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रास्ते में भी बने एक-दूसरे के हमसफर माजिद और सुधीर
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शामली रोडवेज बस स्टेंड पर पहुंचे आजमगढ़ के श्रमिक परिवार के बच्चे।
- फोटो : SHAMLI
रास्ते में भी एक-दूसरे के हमसफर बने माजिद और सुधीर
शामली। चिलचिलाती धूप में प्रवासी श्रमिकों का बेबसी का सफर जारी है। इस पैदल यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव भी नजर आ रहा है। रविवार सुबह नौ बजे शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बैठे आजमगढ़ जिले की अडनपुर तहसील के टीकरी गांव निवासी माजिद, शाहिद, साहिल, सन्नी और सुधीर ने बताया कि वह सभी एक ही गांव के हैं। पानीपत की एक फैक्टरी में काम करते थे। एक ही चूल्हे पर सब के लिए खाना बनता था। लॉकडाउन के बाद जो कुछ था वो खर्च हो गया। खाने के लाले पड़ गए तो पैदल ही गांव के लिए निकल गए। रास्ते में भी अब ये एक-दूसरे के हमसफर बने हैं। रास्ते में माजिद की चप्पल टूटी तो सुधीर और माजिद कुछ देर एक-दूसरे की चप्पल पहनकर काम चलाते रहे। शामली में पता चला कि सरकार बसों से गांव भेज रही है, तो यहां बस के इंतजार में बैठ गए। पेश है एक रिपोर्ट...
पेट की खातिर बच्चों को भी ले गया
माजिद ने बताया कि गांव में उनके परिवार की आर्थिक हालत खराब है। मां, उसकी पत्नी गांव में मजदूरी करती है, लेकिन गुजारा नहीं होता। इसलिए वो अपने दो बेटों जावेद और नजाकत को भी साथ ले आया। दोनों बच्चों, जिनकी उम्र 13 और 10 साल है। जब हम लोग काम पर जाते तो ये कमरे की सफाई, झाड़ू और सबका खाना बनाते थे। कम से कम इन दोनों बच्चों का पेट तो भर रहा था।
अपनी झुग्गी में रहेंगे, किराया तो नहीं मांगेगा कोई
गोंडा जिले के बझट्ठी गांव निवासी राजाराम और बालगोविंद घर के आर्थिक हालात खराब होने पर जनवरी में ही जालंधर गए थे। वहां मजदूरी की और 300 रुपये रोज मिलते थे। सोचा था पांच हजार रुपये महीना घर भेजेंगे, लेकिन डेढ़ महीने बाद ही लॉकडाउन लग गया। काम बंद हो गया और रोटी के भी पैसे नहीं बचे। लंगर, भंडारों में खाना खाया, पर जेब खाली थी, तो परसों पैदल ही घर के लिए निकल गए। कम से कम अपने घर पहुंचकर अपनी झोपड़ी में रहेंगे यहां मकान का किराया तो कोई नहीं मांगेगा।
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मासूमों बच्चों का हाल हुआ बेहाल
रविवार को हरियाणा प्रशासन द्वारा भेजी गई रोडवेज बसों में मौजूद प्रवासी श्रमिकों में कई परिवारों के मासूम बच्चे साथ थे। कैराना के शेल्टर हाउस पर थर्मल स्क्रीनिंग के लिए लगी लंबी कतार में कई प्रवासी महिलाएं खुद पसीने से तरबतर थीं। मासूम बच्चे को गोद में लेकर अपने साड़ी के पल्ले से धूप से बचाने की कोशिश कर रही थी।
खाली बोतल हो तो दे दो, पानी पीना है
शामली रोडवेज बस स्टैंड पर पहुंचे कुछ प्रवासी श्रमिकों के बच्चों को प्यास लगी थी, लेकिन पानी लाने को बोतल नहीं थी। बाजार बंद थे। एक प्रवासी महिला खाली बोतल के लिए इधर उधर घूम रही थी। इस दौरान बाइक पर अपने पति के साथ आ रही एक महिला ने बाइक रुकवाकर परेशान प्रवासी महिला की समस्या पूछी और अपने बैग में रखी पानी की बोतल निकालकर उसे दी और आगे बढ़ गई।
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शामली। चिलचिलाती धूप में प्रवासी श्रमिकों का बेबसी का सफर जारी है। इस पैदल यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव भी नजर आ रहा है। रविवार सुबह नौ बजे शामली रोडवेज बस स्टैंड पर बैठे आजमगढ़ जिले की अडनपुर तहसील के टीकरी गांव निवासी माजिद, शाहिद, साहिल, सन्नी और सुधीर ने बताया कि वह सभी एक ही गांव के हैं। पानीपत की एक फैक्टरी में काम करते थे। एक ही चूल्हे पर सब के लिए खाना बनता था। लॉकडाउन के बाद जो कुछ था वो खर्च हो गया। खाने के लाले पड़ गए तो पैदल ही गांव के लिए निकल गए। रास्ते में भी अब ये एक-दूसरे के हमसफर बने हैं। रास्ते में माजिद की चप्पल टूटी तो सुधीर और माजिद कुछ देर एक-दूसरे की चप्पल पहनकर काम चलाते रहे। शामली में पता चला कि सरकार बसों से गांव भेज रही है, तो यहां बस के इंतजार में बैठ गए। पेश है एक रिपोर्ट...
