{"_id":"5cc4a507bdec22076100a163","slug":"21556391175-sonebhadra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"विकलांगता की मार झेल रहे ग्रामीणों की नहीं है किसी को सुध","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विकलांगता की मार झेल रहे ग्रामीणों की नहीं है किसी को सुध
विज्ञापन
सोनभद्र। केंद्र और राज्य दोनों के खजाने को भरने में भले ही जिले की अहम भूमिका है लेकिन यहां फ़्लोराइड की अधिकता के चलते तीन पीढ़ी से विकलांगता की मार झेल रहे लोगों की सुध किसी को नहीं है। हालत यह है कि चोपन ब्लॉक के ग्राम पंचायत कचनरवा के नेरुइयादामर और रोहनियादामर टोले की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी इसकी चपेट में है। बावजूद यहां के बाशिंदों के लिए अब तक शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नसीब नहीं हो सकी है। 2006 में स्थापित फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र 2008 से ही खराब पड़े हैं। सिर्फ सरकारी अमला ही नहीं, जनप्रतिनिधि भी इनकी हालत पर नजर डालना जरूरी नहीं समझते।
वैसे तो चोपन, म्योरपुर, दुद्धी और म्योरपुर ब्लाक के ढाई सौ से अधिक गांव फ्लोराइड की अधिकता से प्रभावित है लेकिन 26 गांव ऐसे हैं, जहां यह रासायनिक जहर लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी विकलांग बना रहा है। हालात इतने खतरनाक हैं कि फ्लोराइड की अधिकता वाला पानी पीने के कारण यहां के लोग जवां उम्र में ही बूढ़े दिखाई देने लगे हैं। अधिकांश लोगों के दांत पीले हो गए हैं। लोगों के शरीर के जोड़ो में हमेशा असहनीय दर्द बना हुआ। स्वास्थ्य विभाग भी कभी-कभी कैंप लगाकर उपचार की औपचारिकता कर लेता है। जल निगम विभाग के साथ प्रशासन में बैठे जिम्मेदार तो जैसे यहां शुद्ध पेयजल की व्यवस्था कराने की बात भूल ही गए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि 2006 में जल निगम की तरफ से फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र लगाया गया था। इसी संयंत्र से पूरे गांव में पाइप लाइन के जरिए शुद्ध पेयजल पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई थी। 15 की संख्या में नल लगाए गए थे। इससे लोगों ने राहत महसूस की थी लेकिन 2008 में इस संयंत्र का सोलर पैनल चोरी चला गया तब से इस पर किसी की नजर नहीं पड़ी। सौर ऊर्जा आधारित एक मिनी संयंत्र बस्ती के बीच में लगाया गया था। सबमर्सिबल पंप से पानी निकालकर उसे शुद्ध किया जाता था। इसका पंप भी वर्षों से खराब पड़ा है। गांव के प्रत्येक हैंडपंप में फ्लोराइड रिमूवल यंत्र लगाए गए थे, वह कई वर्ष से निष्क्रिय पड़े हैं।
सोनभद्र। कुछ यही हाल चोपन ब्लाक के ग्राम पंचायत परडछ में टोला पडवाकोदवारी का है। यहां दर्जनों लोग चारपाई पर पड़े-पड़े जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। सपा सरकार के समय से लगभग 68 करोड़ की लागत से पाइप लाइन बिछाई जा रही है लेकिन यह काम कब तक पूरा होगा, कहना मुश्किल हो गया है। परियोजना में गड़बड़ी बरतने की शिकायतें अलग से हैं।
विज्ञापन
सोनभद्र। नेरुइयादामर टोले के बासो देवी पत्नी सरजू जिनकी उम्र 45 वर्ष है। उन्हें देखकर लगता है कि जैसे उनकी उम्र 80-85 वर्ष हो गई। सरयू की पत्नी के जोड़ों में हर समय दर्द बना हुआ है। स्वास्थ्य कैंप में मिलने वाली दवाएं उनके लिए बेकार हैं। कुछ महीने पहले सरयू की फ़्लोराइड की मार के चलते मौत हो गई। उनकी पत्नी की भी हालत काफी खराब है। वाराणसी के किसी निजी अस्पताल में इलाज करा रहा है। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उन्होंने बताया कि इस गांव में ऐसे कई लोग हैं, जो तिल-तिल कर मौत की ओर बढ़ने को विवश हैं। इसी तरह, परडछ के टोला पडवाकोदवारी में कई लोग चारपाई पर हैं।
