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Siddharthnagar News: बेहतर प्रदर्शन का दबाव बना बच्चों के लिए खतरा, उम्मीदों के भार से मुरझा रहे सपने

Tue, 28 Apr 2026 03:03 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Tue, 28 Apr 2026 03:03 AM IST
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Home Guard recruitment exam concluded safely, highest attendance on last day
सिद्धार्थनगर। तुमसे बहुत उम्मीद है..शर्मिंदा मत करो...देखो, वो तुमसे आगे है...ये वाक्य अब बच्चों को आगे बढ़ाने के बजाय भीतर ही भीतर तोड़ रहे हैं। सिद्धार्थनगर-बस्ती क्षेत्र के शिक्षकों का कहना है कि परीक्षा के समय बच्चों में घबराहट, चिड़चिड़ापन और चुप्पी के मामले तेजी से बढ़े हैं। मेडिकल कॉलेज के मनोविज्ञान, न्यूरोलॉजी विभाग में प्रतिदिन ऐसे मामले पहुंच रहे हैं, जिनमें 10 से 15 वर्ष के बीच के बच्चे असामान्य हरकत कर रहे होते हैं।
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जानकार बताते हैं कि फेल-पास के उधेड़बुन में बस्ती की 15 वर्षीय छात्रा की खुदकुशी ने इस दबाव की सच्चाई उजागर कर दी। लगातार तुलना और नंबर के डर ने उसे भीतर से तोड़ दिया। बोर्ड परीक्षा परिणामों के बीच सिद्धार्थनगर-बस्ती बेल्ट में परिवार की उम्मीदें अब कई किशोरों के लिए प्रेरणा नहीं, मानसिक बोझ बनती जा रही हैं। मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों के अनुसार, हाल के महीनों में किशोरों में तनाव और एंग्जायटी से जुड़े मामलों में करीब 20-30 फीसदी तक बढ़ोतरी का अनुमान है।
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मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक बताते हैं, किशोर दबाव में आकर खुद को अलग-थलग करने लगते हैं। नींद न आना, बेचैनी और लगातार डर के लक्षण बढ़े हैं। हालिया केस में बस्ती की 15 वर्षीय छात्रा, जो पढ़ाई में औसत थी। परिवार की ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में लगातार तनाव में रही। हर टेस्ट के बाद तुलना। घटना से पहले 3 से 4 दिनों से उसने दोस्तों से बात करना बंद कर दिया था, खाना-पीना कम कर दिया था और ज्यादातर समय कमरे में अकेले रहने लगी थी। आखिरकार उसने आत्मघाती कदम उठा लिया।
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स्थानीय शिक्षक अखिलेश त्रिपाठी कहते हैं कि बच्चे अब डांट से नहीं, डर से पढ़ रहे हैं। मन नहीं लगता, बस नंबर का दबाव रहता है। वहीं, कक्षा 10 के छात्र अनुभव का कहना है, नंबर कम आए तो घर में बात करना मुश्किल हो जाता है, इसलिए हमेशा डर बना रहता है। मेडिकल कॉलेज के न्यूरो विभाग के विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष शुक्ल के मुताबिक, किशोरावस्था में लगातार तनाव दिमाग के भावनात्मक हिस्से को अधिक सक्रिय कर देता है, जिससे डर और चिंता बढ़ती है।

सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी लक्ष्मीनारायण का कहना है, जिन बच्चों को सिर्फ जीतना सिखाया जाता है, वे हार नहीं संभाल पाते। परिवार को उन्हें असफलता स्वीकार करना भी सिखाना चाहि। मनोविज्ञान विभाग की काउंसलर अनीता कहती हैं कि बच्चे नंबर से नहीं, माहौल से बनते हैं और वही माहौल अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
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