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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Sonia Gandhi’s Book: A History of Power, Words, and ‘Literary Rebellion’

सोनिया गांधी की किताब: सत्ता, शब्द और ‘किताबी विद्रोह’ का इतिहास

सार

सोनिया गांधी की प्रस्तावित आत्मकथा को लेकर विवाद ने किताब, सत्ता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं। यह बहस सिर्फ संपादकीय बदलाव तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से असहज विचारों और लेखकों के साथ व्यवहार से भी जुड़ी है। आंबेडकर की Annihilation of Caste, पेरियार की सच्ची रामायण, सलमान रुश्दी की The Satanic Verses और पेरुमल मुरुगन की One Part Woman भारत में ‘किताबी विद्रोह’ की लंबी परंपरा के उदाहरण हैं। हालांकि हर संपादकीय हस्तक्षेप को सेंसरशिप नहीं कहा जा सकता। सोनिया की किताब ने फिर सवाल खड़ा किया है कि लोकतंत्र में असहमति को दबाया जाए या उसका जवाब विचार से दिया जाए।

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Sonia Gandhi’s Book: A History of Power, Words, and ‘Literary Rebellion’
सोनिया गांधी की किताब। - फोटो : Amar Ujala AI

विस्तार

किताब सिर्फ कागज पर दर्ज शब्द नहीं, सत्ता के समानांतर खड़ा होता एक दस्तावेज भी है। सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं, लेकिन किताबें रह जाती हैं। यही वजह है कि किसी राजनीतिक नेता की आत्मकथा या किसी लेखक की सत्ता-विरोधी किताब को केवल साहित्यिक रचना मानना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।

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कई बार किताब अपने समय की राजनीति का वैकल्पिक दस्तावेज बन जाती है। सोनिया गांधी की प्रस्तावित आत्मकथा Belonging: A Journey of Love को लेकर भारत में पैदा हुआ विवाद इसी बड़े सवाल की ओर इशारा करता है क्या भारत में किताब आज भी सत्ता और स्थापित राजनीतिक आख्यानों को चुनौती देने का प्रभावी माध्यम है?
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सोनिया गांधी की किताब को लेकर विवाद फिलहाल प्रकाशन और संपादकीय बदलाव के सवाल के इर्द-गिर्द है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि पांडुलिपि के उन हिस्सों पर आपत्ति थी जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस और चीन से जुड़े मुद्दे थे। वहीं पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने सरकारी दबाव के आरोप को स्वीकार नहीं किया है और संपादकीय तथा तथ्य-जांच की प्रक्रिया को प्रकाशन की सामान्य जिम्मेदारी बताया है। इसलिए इस समय इसे सीधे सरकारी सेंसरशिप कहना जल्दबाजी होगी। 
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लेकिन विवाद का महत्व इससे कम नहीं हो जाता। असली सवाल है लेखक की आवाज और प्रकाशक की संपादकीय जिम्मेदारी के बीच सीमा कहां है?

अंबेडकर से शुरू करें तो किताब का विद्रोह कितना पुराना है

भारत में “किताबी विद्रोह” की परंपरा को समझने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर की Annihilation of Caste से बेहतर उदाहरण मुश्किल है। 1936 में आंबेडकर को लाहौर में जाति-विरोधी सम्मेलन में भाषण देना था। उनका तैयार भाषण आयोजकों को इतना तीखा लगा कि उन्होंने आपत्तिजनक हिस्सों को हटाने का आग्रह किया। आंबेडकर तैयार नहीं हुए और सम्मेलन ही रद्द हो गया। इसके बाद उन्होंने भाषण को स्वयं प्रकाशित किया। 

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लगभग नौ दशक पहले भी सवाल वही था क्या लेखक अपने विचारों को संपादित कराने के बजाय उन्हें पूरी ताकत से सामने रखने का अधिकार रखता है? आंबेडकर ने किताब को सिर्फ विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि स्थापित सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने का औजार बनाया। बाद में गांधी ने भी उनके विचारों का जवाब दिया। यानी किताब के पन्नों पर वैचारिक संघर्ष ने सार्वजनिक बहस को जन्म दिया।

आज सोनिया गांधी की किताब का विवाद अलग राजनीतिक संदर्भ में है, लेकिन मूल प्रश्न कहीं न कहीं वही है क्या लेखक को अपनी राजनीतिक स्मृतियों और निष्कर्षों को अपनी शर्तों पर दर्ज करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए?

