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महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि पर नहीं लगेगा लक्खी मेला, ये है वजह, 'तीर्थों का भांजा' के नाम से है प्रसिद्घ
Mon, 30 Nov 2020 12:14 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी
Published by: Abhishek Saxena
Updated Mon, 30 Nov 2020 12:14 AM IST
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महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि
- फोटो : अमर उजाला
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महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि पर लगने हजारों वर्षों से लगने वाला लक्खी मेला इस वर्ष नहीं लगेगा। साथ ही पवित्र सरोवर में श्रद्धालु स्नान भी नहीं कर सकेंगे। कोरोना संक्रमण को देखते हुए जिला प्रशासन ने आयोजन की अनुमति नहीं दी है। मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित विधूना में महर्षि मार्कंडेय का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर के सामने ही पवित्र सरोवर स्थित है।
महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि
- फोटो : अमर उजाला
हर वर्ष यहां कार्तिक पूर्णिमा से 15 दिनों तक लक्खी मेले का आयोजन होता है। इस बार यहां मेले का आयोजन नहीं होगा। कोरोना महामारी के कारण शासन के निर्देश पर यहां लगने वाले मेले पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। जिला प्रशासन ने यहां पर पुलिस तैनात कर दी है। किसी को भी सरोवर में स्नान की भी अनुमति नहीं होगी।
महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि
- फोटो : अमर उजाला
मार्कंडेय को कहा जाता है सभी तीर्थों का भांजा
मार्कंडेय ऋषि को सभी तीर्थों का भांजा माना गया है। कहा जाता है कि यदि किसी तीर्थ का स्नान व दर्शन न कर पाएं तो मार्कंडेय ऋषि के दर्शन करें। वे सभी तीर्थों के मान्य हैं। इसलिए उनका महत्व बढ़ जाता है।
मार्कंडेय ऋषि को सभी तीर्थों का भांजा माना गया है। कहा जाता है कि यदि किसी तीर्थ का स्नान व दर्शन न कर पाएं तो मार्कंडेय ऋषि के दर्शन करें। वे सभी तीर्थों के मान्य हैं। इसलिए उनका महत्व बढ़ जाता है।
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(टीला) पांडवों ने अज्ञातवास के दिन भी यहीं व्यतीत किए
- फोटो : अमर उजाला
पांडवों ने बनवास के दौरान यहां व्यतीत किया था समय
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना का संबंध महाभारत काल से भी बताया जा रहा है। बताया जाता है कि महाभारत काल के विधुर का यहीं टीला था। उनके नाम से ही इस गांव का नाम विधूना पड़ा। बताते हैं कि पांडवों ने बनवास के दौरान कुछ दिन यहां व्यतीत किए थे। पांडवों के चबूतरों के अवशेष भी यहां मिलते हैं।
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना का संबंध महाभारत काल से भी बताया जा रहा है। बताया जाता है कि महाभारत काल के विधुर का यहीं टीला था। उनके नाम से ही इस गांव का नाम विधूना पड़ा। बताते हैं कि पांडवों ने बनवास के दौरान कुछ दिन यहां व्यतीत किए थे। पांडवों के चबूतरों के अवशेष भी यहां मिलते हैं।
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मंदिर में रखे पौराणिक अवशेष
- फोटो : अमर उजाला
महर्षि वाल्मीकि से भी जुड़ी हैं यादें
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना से मात्र 200 मीटर की दूरी पर नहर के दूसरी तरफ उत्तर दिशा की ओर सीता की रसोइया के रूप में एक मंदिर निर्मित है। पांच दशक पूर्व यहां वन था। इस स्थान को आज भी वनकटा के नाम से जाना जाता है। बताते हैं कि वाल्मीकि की यहीं कुटिया थी। सीता ने लवकुश को यहीं जन्म दिया था।
मार्कंडेय ऋषि की तपोभूमि विधूना से मात्र 200 मीटर की दूरी पर नहर के दूसरी तरफ उत्तर दिशा की ओर सीता की रसोइया के रूप में एक मंदिर निर्मित है। पांच दशक पूर्व यहां वन था। इस स्थान को आज भी वनकटा के नाम से जाना जाता है। बताते हैं कि वाल्मीकि की यहीं कुटिया थी। सीता ने लवकुश को यहीं जन्म दिया था।