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जौनपुर में दीनदयालजी
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जौनपुर। एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय चुनाव में हार-जीत पर सिद्धांत को तरजीह देते थे। यही कारण है कि जौनपुर से जीवन का पहला और आखिरी चुनाव हार भले ही गए लेकिन उन्होंने सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जौनपुर लोकसभा चुनाव में उनका चुनावी रथ फंस गया था। रणनीतिकारों ने उन्हें जीत की तरकीब सुझाई लेकिन उन्होंने जातीय गोलबंदी करके चुनाव जीतने के बजाय पराजित हो जाना उचित समझा। इसे उनके सिद्धांतों की जीत माना जाता है। 25 सितंबर को उनकी जयंती जिले में इसी रूप में याद की जाती है।
वर्ष 1962 के लोकसभा के आम चुनाव में जौनपुर में जनसंघ के प्रत्याशी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की। चुनाव में चीन से हार का मुद्दा जनसंघ के लिए बड़ा हथियार बना था। एक साल के भीतर ही सांसद ब्रह्मजीत सिंह का निधन हो गया। वर्ष 1963 में उपचुनाव हुए तो पं. दीनदयाल उपाध्याय को यहां से प्रत्याशी बनाया गया। पार्टी का मानना था कि उनके जैसे कद्दावर नेता जनसंघ के आधार वाली इस सीट से आसानी से जीत जाएंगे। उस समय कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व भी दो धड़े में बंटा था। इससे उनकी जीत तय मानी जा रही थी। उनके मुकाबले में कांग्रेस ने राजदेव सिंह को मैदान में उतारा। चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की गुटबाजी भी समाप्त करा दी। उसके बाद मुकाबला बेहद रोचक हो गया।
पं. दीनदयाल उपाध्याय के चुनाव अभियान में सहयोगी रहे राज कॉलेज में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देवेंद्र प्रताप उपाध्याय बताते हैं कि कांग्रेस ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। उनके बाहरी होने का मुद्दा जोरों से उठाया। राजपूत बहुलता वाली इस सीट पर जातिगत आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण के भी प्रयास हुए। जनसंघ की ओर से प्रचार करने रज्जू भइया, माधव प्रसाद त्रिपाठी, प्रताप नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे दिग्गज नेता आए थे। जातिगत ध्रुवीकरण को देखते हुए कुछ लोगों ने क्षत्रिय नेताओं को प्रचार में उतारने और गैर क्षत्रिय वोटों को गोलबंद करने का सुझाव दिया। उनकी बात सुनकर पंडित जी आपे से बाहर हो गए। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि भले ही चुनाव हार जाऊं, लेकिन जातिवाद की राजनीति नहीं करूंगा। प्रचार में वह पैदल ही गांव-गांव घूमते रहे। उनके इस प्रयास के बावजूद उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस तरह पंडित दीनदयाल चुनाव भले ही हार गए लेकिन सिद्धांत की राजनीति उन्होंने नहीं छोड़ी। इसे जिले के लोग उनकी जीत मानते हैं।
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वर्ष 1962 के लोकसभा के आम चुनाव में जौनपुर में जनसंघ के प्रत्याशी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की। चुनाव में चीन से हार का मुद्दा जनसंघ के लिए बड़ा हथियार बना था। एक साल के भीतर ही सांसद ब्रह्मजीत सिंह का निधन हो गया। वर्ष 1963 में उपचुनाव हुए तो पं. दीनदयाल उपाध्याय को यहां से प्रत्याशी बनाया गया। पार्टी का मानना था कि उनके जैसे कद्दावर नेता जनसंघ के आधार वाली इस सीट से आसानी से जीत जाएंगे। उस समय कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व भी दो धड़े में बंटा था। इससे उनकी जीत तय मानी जा रही थी। उनके मुकाबले में कांग्रेस ने राजदेव सिंह को मैदान में उतारा। चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की गुटबाजी भी समाप्त करा दी। उसके बाद मुकाबला बेहद रोचक हो गया।
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पं. दीनदयाल उपाध्याय के चुनाव अभियान में सहयोगी रहे राज कॉलेज में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देवेंद्र प्रताप उपाध्याय बताते हैं कि कांग्रेस ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। उनके बाहरी होने का मुद्दा जोरों से उठाया। राजपूत बहुलता वाली इस सीट पर जातिगत आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण के भी प्रयास हुए। जनसंघ की ओर से प्रचार करने रज्जू भइया, माधव प्रसाद त्रिपाठी, प्रताप नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे दिग्गज नेता आए थे। जातिगत ध्रुवीकरण को देखते हुए कुछ लोगों ने क्षत्रिय नेताओं को प्रचार में उतारने और गैर क्षत्रिय वोटों को गोलबंद करने का सुझाव दिया। उनकी बात सुनकर पंडित जी आपे से बाहर हो गए। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि भले ही चुनाव हार जाऊं, लेकिन जातिवाद की राजनीति नहीं करूंगा। प्रचार में वह पैदल ही गांव-गांव घूमते रहे। उनके इस प्रयास के बावजूद उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस तरह पंडित दीनदयाल चुनाव भले ही हार गए लेकिन सिद्धांत की राजनीति उन्होंने नहीं छोड़ी। इसे जिले के लोग उनकी जीत मानते हैं।
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