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इलाहाबाद को 'हरामजादा शहर' कहने पर मनोज सिन्हा के खिलाफ परिवाद दर्ज

Sun, 02 Jul 2017 10:51 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Sun, 02 Jul 2017 10:51 AM IST
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Varanasi Plea filed against Manoj Sinha for Allahabad as Harmazada City
बीएचयू में स्मारक डाक टिकट जारी करते समय दिए मंत्री के बयान पर बखेड़ा - फोटो : अमर उजाला

साहित्यकार धर्मवीर भारती का हवाला देते हुए इलाहाबाद के संदर्भ में ‘हरामजादा’ शब्द का इस्तेमाल करने पर केंद्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के खिलाफ शनिवार को परिवाद दर्ज किया गया।

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इस मामले में वाराणसी की एसीजेएम नवम की कोर्ट ने परिवाद दर्ज करने का आदेश देते हुए परिवादी अधिवक्ता प्रेमप्रकाश यादव के बयान के लिए 13 जुलाई की तिथि नियत की है। परिवादी का कहना था कि मनोज सिन्हा ने यह बयान धर्मवीर भारती को अपमानित करने के लिए दिया था।
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इससे पहले मनोज सिन्हा ने अपने बयान पर खेद जताया था। उन्होंने कहा कि दिनांक 28 जून 2017 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में दो स्मारक डाक टिकट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पर जारी किए गए। उस कार्यक्रम में मेरे द्वारा धर्मवीर भारती जी के प्रसंग के उद्धृत करने को लेकर एक गैर जरूरी विवाद पैदा हुआ है। उसका संदर्भ हास-परिहास का था।
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कहा क‌ि यह मेरे और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी के व्यक्तिगत संबंधों में चला आ रहा है। इलाहाबाद शहर हमारे लिए श्रद्धा का केंद्र है जिसे तीर्थराज हम मानते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय जिसे ऑक्सफोर्ड के नाम से देश जानता है, इस विश्वविद्यालय के लिए मेरे मन में अत्यंत सम्मान है।

इलाहाबाद शहर और विश्वविद्यालय के लिए कोई अपमानजनक टिप्पणी करने की बात तो दूर, मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता हूं। धर्मवीर भारती जी हिंदी साहित्य के अत्यंत तेजस्वी नक्षत्र रहे हैं और उनके लिए भी मेरे मन में अत्यंत श्रद्धा है। उनके पूरे साहित्य को समझना मेरे लिए बहुत मुश्किल है क्योंकि न मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं न ही मेरी उतनी समझ है।


बावजूद इसके अगर किसी की भावना को आघात लगा है तो मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी। बावजूद इसके इलाहाबाद व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रेमियों तथा धर्मवीर भारती जी में आस्था रखने वाले सभी बहनों, भाइयों से मैं खेद प्रकट करता हूं। मेरा यह भी आग्रह होगा कि हर चीज़ को राजनीति के नजरिये से देखना यह अच्छी परंपरा नहीं है।

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