जिन गांवों में पानी में फ्लोराइड की अधिकता है, वहां समय-समय पर कैंप लगाकर मरीजों का उपचार किया जाता है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए जल निगम को कई बार पत्र लिखा जा चुका है क्योंकि दूषित पानी का सेवन करने से ग्रामीण फ्लोराइड की चपेट में आ रहे हैं। - डॉ. एसपी सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी
विज्ञापन
वैसे तो चोपन, म्योरपुर, दुद्धी और म्योरपुर ब्लाक के ढाई सौ से अधिक गांव फ्लोराइड की अधिकता से प्रभावित है लेकिन 26 गांव ऐसे हैं, जहां यह रासायनिक जहर लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी विकलांग बना रहा है। हालात इतने खतरनाक हैं कि फ्लोराइड की अधिकता वाला पानी पीने के कारण यहां के लोग जवां उम्र में ही बूढ़े दिखाई देने लगे हैं। अधिकांश लोगों के दांत पीले हो गए हैं। लोगों के शरीर के जोड़ो में हमेशा असहनीय दर्द बना हुआ। स्वास्थ्य विभाग भी कभी-कभी कैंप लगाकर उपचार की औपचारिकता कर लेता है। जल निगम विभाग के साथ प्रशासन में बैठे जिम्मेदार तो जैसे यहां शुद्ध पेयजल की व्यवस्था कराने की बात भूल ही गए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि 2006 में जल निगम की तरफ से फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र लगाया गया था। इसी संयंत्र से पूरे गांव में पाइप लाइन के जरिए शुद्ध पेयजल पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई थी। 15 की संख्या में नल लगाए गए थे। इससे लोगों ने राहत महसूस की थी लेकिन 2008 में इस संयंत्र का सोलर पैनल चोरी चला गया तब से इस पर किसी की नजर नहीं पड़ी। सौर ऊर्जा आधारित एक मिनी संयंत्र बस्ती के बीच में लगाया गया था। सबमर्सिबल पंप से पानी निकालकर उसे शुद्ध किया जाता था। इसका पंप भी वर्षों से खराब पड़ा है। गांव के प्रत्येक हैंडपंप में फ्लोराइड रिमूवल यंत्र लगाए गए थे, वह कई वर्ष से निष्क्रिय पड़े हैं।
विज्ञापन
सोनभद्र। कुछ यही हाल चोपन ब्लाक के ग्राम पंचायत परडछ में टोला पडवाकोदवारी का है। यहां दर्जनों लोग चारपाई पर पड़े-पड़े जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। सपा सरकार के समय से लगभग 68 करोड़ की लागत से पाइप लाइन बिछाई जा रही है लेकिन यह काम कब तक पूरा होगा, कहना मुश्किल हो गया है। परियोजना में गड़बड़ी बरतने की शिकायतें अलग से हैं।
विज्ञापन
सोनभद्र। नेरुइयादामर टोले के बासो देवी पत्नी सरजू जिनकी उम्र 45 वर्ष है। उन्हें देखकर लगता है कि जैसे उनकी उम्र 80-85 वर्ष हो गई। सरयू की पत्नी के जोड़ों में हर समय दर्द बना हुआ है। स्वास्थ्य कैंप में मिलने वाली दवाएं उनके लिए बेकार हैं। कुछ महीने पहले सरयू की फ़्लोराइड की मार के चलते मौत हो गई। उनकी पत्नी की भी हालत काफी खराब है। वाराणसी के किसी निजी अस्पताल में इलाज करा रहा है। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उन्होंने बताया कि इस गांव में ऐसे कई लोग हैं, जो तिल-तिल कर मौत की ओर बढ़ने को विवश हैं। इसी तरह, परडछ के टोला पडवाकोदवारी में कई लोग चारपाई पर हैं।
जिन गांवों में पानी में फ्लोराइड की अधिकता है, वहां समय-समय पर कैंप लगाकर मरीजों का उपचार किया जाता है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए जल निगम को कई बार पत्र लिखा जा चुका है क्योंकि दूषित पानी का सेवन करने से ग्रामीण फ्लोराइड की चपेट में आ रहे हैं। - डॉ. एसपी सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी