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गालिब की काशी यात्रा बन गई चिराग ए दैर
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बनारस की मिर्जा गालिब की यात्रा ने चिराग ए दैर का रूप लिया। मंदिर का दिया और हर रंग का बनारस नजर आता है गालिब की किताब में। चिराग ए दैर में पता चलता है कि बनारस गालिब के सपनों के शहर जैसा था। 15 फरवरी को गालिब की पुण्यतिथि है।
शायर हाजी फरमान हैदर ने बताया कि गालिब ने एक दरवेश से पूछा कि तमाम सारे पापों और अपकर्म के बाद भी दुनिया में कयामत क्यों नहीं हो जाती। दरवेश ने मुस्कुराकर काशी की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया कि वजह ये मुकद्दस शहर है। हैं और भी दुनिया में सुखनबर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे बयां और...। सच है गालिब ने जिस नजर से दुनिया को देखा वह एकदम अलग है। चिराग ए दैर में गालिब ने अपने दो महीने के काशी वास को शब्दों में पिरोया है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि सन 1827 के आखिरी महीनों में कलकत्ते का सफर करते हुए वह करीब दो महीने के लिए यहां ठहरे थे। वह सिर्फ तीन दिनों के लिए काशी में रुकने की योजना से पहुंचे थे, लेकिन यहां पूरे दो माह तक यहां रुके। इसी दौरान उन्होंने काशी की संस्कृति और जिंदादिली को फारसी मसनवी में समेटा। जिसको पूरी दुनिया चराग ए दैर के नाम से जानती है।
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शायर हाजी फरमान हैदर ने बताया कि गालिब ने एक दरवेश से पूछा कि तमाम सारे पापों और अपकर्म के बाद भी दुनिया में कयामत क्यों नहीं हो जाती। दरवेश ने मुस्कुराकर काशी की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया कि वजह ये मुकद्दस शहर है। हैं और भी दुनिया में सुखनबर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे बयां और...। सच है गालिब ने जिस नजर से दुनिया को देखा वह एकदम अलग है। चिराग ए दैर में गालिब ने अपने दो महीने के काशी वास को शब्दों में पिरोया है।
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क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि सन 1827 के आखिरी महीनों में कलकत्ते का सफर करते हुए वह करीब दो महीने के लिए यहां ठहरे थे। वह सिर्फ तीन दिनों के लिए काशी में रुकने की योजना से पहुंचे थे, लेकिन यहां पूरे दो माह तक यहां रुके। इसी दौरान उन्होंने काशी की संस्कृति और जिंदादिली को फारसी मसनवी में समेटा। जिसको पूरी दुनिया चराग ए दैर के नाम से जानती है।
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