पितृपक्ष 2023: काशी गया में पूजा विधान पूर्ण करने के बाद विष्णु गया के लिए प्रस्थान, जानें क्या है मान्यता?
श्रद्धालुओं ने पितरों और अकाल मौत की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध का कर्म विधान पूर्ण किया। संकल्प के बाद शुद्ध जल से सभी प्रेत आत्माओं की मुक्ति के लिए तर्पण का विधान भगवान विष्णु को अर्पित किया गया। इसके साथ पितरों की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना की गई। पितरों की मुक्ति के लिए पिशाच मोचन तीर्थ पर अनुष्ठान कराए गए।
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पितरों को नमन करने का पक्ष शनिवार से आरंभ हो गया। गंगा तट से लेकर पिशाचमोचन कुंड तक पुरखों को तर्पण करने का अनवरत सिलसिला चलता रहा। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से कर्मकांड को पूर्ण कर गया के लिए प्रस्थान किया। शनिवार को प्रतिपदा से आरंभ होकर 14 अक्तूबर तक तर्पण के अनुष्ठान चलेंगे। शनिवार को भोर से ही गंगा के तट और पिशाचमोचन कुंड पर पिंडदान करने वालों की भीड़ लगी रही।
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श्रद्धालुओं ने पितरों और अकाल मौत की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध का कर्म विधान पूर्ण किया। संकल्प के बाद शुद्ध जल से सभी प्रेत आत्माओं की मुक्ति के लिए तर्पण का विधान भगवान विष्णु को अर्पित किया गया। इसके साथ पितरों की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना की गई। पितरों की मुक्ति के लिए पिशाच मोचन तीर्थ पर अनुष्ठान कराए गए। कर्मकांड के अंत में पीपल के पेड़ में जल अर्पित किया गया। कर्मकांड के बाद सभी पिंडदानियों ने 84 लाख योनियों से मुक्ति के प्रतीक 84 तरह के दान और 84 तरह की दक्षिणा अर्पण का भी संकल्प लिया। श्रद्धालुओं ने वस्त्र, अन्न, जल, तेल, छाया, गऊ, शैय्या, सोना, रजत आदि का दान किया गया।
पितृपक्ष की भ्रांतियों पर दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री से समाधान
भ्रान्ति- पितृ पक्ष में पूजा पाठ घर में दीपक धूप आदि नहीं करना चाहिए ।
उत्तर- आप अपने दैनिक जीवनचर्या में जो भी जप पाठ संध्या,ठाकुर जीलड्डू गोपाल जी/शिवलिंग आदि की सेवा उपासना भोग आरती, सायं कालीन धूप दीपक करते हैं वे सभी नित्य की ही भांति करते रहेंगे। अपितु प्रातः की पूजा पाठ जप उपासना आदि के बाद किए गए पिंडदान तर्पण आदि से पितृ गण को विशेष तृप्ति शांति प्राप्त होती है।
भ्रान्ति- जिनके घर विवाह आदि हुआ है वे तर्पण आदि नहीं करेंगे।
उत्तर- तर्पण तो वैसे भी बारहों मास किए जाने वाले संध्या उपासना पूजा पाठ का हिस्सा है। अतः ऐसे घरों में तर्पण जरूरतमंदों सुपात्रों को किए जाने वाले दान उपदान आदि होने चाहिए। बस पिंडदान (पार्वण श्राद्ध/सामवत्सरिक श्राद्ध) एवं क्षौर कर्म (मुंडन) नहीं होगा।
भ्रान्ति- श्रीगया धाम में पिंड दान आदि कर लेने के बाद तर्पण अथवा पिंडदान आदि नहीं करना चाहिए।
उत्तर- सत्यता यह है कि पितरों के रूप में हम स्वयं भगवान श्रीविष्णु जिन्हें पितृरूपी जनार्दन कहते हैं उनकी सेवा अर्चना तृप्ति करते हैं जिसके कारण हमारे कुल के पूर्वजों व स्वयं हमारा कल्याण उद्धार आदि होता है। अतः गया श्राद्ध कर लेने के बाद भी सामर्थ्य एवं क्षमता के अनुसार पिंडदान करना चाहिए। रही बात तर्पण की तो वह सदैव (कम से कम पूरे पितृ पक्ष) करना चाहिए।
भ्रान्ति-पितृ पक्ष में खान पान से संबंधित कोई निषेध नहीं हैं।
उत्तर- जिस प्रकार श्रावण में श्री नारायण की पूजा उपासना पूरे महीने शुद्ध सात्विक रहते हुए। नवरात्रि में मां जगदंबा की विशेष सेवा अर्चना व्रत उपासना करते हैं। वैसे ही पितृपक्ष में पूरे 16 दिन मसूर की दाल कुल्थी, लहसुन, प्याज मांस मदिरा गुटका तंबाकू अथवा किसी भी मादक द्रव्य का त्याग करें। शुद्ध सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य आदि संयम का पालन करते हुए पितृ रूप श्री नारायण की सेवा करते हुए स्वयं के कल्याण व पूर्वजों के सद्गति की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त पितृ पक्ष में किसी नए कार्य का आरंभ अथवा नई खरीददारी आदि नहीं करना चाहिए।