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Sonebhadra News: साहित्य अकादमी में विदा होती बेटियां लोकार्पित
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वैश्विक हिंदी परिवार के तत्वावधान में समकालीन हिंदी कविता के चर्चित काव्य-संग्रह विदा होती बेटियां के तृतीय संस्करण का लोकार्पण साहित्य अकादमी रवींद्र भवन, मंडी हाउस नई दिल्ली में हुआ। पुस्तक के लेखक डॉ. ओमप्रकाश एनटीपीसी शक्तिनगर में उप महाप्रबंधक राजभाषा के पद पर कार्यरत हैं। वह हिंदी कविता के रचनाकार भी हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एनटीपीसी लिमिटेड के पूर्व महाप्रबंधक और अपर निजी सचिव राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्ष डॉ. वंदना झा रहीं। विशिष्ट सानिध्य वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी का रहा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि विदा होती बेटियां केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की संवेदनात्मक चेतना का सशक्त अभिलेख है। उन्होंने संग्रह की मार्मिक पंक्तियां उद्धृत करते हुए कहा कभी सोचा कहां था, एक दिन ऐसा होगा, जब सब कुछ होगा मेरे पास, और तुम नहीं होगी मां। मुख्य अतिथि डॉ. वंदना झा ने कहा कि डॉ. ओम प्रकाश का यह काव्य-संग्रह समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-संवेदना, पारिवारिक संरचना एवं सामाजिक चेतना का अत्यंत संतुलित एवं परिपक्व उदाहरण है। इस दौरान प्रो. बीर पाल सिंह यादव, प्रो. धीरेंद्र बहादुर सिंह, प्रो. पदम परिहार, प्रो. संजय सेठ, डॉ. अजीत मिश्र, डॉ. अविनाश पाठक, डॉ. नलिन विकास, डॉ. रुचिता सहाय आदि मौजूद रहे। कवि डॉ. ओम प्रकाश ने कहा विदा होती बेटियां मेरे लिए केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, रिश्तों की स्मृतियों एवं मानवीय संवेदनाओं से निकला एक गहन आत्म-संवाद है। संचालन डॉ. अर्चना त्रिपाठी और आयोजन का संयोजन विनयशील चतुर्वेदी ने किया।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता एनटीपीसी लिमिटेड के पूर्व महाप्रबंधक और अपर निजी सचिव राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्ष डॉ. वंदना झा रहीं। विशिष्ट सानिध्य वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी का रहा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि विदा होती बेटियां केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की संवेदनात्मक चेतना का सशक्त अभिलेख है। उन्होंने संग्रह की मार्मिक पंक्तियां उद्धृत करते हुए कहा कभी सोचा कहां था, एक दिन ऐसा होगा, जब सब कुछ होगा मेरे पास, और तुम नहीं होगी मां। मुख्य अतिथि डॉ. वंदना झा ने कहा कि डॉ. ओम प्रकाश का यह काव्य-संग्रह समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-संवेदना, पारिवारिक संरचना एवं सामाजिक चेतना का अत्यंत संतुलित एवं परिपक्व उदाहरण है। इस दौरान प्रो. बीर पाल सिंह यादव, प्रो. धीरेंद्र बहादुर सिंह, प्रो. पदम परिहार, प्रो. संजय सेठ, डॉ. अजीत मिश्र, डॉ. अविनाश पाठक, डॉ. नलिन विकास, डॉ. रुचिता सहाय आदि मौजूद रहे। कवि डॉ. ओम प्रकाश ने कहा विदा होती बेटियां मेरे लिए केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, रिश्तों की स्मृतियों एवं मानवीय संवेदनाओं से निकला एक गहन आत्म-संवाद है। संचालन डॉ. अर्चना त्रिपाठी और आयोजन का संयोजन विनयशील चतुर्वेदी ने किया।
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