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काला नमक की खेती बढ़ाने को ‘सागरों’ का ठेका निरस्त हो
Thu, 03 Jan 2019 10:14 PM IST
राकेश पांडेय
siddharthnagar
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Published by: राकेश पांडेय
Updated Thu, 03 Jan 2019 10:14 PM IST
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- फोटो : amar ujala
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सिद्धार्थनगर। एससी-एसटी आयोग के अध्यक्ष और पूर्व डीजीपी बृज लाल ने एक जनपद-एक उत्पाद के तहत काला नमक खेती को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। भेजे गए पत्र में बताया है कि गृह जनपद में स्थापित जमींदारी नहर प्रणाली के सागरों की सिल्ट सफाई समेत मछलीपालन के लिए दिए जाने वाले ठेके को निरस्त किया जाए।
उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग के अध्यक्ष बृज लाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अवगत कराया है कि एक जनपद-एक उत्पाद की नीति के तहत काला नमक धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए चुना गया है। इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हुए ब्रिटिश शासनकाल में मेटुका क्षेत्र में अंग्रेज जमींदार काला नमक धान की खेती स्वयं कराने, जलमार्ग के माध्यम से इंग्लैंड भेजने का जिक्र किया है। यह फसल 6 माह का समय लेती है। अच्छी खुश्बू व पैदावार के लिए लगातार पानी की आवश्यकता होती है।
नेपाल सीमा पर बजहा सागर, मोती सागर, मरथी सागर, मझौली सागर व बटुआ सागर का निर्माण सिंचाई के लिए किया था। पूरे क्षेत्र में नहर से सिंचाई से की व्यवस्था थी। अफसोस कि इन सागरों का ठेका मछलीपालन के लिए दिया जाता है और मछली मारने के दौरान ठेकेदार सागरों का पानी निकाल देते हैं जिससे काला नमक धान की खेती को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। किसान हताश होकर इस खेती से वंचित हो रहे हैं। पूर्व डीजीपी ने मछलीपालन के ठेके को निरस्त करते हुए सिल्ट की सफाई कराने का अनुरोध किया है जिससे एक जनपद-एक उत्पाद योजना के तहत जिले के किसानों को काला नमक धान की खेती का लाभ मिल सके।
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उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग के अध्यक्ष बृज लाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अवगत कराया है कि एक जनपद-एक उत्पाद की नीति के तहत काला नमक धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए चुना गया है। इस विषय पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हुए ब्रिटिश शासनकाल में मेटुका क्षेत्र में अंग्रेज जमींदार काला नमक धान की खेती स्वयं कराने, जलमार्ग के माध्यम से इंग्लैंड भेजने का जिक्र किया है। यह फसल 6 माह का समय लेती है। अच्छी खुश्बू व पैदावार के लिए लगातार पानी की आवश्यकता होती है।
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नेपाल सीमा पर बजहा सागर, मोती सागर, मरथी सागर, मझौली सागर व बटुआ सागर का निर्माण सिंचाई के लिए किया था। पूरे क्षेत्र में नहर से सिंचाई से की व्यवस्था थी। अफसोस कि इन सागरों का ठेका मछलीपालन के लिए दिया जाता है और मछली मारने के दौरान ठेकेदार सागरों का पानी निकाल देते हैं जिससे काला नमक धान की खेती को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। किसान हताश होकर इस खेती से वंचित हो रहे हैं। पूर्व डीजीपी ने मछलीपालन के ठेके को निरस्त करते हुए सिल्ट की सफाई कराने का अनुरोध किया है जिससे एक जनपद-एक उत्पाद योजना के तहत जिले के किसानों को काला नमक धान की खेती का लाभ मिल सके।
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