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Sitapur News: सांसद को नहीं मिली जमानत
Thu, 06 Feb 2025 12:26 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
Updated Thu, 06 Feb 2025 12:26 AM IST
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कांग्रेस सांसद राकेश राठौर। (फाइल फोटो)
सीतापुर। दुष्कर्म के आरोपी सांसद राकेश राठौर की नियमित जमानत याचिका बुधवार को खारिज कर दी गई। दोनों पक्षों से दलीलें सुनने के बाद शाम को जिले के एमपी-एमएलए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। अब सांसद को हाईकोर्ट में ही राहत मिल सकती है।
सांसद के अधिवक्ताओं ने तर्क रखा कि सांसद को राजनीतिक द्वेष भावना से ग्रस्त होकर सत्ता पक्ष के विरोधी रंजिशन झूठे मामले में फंसा रहे हैं। पीड़िता ने तहरीर में कथित घटना मार्च 2020 की बताई है। इसमें दिनांक व समय तक अंकित नहीं है।
पांच साल बाद केस दर्ज किया गया। इस देरी का कोई भी स्पष्टीकरण पीड़िता ने अपनी तहरीर में नहीं दी है जिससे स्पष्ट है कि एफआईआर राय मशविरा करके दर्ज कराई गई है जो संदिग्ध प्रतीत होती है। पीड़िता के बयानों में भी विरोधाभास है।
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वहीं पीड़िता के अधिवक्ताओं ने तर्क रखा कि आरोपी सीतापुर सांसद हैं। जनप्रतिनिधि के रूप में कानून का अनुसरण करने का दायित्व एक आम आदमी से अधिक उनका है। पीड़िता पर लगातार केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर पीड़िता को बदनाम किया गया, उस मामले में भी केस दर्ज है। कई ऐसे जनप्रतिनिधियों के मामले में ऐसा हुआ है कि जमानत मिलने के बाद पीड़िता या उसके परिवार को हानि पहुंचाई गई है। जमानत मिलने की स्थिति में हो सकता है कि आरोपी विवेचना को प्रभावित करे।
अग्रिम जमानत उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ से निरस्त किया जा चुका है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद जमानत याचिका को न्यायाधीश ने खारिज कर दिया।
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सांसद के अधिवक्ताओं ने तर्क रखा कि सांसद को राजनीतिक द्वेष भावना से ग्रस्त होकर सत्ता पक्ष के विरोधी रंजिशन झूठे मामले में फंसा रहे हैं। पीड़िता ने तहरीर में कथित घटना मार्च 2020 की बताई है। इसमें दिनांक व समय तक अंकित नहीं है।
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पांच साल बाद केस दर्ज किया गया। इस देरी का कोई भी स्पष्टीकरण पीड़िता ने अपनी तहरीर में नहीं दी है जिससे स्पष्ट है कि एफआईआर राय मशविरा करके दर्ज कराई गई है जो संदिग्ध प्रतीत होती है। पीड़िता के बयानों में भी विरोधाभास है।
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वहीं पीड़िता के अधिवक्ताओं ने तर्क रखा कि आरोपी सीतापुर सांसद हैं। जनप्रतिनिधि के रूप में कानून का अनुसरण करने का दायित्व एक आम आदमी से अधिक उनका है। पीड़िता पर लगातार केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर पीड़िता को बदनाम किया गया, उस मामले में भी केस दर्ज है। कई ऐसे जनप्रतिनिधियों के मामले में ऐसा हुआ है कि जमानत मिलने के बाद पीड़िता या उसके परिवार को हानि पहुंचाई गई है। जमानत मिलने की स्थिति में हो सकता है कि आरोपी विवेचना को प्रभावित करे।
अग्रिम जमानत उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ से निरस्त किया जा चुका है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद जमानत याचिका को न्यायाधीश ने खारिज कर दिया।