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इंसानियत परेशान... सिसकियों से सिसक रहा श्मशान
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सीतापुर। मैं श्मशान हूं...। आजकल मेरा दामन आंसुओं के सैलाब में डूबा रहता है। सुबह से शाम तक ही नहीं चिताओं की तपिश सूर्यास्त के बाद भी मुझे झकझोरती रहती है...। सनातन धर्म की सदियों से परंपरा रही है कि सूर्यास्त के बाद चिता को आग नहीं दी जाती है, लेकिन इन दिनों कोरोना सिर्फ इंसानी जानें ही नहीं ले रहा है बल्कि मान्यताओं का भी गला घोंट रहा है। पहले शाम होते ही यहां सन्नाटा पसर जाता था।
इंसानी रूह की छाया भी कभी-कभार बमुश्किल ही पड़ती थी। इतिहास साक्षी है कि मेरे वजूद ने ऐसा मार्मिक मंजर कभी नहीं देखा। लोग आते थे, दिन में तीन-चार चिताएं जलती थी। परंपरा का निर्वहन कर अपनों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर चले जाते थे, लेकिन क्या कहूं... कैसे कहूं... आज मैं कितना दुखी हूं... अपनों को खोने वाले लोगों की सिसकियों से मैं सहमा सा रहता हूं। वैसे में पत्थर दिल हूं।
मोह, माया और जीवित इंसान से मेरा कोई वास्ता, सरोकार नहीं रहता है। जब आत्मा शरीर का साथ छोड़ देती है, शरीर बेजान हो जाता है, तब मेरी ही गोद में लाकर उसे जलाया जाता है। मुझे इसका कोई मलाल नहीं होता था, मेरा जन्म ही इसलिए हुआ है। लेकिन सच कहूं तो आज मलाल, बहुत पीड़ा है। मेरा भी हृदय द्रवित हो उठा है। लोगों की चीत्कारों को सुनकर। मेरा मन भी व्याकुल है।
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लोगों को इतना कष्ट, इतनी पीड़ा सहते यहां कभी नहीं देखा। आज हालात ऐसे हैं कि एक चिता की आग ठंडी नहीं हो पाती, दूसरी सजने लगती। कैसी विपत्ति आई है इंसान के सामने कि अपनों को खोने के बाद उनकी चिताओं को मुखाग्नि देने के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। कोरोना की वजह से दिन पर दिन बिगड़ते हालात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि हमारे पांचों चबूतरों पर रोजाना 15 से 18 चिताएं जल रही हैं।
एक दिन तो ऐसा आ गया था कि मेरी गोद में 25 चिताएं जलाई गईं, उस दिन तो मेरा दिलो दिमाग शून्य हो गया था। रोजाना इतनी संख्या में जलती चिताओं, अपनों के लिए तड़पते लोगों की हालत देख अब मैं तो सभी से यही कह रहा हूं कि कोरोना से बचने के लिए कोविड नियमों का पालन करें। हमारे परिसर में मास्क लगाकर ही आएं।
खुद को और अपने परिवार को इस मुश्किल दौर से बचाकर सुरक्षित रखें, ताकि हमें जलने वाली चिताओं की तपिश से मुक्ति मिल सके और लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखर सके। सभी अपनों के साथ खुश रहें। कोरोना को हराकर मानवता की रक्षा कर सकें। मेरी यही कामना है।
अंतिम संस्कार के लिए करना पड़ रहा इंतजार
रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे अमर उजाला की टीम गोपालघाट स्थित श्मशान पर पहुंची। यहां का मंजर बहुत ही मार्मिक था। लोग अंदर से रोते बिलखते आ रहे थे। एक शव को अंदर ले जाया जा रहा था, कुछ देर में दूसरी गाड़ी शव लेकर आ जा रही थी। टीम ने यहां पर करीब एक घंटा गुजारा। इस दरम्यान तीन शव पहुंचे थे। कार और बाइकों की लाइन लगी थी।
यहां गेट के पास दुकान लगाने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि यहां का यह हाल रोज का है। बताया कि पिछले 15 दिनों से इतने अधिक शव आ रहे हैं। रविवार को श्मशान घाट के सभी चबूतरों पर चिताएं जल रहीं थीं। जगह नहीं बची थी। ऐसे में दो शव अंतिम संस्कार के लिए रखे हुए थे। उनके परिजन चबूतरा खाली होने का इंतजार कर रहे थे। काफी देर बाद लोग अपनों का अंतिम संस्कार कर सके।
बाहर लगानी पड़ीं लकड़ियां
श्मशान घाट पर कितनी चिताएं जलती हैं, इसका अंदाजा कुछ दूर पर खाली पड़े मैदान में सैकड़ों क्विंटल पड़ी लकड़ियों से लगाया जा सकता है। पहले अंतिम संस्कार के लिए परिसर के अंदर से लकड़ियां दी जाती थीं, लेकिन अंदर जगह नहीं रह गई है। इसलिए बाहर लकड़ियां लगाई गई हैं। चिता लगाने के लिए परंपरागत डोम बिरजू के साथ ही तीन-चार अन्य लोगों के भी काम पर लगाया गया है। इससे पहले ये काम अकेले बिरजू ही संभालते थे, पर शवों की संख्या बढ़ाने पर इन लोगों की मदद ली जा रही है।
एक चबूतरे पर जलती हैं चार चिताएं