पेरियार की ‘सच्ची रामायण’ और स्थापित आख्यान से टकराव

ईवी रामासामी ‘पेरियार’ की सच्ची रामायण भारतीय समाज में किताब और स्थापित धार्मिक-सामाजिक आख्यान के टकराव का दूसरा बड़ा उदाहरण है। पेरियार ने रामायण की पारंपरिक व्याख्या को स्वीकार करने के बजाय उसमें वर्णित पात्रों और सामाजिक मूल्यों की आलोचनात्मक व्याख्या की। किताब पर तीखा विरोध हुआ और उत्तर प्रदेश में इसके प्रकाशन पर रोक तक लगी। बाद में मामला न्यायिक प्रक्रिया से गुजरा।

यहां सवाल सिर्फ किताब का नहीं था। सवाल था कि किसी स्थापित कथा को चुनौती देने का अधिकार लेखक को कितना है? यही लोकतंत्र की कठिन परीक्षा है। जिस समाज में किसी विचार से असहमति जताने की आजादी है, उसी समाज में उस विचार को पढ़े जाने और उस पर बहस होने की जगह भी होनी चाहिए।

रुश्दी की ‘The Satanic Verses’: जब किताब अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गई

सलमान रुश्दी की The Satanic Verses का मामला तो किताब और सत्ता के रिश्ते की वैश्विक मिसाल बन गया। 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को लेकर व्यापक धार्मिक विवाद हुआ और भारत उन शुरुआती देशों में था जहां इसके आयात पर रोक लगाई गई।

यह उदाहरण सोनिया गांधी के मामले से बिल्कुल अलग है। यहां एक साहित्यिक कृति, धार्मिक भावनाओं, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य के फैसले के बीच टकराव था। फिर भी इससे एक महत्वपूर्ण सवाल निकलता है किस बिंदु पर समाज की संवेदनशीलता राज्य की सेंसरशिप में बदल जाती है? यही सवाल आज भी प्रासंगिक है।

पेरुमल मुरुगन: जब लेखक ने कहा ‘लेखक मर चुका है’

तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन का One Part Woman भी इस बहस को दूसरी दिशा में ले जाता है। किताब को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ। सामाजिक दबाव इतना बढ़ा कि मुरुगन ने सार्वजनिक रूप से लेखन छोड़ने की घोषणा तक कर दी। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला दिया।

यह घटना बताती है कि किताब को चुप कराने के लिए हमेशा सरकार की जरूरत नहीं होती। भीड़, सामाजिक दबाव, राजनीतिक संगठन और आर्थिक दबाव भी लेखक की स्वतंत्रता के सामने दीवार खड़ी कर सकते हैं। इसलिए “किताबी विद्रोह” केवल सरकार बनाम लेखक की कहानी नहीं है। यह समाज बनाम असहमति की कहानी भी है।

अरुंधति रॉय: किताब से लेकर सार्वजनिक बहस तक

अरुंधति रॉय का नाम भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। Azadi जैसे उनके लेखन में राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता, कश्मीर और सत्ता जैसे सवालों पर तीखी वैचारिक बहस दिखाई देती है। Azadi की आधिकारिक पुस्तक सामग्री भी ‘Freedom’, ‘Fascism’ और कश्मीर तथा भारत में राजनीतिक स्वतंत्रता की बहस को केंद्र में रखती है। 

दिलचस्प बात यह है कि रॉय ने स्वयं आंबेडकर की Annihilation of Caste के एक महत्वपूर्ण संस्करण के लिए लंबी भूमिका लिखी। यानी किताबों का विद्रोह केवल लेखक की अपनी किताब तक सीमित नहीं रहता; लेखक दूसरे विचारकों की व्याख्या करके भी मौजूदा राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकता है। 

हर संपादन सेंसरशिप नहीं होता

यहीं सोनिया गांधी की किताब का मामला सबसे अधिक सावधानी मांगता है। किसी प्रकाशक का यह कहना कि किसी हिस्से की तथ्य-जांच होनी चाहिए या किसी दावे को कानूनी रूप से परखा जाना चाहिए, अपने आप में सेंसरशिप नहीं है। प्रकाशक की जिम्मेदारी भी होती है कि वह प्रकाशित सामग्री की विश्वसनीयता और कानूनी जोखिम देखे।

लेकिन दूसरी तरफ अगर लेखक का दावा है कि उसके राजनीतिक विचार या अनुभव को सिर्फ इसलिए हटाने को कहा जा रहा है क्योंकि वह सत्ता के लिए असुविधाजनक है, तो मामला गंभीर हो जाता है। इसलिए बहस का सही सवाल शायद यह नहीं है कि “पेंगुइन ने संपादन क्यों सुझाया?”

सही सवाल है “संपादन तथ्यात्मक शुद्धता के लिए था या राजनीतिक असुविधा कम करने के लिए?”

इसका अंतिम उत्तर किताब के सामने आने और विवादित हिस्सों की वास्तविक जानकारी मिलने के बाद ही दिया जा सकेगा।

किताब बनाम सोशल मीडिया: किसकी ताकत ज्यादा?

