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इस शहर की सेहत कभी चुनावी एजेंडे तक नहीं पहुंच पाई, बीमारियों की भरमार, नेताओं को नहीं है सरोकार

Wed, 17 Apr 2019 10:21 AM IST
शिखा पांडेय रजा शस्त्री, अमर उजाला, कानपुर
रजा शस्त्री, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Wed, 17 Apr 2019 10:21 AM IST
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Kanpur health issue could not be lok sabha election 2019 agenda
फाइल फोटो
कानपुर औद्योगिक राजधानी है तो बीमारियों का गढ़ भी। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे देश का सबसे प्रदूषित शहर होने का तमगा भी दे चुका है। कानपुर शहर का चुनावी भाषणों में भी भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। संबोधन की शुरुआत नेता इसे औद्योगिक राजधानी बता कर करते हैं।


यह भी सच है कि शहर रोगों की राजधानी है। इतना ही नहीं चार-पांच मंडलों के जिलों के लोग यहां इलाज कराने के लिए आते हैं। दवा कंपनियों की दवाओं के शोध के लिए यह शहर लैब भी है। दवाएं किसी बीमारी पर कारगर होंगी कि नहीं, यह टेस्टिंग भी यहीं के मरीजों पर की जाती है। मुख्य बीमारी टीबी तो है ही दूसरी बीमारियों की कालोनियां भी यहां आबाद है।

कुपोषण, एनीमिया यहां सबसे अधिक है। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि चुनावों में शहर की सेहत को मुद्दा बनाया गया हो। आम दिनों में भले ही लोग बीमारियां का रोना रोते हैं, लेकिन चुनावी एजेंडे में कभी किसी दल ने शहर की बीमारियों के संबंध में चिंता नहीं जताई। राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे तक कानपुर की बीमारियों के न पहुंचने का नतीजा रहा कि यहां की सेहत को प्राथमिकता पर नहीं रखा गया।
Kanpur health issue could not be lok sabha election 2019 agenda
फाइल फोटो
बीमारियों की भरमार, नेताओं को नहीं सरोकार

इस वक्त कानपुर में डेढ़ लाख रोगियों की प्रतिदिन ओपीडी होती है। ये रोगी सरकारी और निजी अस्पतालों में आकर डाक्टरों से अपना स्वास्थ्य परीक्षण कराते हैं, फिर जांच के लिए लखनऊ और दिल्ली का मुंह ताकते हैं। यहां सरकारी अस्पतालों में जांचों की अभी तक सुविधा नहीं हो पाई। इस शहर में बाहर के तकरीबन आठ जिलों के रोगी रोज दिखाने के लिए आते हैं।

हैलट अस्पताल में मरीजों की संख्या सात गुना और उर्सला में तीन गुना बढ़ गई है। लेकिन अस्पतालों में सुविधाएं कुछ नहीं हैं। नई-नई तकनीकें आ गई हैं लेकिन इन अस्पतालों में अभी भी घिसी-पिटी पद्धति से इलाज हो रहा है। कहीं मशीनें आईं भी तो उनके रख-रखाव की व्यवस्था नहीं हुई।

किसी को शहर की चिकित्सीय व्यवस्था का आइना देखना हो तो जरा जेके कैंसर इंस्टीट्यूट चला जाए। हर साल यहां एक-डेढ़ हजार नए मरीज आते हैं। एम्स, एसपीजीआई में लंबी वेटिंग होने की वजह से गरीब मरीजों को यही सहारा होता है। हद यह है कि इस इंस्टीट्यूट में एक भी कैंसर सर्जन और फिजीशियन नहीं है।
Kanpur health issue could not be lok sabha election 2019 agenda
फाइल फोटो
आम डाक्टर इनकी सर्जरी करते हैं। मुख कैंसर के बाद अब यहां गाल ब्लैडर के कैंसर रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। हैलट में एक भी इंडोक्रोनोलोजिस्ट नहीं है जो डायबिटीज का इलाज करे और 3600 रोगियों की ओपीडी में 40 फीसदी मरीज बढ़ी हुई ब्लड शुगर लेकर आते हैं। कार्डियोलॉजी में अभी तक उतनी सुविधाएं नहीं हो पाई हैं जिनकी जरूरत है।

एक बार जिला अस्पताल का आइना भी देखिये। आईसीयू, एचडीयू (हाई डिपेंडेंसी यूनिट), बर्न वार्ड, डायलिसिस यूनिट जिन्हें उपलब्धियां बताया जाता है, उन्हें सरकार ने अभी स्वीकृत ही नहीं किया है। इसमें न तो यहां स्टाफ है और न ही इनके लिए कोई बजट।
 
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Kanpur health issue could not be lok sabha election 2019 agenda
फाइल फोटो
प्रदूषण के कारण हालत यह है कि लोगों के फेफड़ों की क्षमता घट रही है। छोटे-छोटे रोग गंभीर बन जा रहे हैं। बच्चों का सांस तंत्र फेल हो रहा है। महिलाओं में गर्भपात के केस दोगुना हो गए हैं। इलाज की सुविधा होती तो बहुतों की जान बचती।

रीजनल कैंसर इंस्टीट्यूट 1991 से हो रही कोशिशें
जेके कैंसर इंस्टीट्यूट को कैंसर सेंटर का दर्जा दिलाए जाने के लिए 1991 से कोशिशें हो रही हैं। तत्कालीन निदेशक डॉ. एसएन गुप्ता ने पहली बार सेंटर के लिए कोशिश शुरू की। इसके बाद डॉ. कमल साहनी 1991 से कोशिश करती रहीं। अभी भी शासन में एक दर्जन प्रस्ताव पड़े हैं लेकिन किसी का ध्यान नहीं जाता।
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फाइल फोटो - फोटो : Amar Ujala
यहां प्रदूषण घटाने के लिए सरकार स्तर से कोशिशें होनी चाहिए। राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो काम आसान हो जाएगा। इसे मुद्दा बनाया जाना चाहिए, तभी हल निकलेगा।
- डॉ. एसके कटियार, पूर्व प्राचार्य जीएसवीएम मेडिकल कालेज

सरकार ने जो सुविधा दी है, फिर उसकी तरफ पलट कर नहीं देखा कि उसका इस्तेमाल हो पा रहा है कि नहीं। इसके साथ ही शहर के जनप्रतिनिधियों को उन चिकित्सीय प्रस्तावों को फॉलो करना चाहिए जो आम आदमी की सेहत से जुड़े हैं।
- सीमा जैन, रिलेशनशिप कंसल्टेंट एंड काउंसलर

 आम आदमी बीमारियों से परेशान रहता है। ढंग से इलाज न मिल पाने के कारण लोगों की मौत हो जाती है। टीबी, एनीमिया, कुपोषण के रोगी बढ़ रहे हैं। ये मुद्दे चुनावी एजेंडे में आएं तो हल निकले। नेताओं की जवाबदेही हो।
- अब्दुल सलाम जाफरी, वार्डन सिविल डिफेंस
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