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गरीबों के लिए घर से छिपाकर अनाज की बोरियां भेजते थे राजनारायण

Wed, 18 Jan 2017 02:35 PM IST
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी
अनूप ओझा, अमर उजाला, वाराणसी Updated Wed, 18 Jan 2017 02:35 PM IST
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Rajnarayan Bags of grain were sent home for the poor
लोकबंधु राजनारायण - फोटो : अमर उजाला
आजादी के बाद से अब तक की भारतीय राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क आया है। अब गरीबों के राशन कार्ड बनवाने हों या हैंडपंप आवंटन। बिना कमीशन के कोई काम नहीं होता लेकिन एक दौर था जब नेता जनता के लिए जीते थे।
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राजनारायण के चुनावों का प्रबंधन देख चुके उनके भतीजे हर्ष वर्धन सिंह बताते हैं कि वह घरवालों से छिपाकर अनाज की बोरियां गरीबों के लिए भिजवा दिया करते थे। लखनऊ, दिल्ली के स्थित उनके आवास पर हर रोज सौ-50 लोगों का खाना बनता था।
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वे सबका काम भी कराते थे और किराया-भाड़ा देकर विदा भी करते थे। एक बार तो उन्होंने सरकार की ओर से अधिगृहीत की गई कलेक्ट्री फार्म की जमीन किसानों से जोतवा दी। 
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लोकबंधु राजनारायण के बारे में कहा जाता है कि उनका एक पैर रेल में और दूसरा जेल में होता था।

सबके सुख-दुख को जानने वाले वह ऐसे नेता थे, जिनके पीछे भीड़ नहीं, रेला चलता था। 1952 में पहली बार जब आराजीलाइन से सोसलिस्ट उम्मीदवार के रूप में वह चुनाव मैदान में उतरे तब रिश्तेदारों को चिह्नित कर वहां प्रमुख कार्यकर्ताओं को चुनाव भर टिकाने की व्यवस्था की गई थी। बस्तियों में रात-रात भर कार्यकर्ता पड़ाव डालते थे। गांव-गांव से आटा-दाल, चावल आता था। 


रात को प्रचार की रणनीति बनती थी। तब इस दौर की तरह होर्डिंग लगाने, पोस्टर छापने, बांटने का चलन नहीं था। अब के नेताओं के पीछे चलने वाले गनर, कारों के काफिले उनके साथ नहीं होते थे। गांव-गांव महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों की पैदल टोलियां चलती थीं। विधान सभा चुनाव में आराजीलाइन विधानसभा सीट से उन्होंने उस समय के लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी ऋषि नारायण शास्त्री को हराया था।  
 

Rajnarayan Bags of grain were sent home for the poor
लोकबंधु राजनारायण, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा - फोटो : अमर उजाला

राजनारायण के संघर्षों का एक बड़ा अध्याय स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आराजीलाइन क्षेत्र से ही प्रथम जमीन बचाओ आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था। हर्षवर्धन सिंह बताते हैं कि उन दिनों राज्य सरकार ने अदलपुरा के किसानों की जमीन कलेक्ट्री फार्म के लिए अधिगृहीत कर ली थी।

विरोध में राजनारायण ने अदलपुरा में एक पेड़ के नीचे बैठकर किसानों के साथ सत्याग्रह आरंभ कर दिया। जब परिणाम नहीं निकला तब उन्होंने लड़ाई तेज करने का एलान कर दिया। एक दिन उनके नेतृत्व में इलाके के पांच सौ से अधिक किसान जुटे और उन्होंने फार्म की जमीनों को जोतकर कब्जा कर लिया।

प्रशासन ने किसानों को रोकने की पूरी कोशिश की थी। 15 से अधिक आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। महीने भर चले इस जमीन जोतो आंदोलन में सौ से अधिक लोग जेल भेजे गए लेकिन सरकार को झुकना पड़ा और मजबूर होकर किसानों की जमीन छोड़नी पड़ी। 

समाजवादी नेता शतरुद्र प्रकाश कहते हैं कि आंदोलनों में कई बार उनके साथ रहे समाजवादी नेता शतरुद्र प्रकाश बताते हैं कि वह चलते फिरते आंदोलन थे। वह कहीं भी एक रात से अधिक नहीं रुकते थे।

कहा ‌क‌ि इमरजेंसी के दौरान जब वह हिसार जेल से छूटे तब मैं, अंजना के साथ उनसे मिलने गया था। वह किसी साधु की तरह दाढ़ी बढ़ाए थे। मुझे देखते ही भावुक हो गए। जब वह वाराणसी आए तो जंघई रेलवे स्टेशन से मैदागिन तक सड़क के दोनों किनारों पर भीड़ का रेला था। लोग पुष्पवर्षा कर रहे थे। उनके जैसी लोकप्रियता हासिल करना इस दौर में मुश्किल है।

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