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खुशहाली का राज है परिवार की एकजुटता
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वृद्वाश्रम में आपस में बतियाती महिलाएं
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। एकाकी परिवारों के बढ़ते चलन से संबंधों के तार टूट रहे हैं। संयुक्त परिवार की अपेक्षा एकाकी परिवारों की नई पीढ़ी संबंधों, रिश्तों से दूर होती जा रही है। न उनमें एक दूसरे के प्रति भावनात्मक लगाव है और न ही आत्मीयता। काम धंधे की तलाश में घर से बाहर दूर शहरों की तरफ पलायन भी संयुक्त परिवार के बिखराव की वजह बना है। हालांकि गांव देहात में अभी भी बहुत से ऐसे परिवार हैं जो कई पीढ़ियों के सदस्यों को एक छत के नीचे समेटे संयुक्त परिवार के रूप में समाज के लिए मिसाल बने हैं। विश्व परिवार दिवस के मौके पर कुछ ऐसे ही परिवारों के मुखिया से बात की तो उनका कहना था कि उनकी खुशहाली का राज ही परिवार की एकजुटता है।
चार पीढ़ियों को एक सूत्र में पिरोए हैं लीला देवी
रामपुर मनिहारान के मुहल्ला कायस्तान निवासी लीला देवी (102) अपनी चार पीढ़ियों के 16 सदस्यों के साथ संयुक्त परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभा रही हैं। दोनो बेटों की मौत के बावजूद उन्होंने परिवार को बिखरने नहीं दिया। वे अपनी दोनों बहुओं और उनके बच्चों को एक सूत्र में बांध कर रखे हैं। तीन पौत्र और छह प्रपौत्र के भरे पूरे परिवार की खुशियों का राज ही लीला देवी अपने परिवार की एकजुटता को मानती हैं। वे कहती हैं कि जीवन में तमाम दिक्कतें आईं पति और दोनों बेटों का उनके सामने निधन हो गया, लेकिन बच्चों ने उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
चार भाइयों के परिवारों का साथ छूटने का आज भी है मलाल
नागल के गांव इसहाकपुर निवासी किसान जगदीश प्रसाद (86) अपने दो बेटों रामनाथ एवं रामेश्वर के साथ रह कर संयुक्त परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनके तीन पौत्र और तीन पौत्रियां हैं जिनमें से एक पौत्री की वे शादी भी कर चुके हैं। वे बताते हैं कि वे अपने चार भाइयों के परिवारों के साथ दो साल पहले तक इकट्ठे रह रहे थे। उनकी उनसे अलग होने की जरा भी इच्छा नहीं थी, लेकिन परिस्थितियों को ऐसा मंजूर नहीं था। एकल परिवारों के चलन को वे संस्कारहीनता और समाज के बिखराव के रुप में देखते हैं।
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एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं परिवार के 21 सदस्य
बड़गांव की अगरवती देवी पति जगमाल सिंह की मौत के बाद पांच बेटों ऋषिपाल, नक्षत्रपाल, श्रीभगवान, राधेश्याम और राजपाल के परिवारों को गुलदस्ते की तरह समेटे हैं। परिवार के 21 सदस्य एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं। अगरवती बताती है कि बड़ा भाई ऋषिपाल परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी निभाता है। इकट्ठे ही उनका परिवार पांच लड़कियों की शादी कर चुका है। कुल 15 बीघा खेती की जमीन के स्वामित्व वाले इस परिवार की खुशहाली का राज ही संयुक्त परिवार है। अगरवती कहती हैं कि संयुक्त परिवार में खुशियां दुगनी हो जाती हैं और दुखों को आपस में बांट कर कम कर लिया जाता है।
आज जरा सी बात पर बिखर रहे हैं परिवार
छुटमलपुर के फतेहपुर स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाली बुल्लो देवी (70) अपने पुराने दिनों को याद कर कहती हैं कि उनकी दादी अपनी पौत्र वधू तक को पीट देती थीं और क्या मजाल जो परिवार में बिखराव की नौबत आ जाए। आज के वक्त में तो बहू को जरा भी कुछ कह दो तो वह अपने बर्तन अलग रख लेती हैं। वे बताती हैं कि उनके बचपन में 30 लोगों का कुनबा एक ही चूल्हे पर रोटी पका कर खाता था।
एकल परिवार के चलन ने बढ़ाई वृद्धाश्रमों की अहमियत
वृद्धाश्रम में रह रहे जगपाल सिंह (68) कहते हैं कि एकल परिवार के चलन ने ही तो इन वृद्धाश्रमों की अहमियत बढ़ा दी है। पहले संयुक्त परिवार थे तो बड़े बुजुर्गों का सम्मान भी था। अब एकल परिवारों में बच्चों को दादा दादी नाना नानी के रिश्ते की अहमियत पता है और न उनके लिए उनके मन में कोई अपनापन है।
वृद्धाश्रम में परिवार की तरह रहते हैं साठ महिला पुरुष बुजुर्ग
फतेहपुर के वृद्धाश्रम में करीब 60 महिला पुरुष रहते हैं। इनका कहना है कि उनके परिवार पीछे छूट चुके हैं, लेकिन इस वृद्धाश्रम में उन्हें बेहद सुकून मिलता है। किसी का दस तो किसी का पांच सदस्यों वाला परिवार छूटा है यहां तो साठ सदस्यों का परिवार मिला है। बुजुर्गों का कहना है कि इस संयुक्त परिवार में उन्हें काफी अपनापन महसूस होता है। कई बार वैचारिक मतभिन्नता के बावजूद वे एक दो दिन की नाराजगी के बाद फिर एक साथ बैठ कर गप्पे मारते हैं। इन बुजुर्गों का मानना है कि पाश्चात्य चकाचौंध से प्रभावित होकर ही एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है।
