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राष्ट्रीय खेल दिवस: काशी के ओलंपियन...जिनकी चमक से दुनिया में रोशन हुआ बनारस, जानें इन 12 खिलाड़ियों बारे में

Sat, 29 Aug 2026 07:56 AM IST
Aman Vishwakarma रोहित चतुर्वेदी, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
रोहित चतुर्वेदी, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sat, 29 Aug 2026 07:56 AM IST
सार

राष्ट्रीय खेल दिवस पर काशी के उन खिलाड़ियों को याद किया जा रहा है, जिन्होंने ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का नाम रोशन किया। बनारस की मिट्टी ने हॉकी, कुश्ती, एथलेटिक्स समेत विभिन्न खेलों में प्रतिभाएं दी हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने न केवल भारत का गौरव बढ़ाया, बल्कि दुनिया में काशी की खेल पहचान भी मजबूत की।

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National Sports Day Olympians from Kashi brilliance illuminated Banaras global stage 12 athletes
राष्ट्रीय खेल दिवस पर खास रिपोर्ट। - फोटो : Adobe

काशी केवल मंदिरों, घाटों और संस्कृति की नगरी नहीं है। यह खेल प्रतिभाओं की भी ऐसी धरती रही है, जहां अखाड़ों की मिट्टी से लेकर हॉकी के मैदान और दौड़ की पटरियों तक, खिलाड़ियों ने अपने सपनों को आकार दिया। सीमित साधनों, कठिन परिस्थितियों और लगातार मेहनत के बीच काशी के कई खिलाड़ियों ने देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक जैसे सबसे बड़े खेल मंच तक सफर किया। इन खिलाड़ियों की कहानियां केवल पदक जीतने या प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की कहानियां नहीं हैं। 



इनमें किसी के लिए अखाड़े की मिट्टी रास्ता बनी, किसी ने पानी में अपनी पहचान बनाई, तो किसी ने लंबी दौड़, तीरंदाजी, लंबी कूद और भाला फेंक जैसी अलग-अलग स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मोहम्मद शाहिद का स्वर्णिम दौर हो या ललित उपाध्याय के लगातार दो ओलंपिक पदक, इन उपलब्धियों के पीछे वर्षों का अनुशासन, त्याग और संघर्ष छिपा है। इन 12 ओलंपियनों की यात्रा मिलकर काशी के खेल इतिहास की एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जिसमें पुरानी परंपरा और नई उम्मीद साथ-साथ दिखाई देती है।

National Sports Day Olympians from Kashi brilliance illuminated Banaras global stage 12 athletes
अनंत राम भार्गव। - फोटो : अमर उजाला

अनंत राम भार्गव : जब काशी ने पहली बार ओलंपिक देखा...
अनंत राम भार्गव का नाम काशी के शुरुआती ओलंपिक इतिहास से जुड़ा है। वाराणसी के गायघाट मोहल्ले में जन्मे भार्गव ने 1948 के लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। यह वह समय था जब देश को स्वतंत्र हुए बहुत कम समय हुए थे और खिलाड़ियों के पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। भारतीय कुश्ती की तैयारी मुख्य रूप से अखाड़ों में होती थी। मिट्टी की कुश्ती, पारंपरिक दांव-पेच और कठिन शारीरिक अभ्यास ही पहलवानों की ताकत थे। ऐसे माहौल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि थी।

अनंत राम भार्गव की उपलब्धि का महत्व किसी पदक से कहीं आगे है। उन्होंने काशी के खिलाड़ियों के लिए ओलंपिक का रास्ता खोला। उनके बाद वाराणसी से कुश्ती, हॉकी, तीरंदाजी और दौड़ जैसे कई खेलों में खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। उनकी कहानी काशी के उस खेल सफर की शुरुआत है, जो आज भी लगातार आगे बढ़ रहा है।

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सचिन नाग। - फोटो : अमर उजाला