श्मशान घाट के सामने एक घर में रहने वाले अनुज बताते हैं कि पहले एक चबूतरे पर एक ही शव का अंतिम संस्कार होता था, लेकिन आज कल एक चबूतरे पर तीन से चार शव जलाए जाते हैं। लोग क्या करें, उनके सामने भी मजबूरी है।
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इंसानी रूह की छाया भी कभी-कभार बमुश्किल ही पड़ती थी। इतिहास साक्षी है कि मेरे वजूद ने ऐसा मार्मिक मंजर कभी नहीं देखा। लोग आते थे, दिन में तीन-चार चिताएं जलती थी। परंपरा का निर्वहन कर अपनों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर चले जाते थे, लेकिन क्या कहूं... कैसे कहूं... आज मैं कितना दुखी हूं... अपनों को खोने वाले लोगों की सिसकियों से मैं सहमा सा रहता हूं। वैसे में पत्थर दिल हूं।
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मोह, माया और जीवित इंसान से मेरा कोई वास्ता, सरोकार नहीं रहता है। जब आत्मा शरीर का साथ छोड़ देती है, शरीर बेजान हो जाता है, तब मेरी ही गोद में लाकर उसे जलाया जाता है। मुझे इसका कोई मलाल नहीं होता था, मेरा जन्म ही इसलिए हुआ है। लेकिन सच कहूं तो आज मलाल, बहुत पीड़ा है। मेरा भी हृदय द्रवित हो उठा है। लोगों की चीत्कारों को सुनकर। मेरा मन भी व्याकुल है।
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लोगों को इतना कष्ट, इतनी पीड़ा सहते यहां कभी नहीं देखा। आज हालात ऐसे हैं कि एक चिता की आग ठंडी नहीं हो पाती, दूसरी सजने लगती। कैसी विपत्ति आई है इंसान के सामने कि अपनों को खोने के बाद उनकी चिताओं को मुखाग्नि देने के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। कोरोना की वजह से दिन पर दिन बिगड़ते हालात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि हमारे पांचों चबूतरों पर रोजाना 15 से 18 चिताएं जल रही हैं।
एक दिन तो ऐसा आ गया था कि मेरी गोद में 25 चिताएं जलाई गईं, उस दिन तो मेरा दिलो दिमाग शून्य हो गया था। रोजाना इतनी संख्या में जलती चिताओं, अपनों के लिए तड़पते लोगों की हालत देख अब मैं तो सभी से यही कह रहा हूं कि कोरोना से बचने के लिए कोविड नियमों का पालन करें। हमारे परिसर में मास्क लगाकर ही आएं।
खुद को और अपने परिवार को इस मुश्किल दौर से बचाकर सुरक्षित रखें, ताकि हमें जलने वाली चिताओं की तपिश से मुक्ति मिल सके और लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखर सके। सभी अपनों के साथ खुश रहें। कोरोना को हराकर मानवता की रक्षा कर सकें। मेरी यही कामना है।
अंतिम संस्कार के लिए करना पड़ रहा इंतजार
रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे अमर उजाला की टीम गोपालघाट स्थित श्मशान पर पहुंची। यहां का मंजर बहुत ही मार्मिक था। लोग अंदर से रोते बिलखते आ रहे थे। एक शव को अंदर ले जाया जा रहा था, कुछ देर में दूसरी गाड़ी शव लेकर आ जा रही थी। टीम ने यहां पर करीब एक घंटा गुजारा। इस दरम्यान तीन शव पहुंचे थे। कार और बाइकों की लाइन लगी थी।
यहां गेट के पास दुकान लगाने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि यहां का यह हाल रोज का है। बताया कि पिछले 15 दिनों से इतने अधिक शव आ रहे हैं। रविवार को श्मशान घाट के सभी चबूतरों पर चिताएं जल रहीं थीं। जगह नहीं बची थी। ऐसे में दो शव अंतिम संस्कार के लिए रखे हुए थे। उनके परिजन चबूतरा खाली होने का इंतजार कर रहे थे। काफी देर बाद लोग अपनों का अंतिम संस्कार कर सके।
बाहर लगानी पड़ीं लकड़ियां
श्मशान घाट पर कितनी चिताएं जलती हैं, इसका अंदाजा कुछ दूर पर खाली पड़े मैदान में सैकड़ों क्विंटल पड़ी लकड़ियों से लगाया जा सकता है। पहले अंतिम संस्कार के लिए परिसर के अंदर से लकड़ियां दी जाती थीं, लेकिन अंदर जगह नहीं रह गई है। इसलिए बाहर लकड़ियां लगाई गई हैं। चिता लगाने के लिए परंपरागत डोम बिरजू के साथ ही तीन-चार अन्य लोगों के भी काम पर लगाया गया है। इससे पहले ये काम अकेले बिरजू ही संभालते थे, पर शवों की संख्या बढ़ाने पर इन लोगों की मदद ली जा रही है।
एक चबूतरे पर जलती हैं चार चिताएं
श्मशान घाट के सामने एक घर में रहने वाले अनुज बताते हैं कि पहले एक चबूतरे पर एक ही शव का अंतिम संस्कार होता था, लेकिन आज कल एक चबूतरे पर तीन से चार शव जलाए जाते हैं। लोग क्या करें, उनके सामने भी मजबूरी है।