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Siddharthnagar News: टूरिस्ट परमिट से स्लीपर बसों में ढोई जा रहीं सवारियां
Mon, 22 Jul 2024 03:57 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 22 Jul 2024 03:57 AM IST
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डुमरियागंज, इटवा और बांसी तहसील मुख्यालय से चलती हैं बस
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। टूरिस्ट परमिट से स्लीपर बसों में सवारी ढोई जा रही हैं। डुमरियागंज, बांसी और इटवा में इस प्रकार के बस बेधड़क चल रहे हैं। इसमें सवारियों से अधिक किराया वसूलने के साथ ही खतरे में डाला जा रहा है। बीते सप्ताह उन्नाव में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना के बाद सक्रिय हुए परिवहन विभाग के अधिकारी औपचारिकता ही पूरी कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई शिथिल है।
जनपद के अलग-अलग इलाकों से रिजर्व परमिट की आड़ में सवारियां ढोई जा रही हैं। विभागीय अधिकारी ग्रामीण इलाकों में ऐसी बसों को कार्रवाई कारैवाई के लिए खोज रहे हैं लेकिन अभी भी बढ़नी, गोल्हौरा, बांसी, डुमरियागंज से हर रोज दस से बारह बसें दिल्ली, पंजाब और मुंबई के लिए जाती हैं। बड़ी संख्या में जनपद के लोग दूसरे प्रदेशों और जनपदों में रोजगार के सिलसिले में रहते हैं। दिल्ली, लुधियाना और पंजाब, अंबाला, मुंबई में मजदूरी करने के साथ ही वहां की फैक्टरियों में काम करने के लिए भी मजदूर जाते हैं।
दिल्ली जाने के लिए सरकारी बसें तो हैं। मगर यह सवारी मिलने पर ही चलती हैं, जिससे मजदूरों को इनमें जगह नहीं मिल पाती। पंजाब और मुंबई के लिए भी कोई डायरेक्ट बस न होने के कारण लोग स्लीपर बसों में एडवांस सीट बुक करवा लेते हैं। इसकी वजह से जनपद में स्लीपर बसों का अवैध कारोबार तेजी से बढ़ा है।
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अवैध इसलिए क्योंकि ऐसी अधिकांश बसें टूरिस्ट या रिजर्व पार्टी का परमिट लेती हैं और फुटकर में सवारियां ढोती हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह सब कहीं दूर दराज के गांवों में हो रहा हो। बांसी, इटवा और डुमरियागंज के बैदौला चौराहे पर बाकायदा काउंटर लगाकर स्लीपर बसों की सीटों को बुक किया जाता है। लोगों का लगेज भी बुक कर उनके बताएं पते पर पहुंचाया जाता है। इन मार्ग से ही ऐसी कई बसों का संचालन होता है। इन बसों के संचालकों के पास रिजर्व परमिट या पार्टी परमिट ही होता है। उक्त दोनों ही परमिट पर सवारियों को ढोने की अनुमति नहीं है।
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खुलेआम वसूला जाता है सवारी से पैसा
स्लीपर बसों के लिए किराया सवारियों से खुलेआम वसूला जाता है। मुंबई जाने के लिए 3400-4000 रुपये प्रति सवारी के हिसाब से वसूले जाते हैं। जबकि दिल्ली के लिए 1250-1800 रुपये प्रति सवारी लिए जाते हैं। अगर सवारी किसी एजेंट के माध्यम से आती है तो एजेंट किराया ज्यादा वसूलता है। अपना कमीशन काटकर वह किराया बस संचालक के पास जमा कर देता है।
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नियमित रूट के अलावा बुकिंग पर भी चलती हैं स्लीपर बसें
स्लीपर बसें नियमित रूट के अलावा बुकिंग पर भी चलती हैं। इसके लिए बस मालिक रिजर्व परमिट और पार्टी परमिट बनवाते हैं। दोनों परमिट तीन से सात दिन तक के लिए बनते हैं। तीन दिन के परमिट का शुल्क 550 रुपये और सात दिन की फीस 1000 रुपये होती है। इसमें किसी टूर या वैवाहिक समारोह के लिए वाहन ले जाने की अनुमति होती है। इस परमिट पर फुटकर सवारियों को नहीं ले जाया जा सकता है।
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स्लीपर बसों से सामान लाने में भी होती है जीएसटी की चोरी
स्लीपर बस संचालक सवारियों के साथ माल ढुलाई का काम भी कर रहे है। इस कारण टूरिस्ट बसें जीएसटी की चोरी कराने में अहम भूमिका निभा रही हैं। बसों की छत व डिग्गी में भरकर जीएसटी की चोरी करके सामान ढोने का काम कर रही हैं।