सचिन नाग : लहरों पर लिखा भारत का नाम
वाराणसी में जन्मे सचिन नाग भारत के शुरुआती तैराकों और वाटरपोलो खिलाड़ियों में शामिल थे। उनका ओलंपिक सफर 1948 के लंदन खेलों से शुरू हुआ। उन्होंने 100 मीटर तैराकी में हिस्सा लिया और 34वां स्थान प्राप्त किया। इसी खेल आयोजन में वे भारतीय वाटरपोलो दल का भी हिस्सा रहे। 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी उन्होंने वाटरपोलो में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इससे पहले 1951 के दिल्ली एशियाई खेलों में उनका प्रदर्शन शानदार रहा था।

उन्होंने 100 मीटर तैराकी में स्वर्ण पदक जीता और दो अन्य स्पर्धाओं में कांस्य पदक हासिल किए। सचिन नाग का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि उन्होंने उस समय भारत का प्रतिनिधित्व किया जब देश में तैराकी के लिए आधुनिक सुविधाएं बहुत सीमित थीं। उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि काशी की खेल प्रतिभा केवल कुश्ती और हॉकी तक सीमित नहीं थी। पानी के खेलों में भी बनारस ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी दिया।

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गुलजारा सिंह। - फोटो : अमर उजाला

गुलजारा सिंह : काशी की रफ्तार पहुंची हेलसिंकी
गुलजारा सिंह का नाम वाराणसी के उन शुरुआती खिलाड़ियों में आता है जिन्होंने एथलेटिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वाराणसी में चितईपुर से जुड़े गुलजारा सिंह ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में हिस्सा लिया। उस समय भारतीय खेल जगत में आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं बहुत कम थीं। खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों के बीच अभ्यास करना पड़ता था। लंबी दूरी की दौड़ जैसे खेलों में शारीरिक क्षमता के साथ अनुशासन और निरंतर अभ्यास की बड़ी भूमिका होती थी।

हेलसिंकी तक पहुंचना गुलजारा सिंह के लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। यह काशी की खेल प्रतिभा के लिए एक नई दिशा भी थी। उस दौर में अधिकांश लोग कुश्ती और हॉकी को ही भारतीय खेलों की पहचान मानते थे, लेकिन गुलजारा सिंह ने दौड़ के मैदान में भी बनारस का नाम पहुंचाया। उनकी कहानी उस पीढ़ी की कहानी है जिसने आधुनिक खेल सुविधाओं के अभाव के बावजूद बड़े सपने देखे। उन्होंने आने वाली पीढ़ी को यह भरोसा दिया कि काशी का खिलाड़ी भी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच तक पहुंच सकता है।

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लक्ष्मीकांत पांडेय। - फोटो : अमर उजाला

लक्ष्मीकांत पांडेय : अखाड़े की मिटटी से मेलबर्न तक
लक्ष्मीकांत पांडेय, जिन्हें चिक्कन पांडेय के नाम से भी जाना जाता है, काशी की पारंपरिक कुश्ती से जुड़े प्रमुख खिलाड़ियों में रहे। कोइरीपुर खुर्द में जन्मे पांडेय ने 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके समय में कुश्ती की तैयारी आज की तरह आधुनिक साधनों पर निर्भर नहीं थी। अखाड़े की मिट्टी, कठिन व्यायाम, शारीरिक ताकत और गुरु से मिले दांव-पेच ही पहलवान की असली पूंजी होते थे।

मेलबर्न तक पहुंचना इस बात का प्रमाण था कि स्थानीय अखाड़ों में तैयार होने वाला खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है। काशी की कुश्ती परंपरा को दुनिया तक पहुंचाने वाली शुरुआती पीढ़ी में उनका नाम महत्वपूर्ण है। लक्ष्मीकांत पांडेय की कहानी पदक की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब भारतीय पहलवान सीमित साधनों के बावजूद विश्वस्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंचने का प्रयास कर रहे थे। उनकी उपलब्धि ने काशी की अखाड़ा संस्कृति को राष्ट्रीय खेल पहचान से जोड़ने में योगदान दिया।

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