बीएचयू: प्लाज्मा प्रदर्शनी, कुलपति बोले- विज्ञान, इंजीनियरिंग, अनुसंधान के क्षेत्र में कॅरिअर की है संभावना
बीएचयू में पांच दिवसीय प्लाज्मा प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। कुलपति ने कहा कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और अनुसंधान के क्षेत्र में कॅरिअर की अपार संभावनाएं हैं। प्रदर्शनी के माध्यम से विद्यार्थियों को प्लाज्मा विज्ञान की बारीकियों को समझने और नई तकनीकों से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुसंधान के प्रति रुचि विकसित करना है।
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बीएचयू के विज्ञान संस्थान में पांच दिन तक चलने वाली प्लाज्मा प्रदर्शनी का कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने सोमवार को उद्घाटन किया। कुलपति ने कहा कि विद्यार्थियों के लिए विज्ञान, इंजीनियरिंग, अनुसंधान के क्षेत्र में कॅरिअर की संभावना अधिक है। वह व्यावहारिक प्रयोगों के माध्यम से प्लाज्मा से जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने के साथ उनके अनुप्रयोगों से रूबरू हो रहे हैं।
विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (आईपीआर) के सहयोग से लगी प्रदर्शनी का उद्देश्य प्लाज्मा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रति विद्यार्थियों में जागरूकता बढ़ाना है। कुलपति ने कहा कि प्लाज्मा से जुड़े प्रयोग विज्ञान, इंजीनियरिंग और कल्पनाशीलता के समन्वय का अवसर प्रदान करते हैं।
विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. संजय कुमार ने कहा कि वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने के लिए प्रश्न पूछना और जिज्ञासु दृष्टिकोण विकसित करना जरूरी है। संकाय प्रमुख प्रो. अरुण देव सिंह ने प्लाज्मा विज्ञान को एक उभरता हुआ क्षेत्र बताया। भौतिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि प्रदर्शनी में जैकब्स लैडर, प्लाज्मा लैम्प,प्लाज्मा टॉर्च, ग्लो डिस्चार्ज का प्रदर्शन किया जा रहा है।
शोध कार्यों में नकल, आंकड़ों में हेरफेर की अनियमितता को रोकने की जरूरत
आईएमएस बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में कार्यशाला में शोध कार्यों में हेराफेरी, नकल आदि बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बतौर मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने शोधपत्रों की संख्या और उद्धरणों की गणना से अधिक नैतिक मानकों को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। कहा कि नकल और आंकड़ों में हेरफेर जैसी अनियमितताओं को रोकने की जरूरत है।
आईएमएस में डीन रिसर्च प्रो. मनोज पांडेय की देखरेख में केएन उडुप्पा सभागार में कुलपति ने शोधार्थियों की आने वाली पीढ़ियों में सत्यनिष्ठा की स्थायी संस्कृति विकसित करने के लिए शोध नैतिकता का प्रारंभिक स्तर पर ही प्रशिक्षण देने की आवश्यकता बताई। आईएमएस के निदेशक प्रो. एसएन संखवार ने कहा कि आकलन केवल शोधपत्रों की संख्या या उद्धरणों से नहीं बल्कि शोध के प्रति समाज के विश्वास और सकारात्मक बदलावों से किया जाना चाहिए। डॉ. के नरसिम्हा मूर्ति ने कहा कि प्राचीन काल से ही ज्ञान के विकास के साथ नैतिक सिद्धांत जुड़े रहे हैं।