आज कोई नेता सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालता है और कुछ घंटे में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। फिर भी किताब की राजनीतिक ताकत खत्म नहीं हुई है। क्यों? क्योंकि सोशल मीडिया तत्काल प्रतिक्रिया पैदा करता है, जबकि किताब स्थायी रिकॉर्ड बनाती है। ट्वीट का जवाब ट्वीट से दिया जा सकता है। टीवी बहस अगले दिन पुरानी हो जाती है। 

लेकिन किताब पुस्तकालय में रहती है, विश्वविद्यालय में पढ़ी जाती है, शोध का स्रोत बनती है और वर्षों बाद भी राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या में इस्तेमाल होती है। इसलिए सत्ता के लिए किताब का असली खतरा उसके तत्काल प्रभाव में नहीं, बल्कि उसकी दीर्घकालिक स्मृति में है।

सोनिया की किताब सिर्फ सोनिया की कहानी नहीं होगी

यही वजह है कि Belonging: A Journey of Love को लेकर इतनी दिलचस्पी है। यह केवल सोनिया गांधी के निजी जीवन का संस्मरण नहीं माना जा रहा। इसके जरिए भारतीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण दौर को एक ऐसे व्यक्ति की नजर से देखने का अवसर मिलेगा जो दशकों तक कांग्रेस और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रही हैं।

राजीव गांधी के साथ उनका जीवन, कांग्रेस में उनका प्रवेश, पार्टी का पुनर्गठन, 2004 के बाद की राजनीति, प्रधानमंत्री पद को लेकर उनका फैसला, मनमोहन सिंह के साथ यूपीए का दौर और राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा इन सबकी उनकी अपनी स्मृति और व्याख्या निश्चित रूप से राजनीतिक महत्व रखती है। और यदि मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व पर उनके आकलन भी इसमें हैं, तो किताब आने के बाद राजनीतिक बहस का नया दौर शुरू होना स्वाभाविक है।

किताबी विद्रोह जरूरी है, लेकिन किताबी प्रचार नहीं

यहां एक फर्क बेहद जरूरी है। हर सरकार की आलोचना करने वाली किताब लोकतांत्रिक विद्रोह नहीं होती और हर सत्ता समर्थक किताब प्रचार नहीं होती। किताब का मूल्य इस बात से तय होना चाहिए कि लेखक अपने दावों के पीछे कितने तथ्य, दस्तावेज और तर्क रखता है।

राजनीतिक संस्मरण में निजी स्मृतियां होती हैं। स्मृति हमेशा पूर्ण सत्य नहीं होती। लेखक की अपनी राजनीतिक दृष्टि होती है। इसलिए सोनिया गांधी की किताब को भी अंतिम इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण गवाही के रूप में पढ़ना ज्यादा उचित होगा। यही बात आंबेडकर, पेरियार, रुश्दी, अरुंधति रॉय या किसी भी विवादित लेखक पर लागू होती है।

असल सवाल किताब के छपने से बड़ा है

सोनिया गांधी की किताब अंततः भारत में किस प्रकाशक से छपेगी, उसके विवादित हिस्सों में क्या लिखा होगा और संपादन को लेकर वास्तविक मतभेद क्या थे इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सामने आएंगे।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी से इतना जरूर स्पष्ट है कि भारतीय प्रकाशन जगत में इस किताब को लेकर राजनीतिक संवेदनशीलता पैदा हुई है। रिपोर्टों के अनुसार दूसरे प्रकाशक भारत में इसके प्रकाशन में रुचि दिखा रहे हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण का बड़ा सवाल सोनिया गांधी से आगे जाता है।

क्या भारत में लेखक सत्ता से असहमत होकर लिख सकता है?

क्या प्रकाशक राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर किताब प्रकाशित कर सकता है?

क्या पाठक विवादित विचारों को पढ़कर खुद फैसला कर सकता है?

और सबसे महत्वपूर्ण क्या लोकतंत्र में किसी विचार का जवाब उसे रोकना है या उसके जवाब में दूसरा विचार लिखना?


भारत की लोकतांत्रिक और साहित्यिक परंपरा का सबसे मजबूत पक्ष यही रहा है कि यहां आंबेडकर ने स्थापित सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी, पेरियार ने धार्मिक आख्यानों पर सवाल उठाए, रुश्दी की किताब ने अभिव्यक्ति और आस्था की सीमा पर बहस छेड़ी और पेरुमल मुरुगन के मामले में अदालत को लेखक की स्वतंत्रता की रक्षा करनी पड़ी।

सोनिया गांधी की किताब इसी लंबी परंपरा की नई कड़ी बन सकती है। किताब सत्ता नहीं गिराती, लेकिन सत्ता के आधिकारिक आख्यान के सामने दूसरा दस्तावेज जरूर खड़ा कर देती है। और लोकतंत्र में कभी-कभी यही सबसे बड़ा विद्रोह होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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