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लगातार हो रही है कार्रवाई
उप संभागीय परिवहन अधिकारी सुरेश कुमार ने कहा कि गलत परमिट पर सवारी ढोने वाली बसों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। टूरिस्ट परमिट से स्लीपर बसों में सवारी ढोई जा रही हैं। डुमरियागंज, बांसी और इटवा में इस प्रकार के बस बेधड़क चल रहे हैं। इसमें सवारियों से अधिक किराया वसूलने के साथ ही खतरे में डाला जा रहा है। बीते सप्ताह उन्नाव में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना के बाद सक्रिय हुए परिवहन विभाग के अधिकारी औपचारिकता ही पूरी कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई शिथिल है।
जनपद के अलग-अलग इलाकों से रिजर्व परमिट की आड़ में सवारियां ढोई जा रही हैं। विभागीय अधिकारी ग्रामीण इलाकों में ऐसी बसों को कार्रवाई कारैवाई के लिए खोज रहे हैं लेकिन अभी भी बढ़नी, गोल्हौरा, बांसी, डुमरियागंज से हर रोज दस से बारह बसें दिल्ली, पंजाब और मुंबई के लिए जाती हैं। बड़ी संख्या में जनपद के लोग दूसरे प्रदेशों और जनपदों में रोजगार के सिलसिले में रहते हैं। दिल्ली, लुधियाना और पंजाब, अंबाला, मुंबई में मजदूरी करने के साथ ही वहां की फैक्टरियों में काम करने के लिए भी मजदूर जाते हैं।
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दिल्ली जाने के लिए सरकारी बसें तो हैं। मगर यह सवारी मिलने पर ही चलती हैं, जिससे मजदूरों को इनमें जगह नहीं मिल पाती। पंजाब और मुंबई के लिए भी कोई डायरेक्ट बस न होने के कारण लोग स्लीपर बसों में एडवांस सीट बुक करवा लेते हैं। इसकी वजह से जनपद में स्लीपर बसों का अवैध कारोबार तेजी से बढ़ा है।
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अवैध इसलिए क्योंकि ऐसी अधिकांश बसें टूरिस्ट या रिजर्व पार्टी का परमिट लेती हैं और फुटकर में सवारियां ढोती हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह सब कहीं दूर दराज के गांवों में हो रहा हो। बांसी, इटवा और डुमरियागंज के बैदौला चौराहे पर बाकायदा काउंटर लगाकर स्लीपर बसों की सीटों को बुक किया जाता है। लोगों का लगेज भी बुक कर उनके बताएं पते पर पहुंचाया जाता है। इन मार्ग से ही ऐसी कई बसों का संचालन होता है। इन बसों के संचालकों के पास रिजर्व परमिट या पार्टी परमिट ही होता है। उक्त दोनों ही परमिट पर सवारियों को ढोने की अनुमति नहीं है।
खुलेआम वसूला जाता है सवारी से पैसा
स्लीपर बसों के लिए किराया सवारियों से खुलेआम वसूला जाता है। मुंबई जाने के लिए 3400-4000 रुपये प्रति सवारी के हिसाब से वसूले जाते हैं। जबकि दिल्ली के लिए 1250-1800 रुपये प्रति सवारी लिए जाते हैं। अगर सवारी किसी एजेंट के माध्यम से आती है तो एजेंट किराया ज्यादा वसूलता है। अपना कमीशन काटकर वह किराया बस संचालक के पास जमा कर देता है।
नियमित रूट के अलावा बुकिंग पर भी चलती हैं स्लीपर बसें
स्लीपर बसें नियमित रूट के अलावा बुकिंग पर भी चलती हैं। इसके लिए बस मालिक रिजर्व परमिट और पार्टी परमिट बनवाते हैं। दोनों परमिट तीन से सात दिन तक के लिए बनते हैं। तीन दिन के परमिट का शुल्क 550 रुपये और सात दिन की फीस 1000 रुपये होती है। इसमें किसी टूर या वैवाहिक समारोह के लिए वाहन ले जाने की अनुमति होती है। इस परमिट पर फुटकर सवारियों को नहीं ले जाया जा सकता है।
स्लीपर बसों से सामान लाने में भी होती है जीएसटी की चोरी
स्लीपर बस संचालक सवारियों के साथ माल ढुलाई का काम भी कर रहे है। इस कारण टूरिस्ट बसें जीएसटी की चोरी कराने में अहम भूमिका निभा रही हैं। बसों की छत व डिग्गी में भरकर जीएसटी की चोरी करके सामान ढोने का काम कर रही हैं।
लगातार हो रही है कार्रवाई
उप संभागीय परिवहन अधिकारी सुरेश कुमार ने कहा कि गलत परमिट पर सवारी ढोने वाली बसों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।