनके नाम हैं, वह सभी जीवित भी हैं या नहीं।
उन्होंने बताया कि कोर्ट में केस के न टिकने की यह भी बड़ी वजह रही कि जो वादी बनाए गए, उन तक को नहीं पता था कि किस-किस के नाम लिखे गए हैं, एफआईआर उनसे एसओ ने अपने हिसाब से लिखवाई थी। इसके अलावा जो गवाह पेश किए गए, उनमें से भी छह लोगों ने यह गवाही दी कि नामजद किए गए लोग गोली चलाने वाले नहीं हैं, बल्कि गोली तो तत्कालीन प्रशासन के कहने पर पीएसी और पुलिसवालों ने चलाई थी, जिनसे लोगों की मौत हुई। जांच आयोग ने इन सब मामलों को संज्ञान में लिया था। मलियाना दंगे में 63 लोगों की मौत हो गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी पीआईएल
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक विभूति नारायण राय और पीड़ित इस्माइल द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस्माइल ने अपने परिवार के 11 सदस्यों को मलियाना में खो दिया था। मेरठ ट्रायल कोर्ट में मामले की पैरवी करने वाले एक वकील एमए राशिद ने एसआईटी द्वारा निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई और पीड़ितों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने की मांग की थी।
रुपहले पर्दे पर दिखाने की भी थी तैयारी
मलियाना और हाशिमपुरा कांड पर 1987 के नाम से फिल्म बनाने की भी तैयारी की गई थी। 2015 में मेरठ में इसकी घोषणा की गई थी कि हिंद फिल्म प्रोडक्शन के बैनर तले फिल्म बनाई जाएगी। हालांकि यह फिल्म बनी या नहीं, इसका पता नहीं चल पाया।