पेट की खातिर बच्चों को भी ले गया
माजिद ने बताया कि गांव में उनके परिवार की आर्थिक हालत खराब है। मां, उसकी पत्नी गांव में मजदूरी करती है, लेकिन गुजारा नहीं होता। इसलिए वो अपने दो बेटों जावेद और नजाकत को भी साथ ले आया। दोनों बच्चों, जिनकी उम्र 13 और 10 साल है। जब हम लोग काम पर जाते तो ये कमरे की सफाई, झाड़ू और सबका खाना बनाते थे। कम से कम इन दोनों बच्चों का पेट तो भर रहा था।
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अपनी झुग्गी में रहेंगे, किराया तो नहीं मांगेगा कोई
गोंडा जिले के बझट्ठी गांव निवासी राजाराम और बालगोविंद घर के आर्थिक हालात खराब होने पर जनवरी में ही जालंधर गए थे। वहां मजदूरी की और 300 रुपये रोज मिलते थे। सोचा था पांच हजार रुपये महीना घर भेजेंगे, लेकिन डेढ़ महीने बाद ही लॉकडाउन लग गया। काम बंद हो गया और रोटी के भी पैसे नहीं बचे। लंगर, भंडारों में खाना खाया, पर जेब खाली थी, तो परसों पैदल ही घर के लिए निकल गए। कम से कम अपने घर पहुंचकर अपनी झोपड़ी में रहेंगे यहां मकान का किराया तो कोई नहीं मांगेगा।
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मासूमों बच्चों का हाल हुआ बेहाल
रविवार को हरियाणा प्रशासन द्वारा भेजी गई रोडवेज बसों में मौजूद प्रवासी श्रमिकों में कई परिवारों के मासूम बच्चे साथ थे। कैराना के शेल्टर हाउस पर थर्मल स्क्रीनिंग के लिए लगी लंबी कतार में कई प्रवासी महिलाएं खुद पसीने से तरबतर थीं। मासूम बच्चे को गोद में लेकर अपने साड़ी के पल्ले से धूप से बचाने की कोशिश कर रही थी।
खाली बोतल हो तो दे दो, पानी पीना है
शामली रोडवेज बस स्टैंड पर पहुंचे कुछ प्रवासी श्रमिकों के बच्चों को प्यास लगी थी, लेकिन पानी लाने को बोतल नहीं थी। बाजार बंद थे। एक प्रवासी महिला खाली बोतल के लिए इधर उधर घूम रही थी। इस दौरान बाइक पर अपने पति के साथ आ रही एक महिला ने बाइक रुकवाकर परेशान प्रवासी महिला की समस्या पूछी और अपने बैग में रखी पानी की बोतल निकालकर उसे दी और आगे बढ़ गई।

शामली रोडवेज बस स्टेंड पर बैठे आजमगढ़ के प्रवासी श्रमिक।- फोटो : SHAMLI

बहुत गर्मी है : शामली रोडवेज बस स्टैंड पर पानी पीकर प्यास बुझाता प्रवासी श्रमिक।- फोटो : SHAMLI