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चार पीढ़ियों को एक सूत्र में पिरोए हैं लीला देवी
रामपुर मनिहारान के मुहल्ला कायस्तान निवासी लीला देवी (102) अपनी चार पीढ़ियों के 16 सदस्यों के साथ संयुक्त परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभा रही हैं। दोनो बेटों की मौत के बावजूद उन्होंने परिवार को बिखरने नहीं दिया। वे अपनी दोनों बहुओं और उनके बच्चों को एक सूत्र में बांध कर रखे हैं। तीन पौत्र और छह प्रपौत्र के भरे पूरे परिवार की खुशियों का राज ही लीला देवी अपने परिवार की एकजुटता को मानती हैं। वे कहती हैं कि जीवन में तमाम दिक्कतें आईं पति और दोनों बेटों का उनके सामने निधन हो गया, लेकिन बच्चों ने उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
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चार भाइयों के परिवारों का साथ छूटने का आज भी है मलाल
नागल के गांव इसहाकपुर निवासी किसान जगदीश प्रसाद (86) अपने दो बेटों रामनाथ एवं रामेश्वर के साथ रह कर संयुक्त परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनके तीन पौत्र और तीन पौत्रियां हैं जिनमें से एक पौत्री की वे शादी भी कर चुके हैं। वे बताते हैं कि वे अपने चार भाइयों के परिवारों के साथ दो साल पहले तक इकट्ठे रह रहे थे। उनकी उनसे अलग होने की जरा भी इच्छा नहीं थी, लेकिन परिस्थितियों को ऐसा मंजूर नहीं था। एकल परिवारों के चलन को वे संस्कारहीनता और समाज के बिखराव के रुप में देखते हैं।
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एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं परिवार के 21 सदस्य
बड़गांव की अगरवती देवी पति जगमाल सिंह की मौत के बाद पांच बेटों ऋषिपाल, नक्षत्रपाल, श्रीभगवान, राधेश्याम और राजपाल के परिवारों को गुलदस्ते की तरह समेटे हैं। परिवार के 21 सदस्य एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं। अगरवती बताती है कि बड़ा भाई ऋषिपाल परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी निभाता है। इकट्ठे ही उनका परिवार पांच लड़कियों की शादी कर चुका है। कुल 15 बीघा खेती की जमीन के स्वामित्व वाले इस परिवार की खुशहाली का राज ही संयुक्त परिवार है। अगरवती कहती हैं कि संयुक्त परिवार में खुशियां दुगनी हो जाती हैं और दुखों को आपस में बांट कर कम कर लिया जाता है।
आज जरा सी बात पर बिखर रहे हैं परिवार
छुटमलपुर के फतेहपुर स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाली बुल्लो देवी (70) अपने पुराने दिनों को याद कर कहती हैं कि उनकी दादी अपनी पौत्र वधू तक को पीट देती थीं और क्या मजाल जो परिवार में बिखराव की नौबत आ जाए। आज के वक्त में तो बहू को जरा भी कुछ कह दो तो वह अपने बर्तन अलग रख लेती हैं। वे बताती हैं कि उनके बचपन में 30 लोगों का कुनबा एक ही चूल्हे पर रोटी पका कर खाता था।
एकल परिवार के चलन ने बढ़ाई वृद्धाश्रमों की अहमियत
वृद्धाश्रम में रह रहे जगपाल सिंह (68) कहते हैं कि एकल परिवार के चलन ने ही तो इन वृद्धाश्रमों की अहमियत बढ़ा दी है। पहले संयुक्त परिवार थे तो बड़े बुजुर्गों का सम्मान भी था। अब एकल परिवारों में बच्चों को दादा दादी नाना नानी के रिश्ते की अहमियत पता है और न उनके लिए उनके मन में कोई अपनापन है।
वृद्धाश्रम में परिवार की तरह रहते हैं साठ महिला पुरुष बुजुर्ग
फतेहपुर के वृद्धाश्रम में करीब 60 महिला पुरुष रहते हैं। इनका कहना है कि उनके परिवार पीछे छूट चुके हैं, लेकिन इस वृद्धाश्रम में उन्हें बेहद सुकून मिलता है। किसी का दस तो किसी का पांच सदस्यों वाला परिवार छूटा है यहां तो साठ सदस्यों का परिवार मिला है। बुजुर्गों का कहना है कि इस संयुक्त परिवार में उन्हें काफी अपनापन महसूस होता है। कई बार वैचारिक मतभिन्नता के बावजूद वे एक दो दिन की नाराजगी के बाद फिर एक साथ बैठ कर गप्पे मारते हैं। इन बुजुर्गों का मानना है कि पाश्चात्य चकाचौंध से प्रभावित होकर ही एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है।

अपने परिवार के साथ बड़गांव की अगरवती देवी- फोटो : SAHARANPUR

मोहल्ला कायस्तान में अपने परिवार के साथ लीला देवी- फोटो : SAHARANPUR

इसहाकपुर में अपने परिवार के साथ जगदीश प्रसाद- फोटो : SAHARANPUR