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किसान संसद का आयोजन
Updated Thu, 01 Feb 2018 01:20 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
सिरसा।
किसानों और मजदूरों को कर्ज मुक्त करने, कर्ज की राशि केंद्र सरकार स्वयं वहन करे, राज्य और जिला स्तर पर कर्जा निपटारा बोर्ड का गठन करने, फसलों के लाभकारी मूल्य देने, फसलों की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने, डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने, सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने और कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को जीएसटी (सेवा माल कर) के दायरे से बहार करने की मांग को लेकर बुधवार को लालबत्ती चौक स्थित टाउन पार्क में ‘किसान संसद’ का आयोजन किया, जिसमें जिलेभर से आए किसान नेताओं ने भाग लिया।
किसान संसद की अध्यक्षता सुरजीत सिंह, हरदेव सिंह, विकल पचार, जगरूप सिंह संयुक्त रूप से की। इस किसान संसद का उद्घाटन वरिष्ठ किसान नेता स्वर्ण सिंह विर्क ने किया। स्वर्ण सिंह ने कहा कि देश और प्रदेश की 70 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या का जीवन और रोजी रोटी कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं। सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों की वजह से यह क्षेत्र तेज गति से बर्बादी के कगार की ओर जा रहा है। किसान सभा के प्रधान सुरजीत सिंह ने कहा कि सरकार की किसान विरोधी नीतियों की वजह से आमदनी के घटने और लागत के बढ़ते चले जाने से किसान और मजदूर कर्जे के फंदे में फंस गए हैं।
स्कूल-कॉलेज की आसमान छूती फीसें, बीमारी के इलाज का भारी खर्च और रोजमर्रा की चीजों की कमरतोड़ महंगाई ने आम आदमी की जिंदगी को संकटग्रस्त बना दिया है। किसान नेताओं ने कहा कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1990 के बाद देश में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह भी विडंबना है कि हरियाणा प्रदेश में तो आढ़तियों और सूदखोरों गैरकानूनी दरों पर लिए गए कर्जे को उतार पाने में असमर्थ किसान-मजदूरों द्वारा की गई आत्महत्याओं को तो कोई दर्ज तक नहीं करता। उन्होंने कहा कि विधायकों और सांसदों की तर्ज पर किसानों को भी पेंशन दी जाए।
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किसान नेता राजकुमार शेखुपुरिया ने आरोप लगाया कि कृषि का वर्तमान संकट कोई प्राकृतिक कारणों से पैदा नहीं हुआ बल्कि शासक वर्गों द्वारा 1990 के बाद समय समय पर थोपी गई उदारीकरण व निजीकरण की नीतियों से पैदा हुआ है। इस किसान संसद में प्रस्ताव पारित करके यह मांग की गई कि सभी किसानों व मजदूरों को कर्ज मुक्त किया जाए, फसलों के लाभकारी भाव दिया जाए, फसलों की सरकारी खरीद सुनिश्चित की जाए, डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की जाए, कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को जीएसटी से बहार की जाए। इस किसान संसद में तहसीलदार के माध्यम से उपरोक्त मांगों पर आधारित मांग पत्र प्रधानमंत्री को प्रेषित किया गया। एक अन्य मांग पत्र में जो उपायुक्त को दिया गया कि उसमें मांग की गई कि नहरों के आखिरी छोर तक पानी दिया जाए, नरमा और धान फसल की बीमा क्लेम राशि का भुगतान तुरंत किया जाए। इस किसान संसद में गुलजारी लाल ढाका, सतनाम सिंह, राजकुमार शेखुपुरिया, लक्ष्मण सिंह शेखावत, राजकुमार शेखुपुरिया, ओपी सुथार, मास्टर गुरटेक सिंह, गुरदिताराम, जंटा सिंह आदि किसान प्रतिनिधियों के अतिरिक्त सैकड़ों किसान उपस्थित रहे।
सिरसा।
किसानों और मजदूरों को कर्ज मुक्त करने, कर्ज की राशि केंद्र सरकार स्वयं वहन करे, राज्य और जिला स्तर पर कर्जा निपटारा बोर्ड का गठन करने, फसलों के लाभकारी मूल्य देने, फसलों की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने, डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने, सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने और कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को जीएसटी (सेवा माल कर) के दायरे से बहार करने की मांग को लेकर बुधवार को लालबत्ती चौक स्थित टाउन पार्क में ‘किसान संसद’ का आयोजन किया, जिसमें जिलेभर से आए किसान नेताओं ने भाग लिया।
किसान संसद की अध्यक्षता सुरजीत सिंह, हरदेव सिंह, विकल पचार, जगरूप सिंह संयुक्त रूप से की। इस किसान संसद का उद्घाटन वरिष्ठ किसान नेता स्वर्ण सिंह विर्क ने किया। स्वर्ण सिंह ने कहा कि देश और प्रदेश की 70 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या का जीवन और रोजी रोटी कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं। सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों की वजह से यह क्षेत्र तेज गति से बर्बादी के कगार की ओर जा रहा है। किसान सभा के प्रधान सुरजीत सिंह ने कहा कि सरकार की किसान विरोधी नीतियों की वजह से आमदनी के घटने और लागत के बढ़ते चले जाने से किसान और मजदूर कर्जे के फंदे में फंस गए हैं।
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स्कूल-कॉलेज की आसमान छूती फीसें, बीमारी के इलाज का भारी खर्च और रोजमर्रा की चीजों की कमरतोड़ महंगाई ने आम आदमी की जिंदगी को संकटग्रस्त बना दिया है। किसान नेताओं ने कहा कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1990 के बाद देश में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह भी विडंबना है कि हरियाणा प्रदेश में तो आढ़तियों और सूदखोरों गैरकानूनी दरों पर लिए गए कर्जे को उतार पाने में असमर्थ किसान-मजदूरों द्वारा की गई आत्महत्याओं को तो कोई दर्ज तक नहीं करता। उन्होंने कहा कि विधायकों और सांसदों की तर्ज पर किसानों को भी पेंशन दी जाए।
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किसान नेता राजकुमार शेखुपुरिया ने आरोप लगाया कि कृषि का वर्तमान संकट कोई प्राकृतिक कारणों से पैदा नहीं हुआ बल्कि शासक वर्गों द्वारा 1990 के बाद समय समय पर थोपी गई उदारीकरण व निजीकरण की नीतियों से पैदा हुआ है। इस किसान संसद में प्रस्ताव पारित करके यह मांग की गई कि सभी किसानों व मजदूरों को कर्ज मुक्त किया जाए, फसलों के लाभकारी भाव दिया जाए, फसलों की सरकारी खरीद सुनिश्चित की जाए, डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की जाए, कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को जीएसटी से बहार की जाए। इस किसान संसद में तहसीलदार के माध्यम से उपरोक्त मांगों पर आधारित मांग पत्र प्रधानमंत्री को प्रेषित किया गया। एक अन्य मांग पत्र में जो उपायुक्त को दिया गया कि उसमें मांग की गई कि नहरों के आखिरी छोर तक पानी दिया जाए, नरमा और धान फसल की बीमा क्लेम राशि का भुगतान तुरंत किया जाए। इस किसान संसद में गुलजारी लाल ढाका, सतनाम सिंह, राजकुमार शेखुपुरिया, लक्ष्मण सिंह शेखावत, राजकुमार शेखुपुरिया, ओपी सुथार, मास्टर गुरटेक सिंह, गुरदिताराम, जंटा सिंह आदि किसान प्रतिनिधियों के अतिरिक्त सैकड़ों किसान उपस्थित रहे।