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जर्मनी से लाई हुई लालटेन को दशकों से संजोकर रखे हुए है परिवार, नहीं टूटी चिमनी
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जर्मनी में निर्मित लालटेन।
- फोटो : SHAMLI
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चौसाना(शामली)। गढ़ी हसनपुर में एक परिवार विरासत में मिली लालटेन को दशकों से संजोकर रखे हुए हैं। डिबिया से मोहल्ला रोशन होने वाले जमाने में जब जर्मनी से लाई गई लालटेन जली तो सारे गांव में आकर्षण का केंद्र बन गई थी। वर्ष 2007 में परिवार मे बंटवारा हुआ तो एक वारिस ने अपने हिस्से आई लाखों की कीमत की सात बीघा कृषि भूमि को छोड़कर पूर्वजों की इस लालटेन को विरासत में लिया।
आज जहां युवा अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा करने में भी हिचकिचाते है, वहीं ऊन ब्लॉक के गढ़ी हसनपुर निवासी स्वर्गीय हशमत अली का परिवार पिछले लगभग 150 सालों से अपने दादा जमायत अली से विरासत में मिली जर्मनी से लाई गई, लालटेन को संभाल कर रखे हुए। हसमत अली के दादा जमायत अली जर्मनी की यात्रा करने के बाद जब अपने वतन हिंदुस्तान वापस लौटे थे। वह उस समय लालटेन को खरीदकर लाए थे। बताते हैं कि जिस समय जर्मनी से लालटेन को लाया गया था तो उस जमाने में घरों को रोशन करने के लिए डिबिया ही एक मात्र साधन हुआ करती थी। लालटेन पर कंपनी नाम ‘फ्यूल हेंड़ मेड इन जर्मनी’ अंकित है। साथ ही इसकी चिमनी पर भी कंपनी का नाम अंकित है। इसकी खास बात यह है कि यह अन्य लालटेन से तेज रोशनी देती है। आज 3 पीढ़ी बीतने के बाद भी यह परिवार विरासत मे मिली लालटेन को दिल से लगाकर रखता है।
हसमत अली के 2007 मे देहांत हो जाने के बाद उनके पांच बेटों मे बंटवारा हो गया। जिसमें सभी को सात-सात बीघा जमीन बंटवारे मे मिलनी तय हुई, लेकिन तीसरे बेटे वाहिद हसन ने पुश्तैनी सात बीघा जमीन को छोड़ दिया और अपने परदादा की जर्मनी से लाई गई लालटेन को लिया। जो आज भी उनके घर की अमानत बनी हुई है।
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150 साल से चिमनी भी है सुरक्षित
जर्मनी की लालटेन को हिंदुस्तान में आए हुए लगभग 150 साल बीत जाने के बाद आज भी इसकी चिमनी ज्यों की त्यों है। इससे पता चलता है कि इस विरासत को परिवारवालों ने कितना संभालकर रखा है। दूरदराज से आए लोग जब गढ़ी हसनपुर में अपनी रिश्तेदारियों में आते हैं और चर्चाओं में लालटेन की विरासत का जिक्र होता है, तो सभी के मन में लालटेन को अपनी आंखों से देखनी की ललक होती है।
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आज जहां युवा अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा करने में भी हिचकिचाते है, वहीं ऊन ब्लॉक के गढ़ी हसनपुर निवासी स्वर्गीय हशमत अली का परिवार पिछले लगभग 150 सालों से अपने दादा जमायत अली से विरासत में मिली जर्मनी से लाई गई, लालटेन को संभाल कर रखे हुए। हसमत अली के दादा जमायत अली जर्मनी की यात्रा करने के बाद जब अपने वतन हिंदुस्तान वापस लौटे थे। वह उस समय लालटेन को खरीदकर लाए थे। बताते हैं कि जिस समय जर्मनी से लालटेन को लाया गया था तो उस जमाने में घरों को रोशन करने के लिए डिबिया ही एक मात्र साधन हुआ करती थी। लालटेन पर कंपनी नाम ‘फ्यूल हेंड़ मेड इन जर्मनी’ अंकित है। साथ ही इसकी चिमनी पर भी कंपनी का नाम अंकित है। इसकी खास बात यह है कि यह अन्य लालटेन से तेज रोशनी देती है। आज 3 पीढ़ी बीतने के बाद भी यह परिवार विरासत मे मिली लालटेन को दिल से लगाकर रखता है।
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हसमत अली के 2007 मे देहांत हो जाने के बाद उनके पांच बेटों मे बंटवारा हो गया। जिसमें सभी को सात-सात बीघा जमीन बंटवारे मे मिलनी तय हुई, लेकिन तीसरे बेटे वाहिद हसन ने पुश्तैनी सात बीघा जमीन को छोड़ दिया और अपने परदादा की जर्मनी से लाई गई लालटेन को लिया। जो आज भी उनके घर की अमानत बनी हुई है।
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150 साल से चिमनी भी है सुरक्षित
जर्मनी की लालटेन को हिंदुस्तान में आए हुए लगभग 150 साल बीत जाने के बाद आज भी इसकी चिमनी ज्यों की त्यों है। इससे पता चलता है कि इस विरासत को परिवारवालों ने कितना संभालकर रखा है। दूरदराज से आए लोग जब गढ़ी हसनपुर में अपनी रिश्तेदारियों में आते हैं और चर्चाओं में लालटेन की विरासत का जिक्र होता है, तो सभी के मन में लालटेन को अपनी आंखों से देखनी की ललक होती है।

लालटेन पर अंकित मेड इन जर्मनी और कंपनी का नाम।- फोटो : SHAMLI

जर्मनी की लालटेन के साथ वाहिद हसन।- फोटो : SHAMLI