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रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड को अर्थशास्त्र का नोबेल: मंदी-महंगाई से निपटने के मॉडल पर काम; क्या है इनकी खोज?
Tue, 13 Oct 2026 04:34 AM IST
निर्मल कांत
एजेंसी, वाशिंगटन।
एजेंसी, वाशिंगटन।
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 13 Oct 2026 04:34 AM IST
सार
अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार 2026 से रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को सम्मानित किया गया है। दोनों ने मंदी और महंगाई को समझने के लिए नए आर्थिक मॉडल तैयार किए। आखिर कैसे इनके शोध ने सरकारों और केंद्रीय बैंकों की आर्थिक नीतियों की सोच बदली? पढ़िए रिपोर्ट में।
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हॉल और वुडफोर्ड
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
वाशिंगटन। कई बार अमेरिका को मंदी से उबारने में मदद करने वाले रॉबर्ट ई. हॉल और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल इकोनॉमी के प्रोफेसर व प्रतिषि्ठत किताब इंटरेस्ट एंड प्राइसेज के लेखक माइकल वुडफोर्ड को 2026 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने सोमवार को इसकी घोषणा की।
अकादमी के अनुसार, दोनों विचारकों ने अर्थव्यवस्था को मंदी और महंगाई के झटकों से बचाने के लिए नए और बेहद सटीक मॉडल तैयार किए हैं। अब तक दुनिया भर की सरकारें और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को एक समग्र तौर पर देखते थे। वे केवल कुल महंगाई या कुल उत्पादन जैसे आंकड़ों को देखकर नीतियां बनाते थे। रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड ने इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल दिया। इन्होंने साबित किया कि पूरी देश की अर्थव्यवस्था लाखों-करोड़ों आम परिवारों और कंपनियों के रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों का ही परिणाम होती है। एजेंसी
भविष्य पर चलता है हमारा खर्च : हॉल
हॉल ने इंसानी व्यवहार और उपभोक्ता मांग का गहरा अध्ययन किया। पहले माना जाता था कि अगर किसी व्यक्ति की जेब में आज पैसा है, तो वह तुरंत उसे खर्च कर देगा। रॉबर्ट हॉल ने दिखाया कि आम इंसान बहुत समझदार होता है। वह आज कितना खर्च या बचत करेगा, यह उसकी आज की जेब से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि उसे अपने भविष्य को लेकर क्या उम्मीदें हैं। अगर लोगों को डर है कि अगले साल मंदी आने वाली है, तो वे आज ही से खर्च कम कर देते हैं और बाजार में अचानक मंदी आ जाती है।
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बाजार में बैंकों की भूमिका अहम : वुडफोर्ड
वुडफोर्ड ने केंद्रीय बैंकों को सिखाया कि ब्याज दरों को तय करते समय केवल वर्तमान की महंगाई न देखें। सबसे जरूरी यह है कि बैंक आम जनता और कंपनियों को यह ‘भरोसा’ दिलाएं कि वे भविष्य में महंगाई को काबू में रखेंगे। जब लोगों का भरोसा बैंकों की बात पर होता है, तो बाजार खुद-ब-खुद सही दिशा में काम करने लगता है। ये बात पूरी दुनिया पर लागू होती है।
ये भी पढ़ें: एसबीआई रिपोर्ट: अर्थशास्त्रियों की मांग- इक्विटी पर एनटीसीजी कर हटे, दावा- पूंजी का बाहर जाना इससे होगा कम
हॉल ने टैक्स सुधारों पर भी किया काम, बनाया फ्लैट टैक्स मॉडल
13 अगस्त 1943 को कैलिफोर्निया में जन्मे रॉबर्ट ने युनिवरि्सटी ऑफ कैलिफोरि्नया से ग्रेजुएशन और फिर एमआईटी से पीएचडी पूरी की। वे एमआईटी और बर्कले में पढ़ाने के बाद 1978 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां वे तब से प्रोफेसर हैं। अमेरिका में जब भी मंदी आती है, तो उसकी आधिकारिक तारीख तय करने वाली कमेटी के वे 1978 से लगातार चेयरमैन हैं। नोबेल के अलावा, उन्होंने अमेरिका में टैक्स सुधारों के लिए चर्चित फ्लैट टैक्स का मॉडल बनाया था। हॉल अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी रह चुके हैं।
भले ही हॉल सरकार की ताकतवर समितियों के अध्यक्ष रहे लेकिन उन्होंने कभी इसका इस्तेमाल लाइमलाइट के लिए नहीं किया। उन्होंने साथी अर्थशास्त्री सुसान वुडवर्ड से शादी की है।
