यूपी चुनाव 2022: पलायन के मुद्दे के बाद भी कैराना में नहीं मिली जीत, इस बार मृगांका-इकरा पर विरासत बचाने का जिम्मा
कैराना में कानून-व्यवस्था का मुद्दा हमेशा से हावी रहा। कानून-व्यवस्था के कारण यह क्षेत्र विकास के मामले में काफी पिछड़ा रहा। इस बार भी कैराना विधानसभा में यह मुद्दा खूब गूंजेगा। कैराना विधानसभा सीट की सियासत वर्षों से पूर्व सांसद हुकुम सिंह और मुनव्वर हसन परिवार के ईद-गिर्द घूमती रही है। इस बार भी दोनों परिवार आमने-सामने हैं।
विस्तार
उत्तर प्रदेश के शामली में कैराना से पलायन का मुद्दा 2017 के चुनाव में भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुआ था। पार्टी इस मुद्दे के सहारे प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची थी। लेकिन कैराना सीट ही भाजपा के हाथ से फिसल गई थी। इस बात की टीस कहीं न कहीं पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी है। भाजपा इस बार कैराना विधानसभा सीट जीतने के लिए पूरे जोर लगाएगी। पार्टी ने एक बार फिर से पूर्व सांसद बाबू हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है।
इस बार कैराना सीट जीतने के लिए भाजपा कौन सी चाल चलेगी, इस पर विपक्ष की भी निगाह है। इस सीट पर सपा-रालोद गठबंधन से नाहिद हसन ने नामांकन किया, लेकिन अगले ही दिन गैंगस्टर के मुकदमे में सरेंडर करने से पहले उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फिलहाल वह 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल में हैं। बसपा ने राजेंद्र सिंह को इस सीट से उतारा है। जबकि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने अभी तक इस सीट पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा नहीं की है।
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-1957 में कांग्रेस के वीरेंद्र वर्मा विधायक बने। 1962 में यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार चंदन सिंह के पास चली गई।
-1997 में कांग्रेस के शफाकत जंग विधायक बने। भारतीय क्रांति दल के चंद्र भान 1969 में, 1974 में कांग्रेस के हुकुम सिंह और 1977 में जनता पार्टी के बशीर अहमद विधायक बने। 1980 में हुकुम सिंह जनता -पार्टी सेक्युलर से चुनाव लड़े और जीते। वह लगातार दो बार विधायक रहे। दूसरी बार वह 1985 में कांग्रेस की टिकट से चुनाव जीते। 1989 में निर्दलीय उम्मीदवार राजेश्वर बंसल की इस सीट से जीत मिली।
इसके बाद जनता दल के मुनव्वर हसन लगातार 1991 और 1993 में विधायक बने। हुकुम सिंह 1996 में बीजेपी की टिकट पर विधायक बने और उन्हें 2002, 2007 और 2012 में लगातार जीत मिली। 2014 में हुकुम सिंह को बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दिया। इस सीट पर उपचुनाव हुए और सपा के नाहिद हसन विधायक बने। 2017 में हुए चुनाव में भी उन्हें जीत मिली।
2017 के चुनाव में पलायन के मुद्दे पर भाजपा को प्रदेश में मिली थी सत्ता
कुल मतदाता 317178
पुरुष 170538
महिला 146640
अन्य 13
जातिगत मतदाता
मुस्लिम 1.37 लाख, गुर्जर 27550, ठाकुर 4930, कश्यप 40423, दलित 9808, सैनी 12190, जाट 24650, ब्राह्मण 8862, वैश्य 6154 नाई/बढ़ई 10400, कोरी 8364, बावरिया 6250, अन्य 22 हजार।
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विधानसभा चुनाव 2017 का रिजल्ट
-नाहिद हसन, सपा- 98830
-मृगांका सिंह, भाजपा- 77668
-जीत का अंतर-21162
इस बार भी कानून-व्यवस्था का मुद्दा रहेगा हावी
कैराना में कानून-व्यवस्था का मुद्दा हमेशा से हावी रहा। कानून-व्यवस्था के कारण यह क्षेत्र विकास के मामले में काफी पिछड़ा रहा। इस बार भी कैराना विधानसभा में यह मुद्दा खूब गूंजेगा। नवंबर माह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कैराना में पीएसी बटालियन कैंप और फायरिंग रेंज समेत कई परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया था। उन्होंने पलायन पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर संकेत दिए थे कि भाजपा विकास के साथ ही कानून-व्यवस्था का मुद्दा लेकर चुनाव में उतरेगी।
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मृगांका, इकरा दोनों पर विरासत बचाने का जिम्माकैराना विधानसभा सीट की सियासत वर्षों से पूर्व सांसद हुकुम सिंह और मुनव्वर हसन परिवार के ईद-गिर्द घूमती रही है। इस बार भी दोनों परिवार आमने-सामने हैं। मृगांका सिंह अपने पिता बाबू हुकुम सिंह की विरासत बचाने के लिए चुनावी मैदान में उतरी हैं। सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशी नाहिद हसन के जेल जाने के बाद उनकी छोटी बहन इकरा हसन सियासी समर में उतरी हैं। इस बार इस सीट पर किसका कब्जा होता है।