वुडफोर्ड की किताब इंटरेस्ट एंड प्राइसेज मौद्रिक नीति की बाइबिल : 1955 में मैसाचुसेट्स में जन्मे माइकल वुडफोर्ड ने भी एमआईटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की है। फिलहाल वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल इकोनॉमी के प्रोफेसर हैं। वुडफोर्ड की किताब इंटरेस्ट एंड प्राइसेज को आधुनिक मौद्रिक नीति की बाइबिल माना जाता है, जिसके आधार पर पढ़कर दुनिया भर के केंद्रीय बैंकर अपनी नीतियां तय करते हैं। वे प्रतिष्ठित ‘मैकआर्थर जीनियस ग्रांट’ भी जीत चुके हैं।
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अकादमी के अनुसार, दोनों विचारकों ने अर्थव्यवस्था को मंदी और महंगाई के झटकों से बचाने के लिए नए और बेहद सटीक मॉडल तैयार किए हैं। अब तक दुनिया भर की सरकारें और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को एक समग्र तौर पर देखते थे। वे केवल कुल महंगाई या कुल उत्पादन जैसे आंकड़ों को देखकर नीतियां बनाते थे। रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड ने इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल दिया। इन्होंने साबित किया कि पूरी देश की अर्थव्यवस्था लाखों-करोड़ों आम परिवारों और कंपनियों के रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों का ही परिणाम होती है। एजेंसी
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भविष्य पर चलता है हमारा खर्च : हॉल
हॉल ने इंसानी व्यवहार और उपभोक्ता मांग का गहरा अध्ययन किया। पहले माना जाता था कि अगर किसी व्यक्ति की जेब में आज पैसा है, तो वह तुरंत उसे खर्च कर देगा। रॉबर्ट हॉल ने दिखाया कि आम इंसान बहुत समझदार होता है। वह आज कितना खर्च या बचत करेगा, यह उसकी आज की जेब से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि उसे अपने भविष्य को लेकर क्या उम्मीदें हैं। अगर लोगों को डर है कि अगले साल मंदी आने वाली है, तो वे आज ही से खर्च कम कर देते हैं और बाजार में अचानक मंदी आ जाती है।
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बाजार में बैंकों की भूमिका अहम : वुडफोर्ड
वुडफोर्ड ने केंद्रीय बैंकों को सिखाया कि ब्याज दरों को तय करते समय केवल वर्तमान की महंगाई न देखें। सबसे जरूरी यह है कि बैंक आम जनता और कंपनियों को यह ‘भरोसा’ दिलाएं कि वे भविष्य में महंगाई को काबू में रखेंगे। जब लोगों का भरोसा बैंकों की बात पर होता है, तो बाजार खुद-ब-खुद सही दिशा में काम करने लगता है। ये बात पूरी दुनिया पर लागू होती है।
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हॉल ने टैक्स सुधारों पर भी किया काम, बनाया फ्लैट टैक्स मॉडल
13 अगस्त 1943 को कैलिफोर्निया में जन्मे रॉबर्ट ने युनिवरि्सटी ऑफ कैलिफोरि्नया से ग्रेजुएशन और फिर एमआईटी से पीएचडी पूरी की। वे एमआईटी और बर्कले में पढ़ाने के बाद 1978 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां वे तब से प्रोफेसर हैं। अमेरिका में जब भी मंदी आती है, तो उसकी आधिकारिक तारीख तय करने वाली कमेटी के वे 1978 से लगातार चेयरमैन हैं। नोबेल के अलावा, उन्होंने अमेरिका में टैक्स सुधारों के लिए चर्चित फ्लैट टैक्स का मॉडल बनाया था। हॉल अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी रह चुके हैं।
भले ही हॉल सरकार की ताकतवर समितियों के अध्यक्ष रहे लेकिन उन्होंने कभी इसका इस्तेमाल लाइमलाइट के लिए नहीं किया। उन्होंने साथी अर्थशास्त्री सुसान वुडवर्ड से शादी की है।
वुडफोर्ड की किताब इंटरेस्ट एंड प्राइसेज मौद्रिक नीति की बाइबिल : 1955 में मैसाचुसेट्स में जन्मे माइकल वुडफोर्ड ने भी एमआईटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की है। फिलहाल वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल इकोनॉमी के प्रोफेसर हैं। वुडफोर्ड की किताब इंटरेस्ट एंड प्राइसेज को आधुनिक मौद्रिक नीति की बाइबिल माना जाता है, जिसके आधार पर पढ़कर दुनिया भर के केंद्रीय बैंकर अपनी नीतियां तय करते हैं। वे प्रतिष्ठित ‘मैकआर्थर जीनियस ग्रांट’ भी जीत चुके हैं।
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