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मिट्टी के नौ कलश रख अष्टमी को करें दुर्गा के नौ रूपों की पूजा
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संत सहजानन्द महाराज
- फोटो : SAHARANPUR
शांकभरी (सहारनपुर)। सिद्ध पीठ शाकंभरी देवी स्थित शंकराचार्य आश्रम प्रभारी एवं अखिल भारतीय संत संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष भैरवतंत्राचार्य संत सहजानंद जी महाराज ने बताया कि महाष्टमी के दिन देवी दुर्गा की पूजा का विधान ठीक महासप्तमी की तरह ही होता है। हालांकि इस दिन प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाती है। महाष्टमी के दिन महास्नान के बाद मां दुर्गा का षोडशोपचार पूजन किया जाता है।
महाष्टमी के दिन मिट्टी के नौ कलश रखे जाते हैं और देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान कर उनका आह्वान करें। महाष्टमी के दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। महानवमी पर देवी दुर्गा की आराधना महिषासुर मर्दिनी के तौर पर की जाती है। इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। पौराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए गर्मी, सर्दी और बरसात का बिना परवाह किए कठोर तप किया था जिसके कारण उनका रंग काला हो गया था। उसके बाद शिवजी उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और गंगा के पवित्र जल से स्नान कराया जिसके बाद देवी का रंग गोरा हो गया। तब से उन्हें महागौरी कहा जाने लगा।
बताया कि महादैत्य रूरु हिरण्याक्ष वंश में हुआ था। इसी रूरु का एक पुत्र दुर्गम यानि दुर्गमासुर था। उसने ब्रह्मा जी की तपस्या कर चारों वेदों को अपने अधीन कर लिया। जिससे वेदों की अनुपस्थिति के चलते समस्त क्रियाएं लुप्त हो गयीं। जिसके कारण ब्राह्मणों ने अपना धर्म त्याग दिया, इससे चौतरफा हाहाकार मच गया। ब्राह्मणों के धर्म विहीन होने से यज्ञ-अनुष्ठान बंद होने से देवताओं की शक्ति भी क्षीण होने लगी। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से भयंकर अकाल पड़ा, जिससे लोग मरने लगे। तब देवताओं ने देवी जगदंबा की उपासना की। उनकी आराधना से महामाया मां भुवनेश्वरी आयोनिजा रूप में प्रकट हुईं।
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समस्त सृष्टि की ऐसी दुर्दशा देख जगदंबा का हृदय पसीज गया और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। इससे मां के शरीर पर सौ नेत्र प्रकट हुए। देवी के इस स्वरूप को शताक्षी के नाम से जाना गया। मां के अवतार की कृपा से संसार में महान वृष्टि हुई और नदी- तालाब वापस जल से भर गये। देवताओं ने उस समय मां की शताक्षी देवी नाम से आराधना की। वहीं ये भी कहा जाता है कि शताक्षी देवी ने जब दिव्य सौम्य स्वरूप धारण किया। तब वह चतुर्भुजी स्वरूप में कमलासन पर विराजमान थीं। मां के हाथों में कमल, बाण, शाक-फल और एक तेजस्वी धनुष था। इस स्वरूप में माता ने अपने शरीर से अनेकों शाक प्रकट किए। जिनको खाकर संसार की क्षुधा शांत हुई। इसी दिव्य रूप में उन्होंने असुर दुर्गमासुर और अन्य दैत्यों का संहार किया। तब देवी शाकंभरी रूप में पूजित हुईं।
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महाष्टमी के दिन मिट्टी के नौ कलश रखे जाते हैं और देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान कर उनका आह्वान करें। महाष्टमी के दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। महानवमी पर देवी दुर्गा की आराधना महिषासुर मर्दिनी के तौर पर की जाती है। इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। पौराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए गर्मी, सर्दी और बरसात का बिना परवाह किए कठोर तप किया था जिसके कारण उनका रंग काला हो गया था। उसके बाद शिवजी उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और गंगा के पवित्र जल से स्नान कराया जिसके बाद देवी का रंग गोरा हो गया। तब से उन्हें महागौरी कहा जाने लगा।
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बताया कि महादैत्य रूरु हिरण्याक्ष वंश में हुआ था। इसी रूरु का एक पुत्र दुर्गम यानि दुर्गमासुर था। उसने ब्रह्मा जी की तपस्या कर चारों वेदों को अपने अधीन कर लिया। जिससे वेदों की अनुपस्थिति के चलते समस्त क्रियाएं लुप्त हो गयीं। जिसके कारण ब्राह्मणों ने अपना धर्म त्याग दिया, इससे चौतरफा हाहाकार मच गया। ब्राह्मणों के धर्म विहीन होने से यज्ञ-अनुष्ठान बंद होने से देवताओं की शक्ति भी क्षीण होने लगी। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से भयंकर अकाल पड़ा, जिससे लोग मरने लगे। तब देवताओं ने देवी जगदंबा की उपासना की। उनकी आराधना से महामाया मां भुवनेश्वरी आयोनिजा रूप में प्रकट हुईं।
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समस्त सृष्टि की ऐसी दुर्दशा देख जगदंबा का हृदय पसीज गया और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। इससे मां के शरीर पर सौ नेत्र प्रकट हुए। देवी के इस स्वरूप को शताक्षी के नाम से जाना गया। मां के अवतार की कृपा से संसार में महान वृष्टि हुई और नदी- तालाब वापस जल से भर गये। देवताओं ने उस समय मां की शताक्षी देवी नाम से आराधना की। वहीं ये भी कहा जाता है कि शताक्षी देवी ने जब दिव्य सौम्य स्वरूप धारण किया। तब वह चतुर्भुजी स्वरूप में कमलासन पर विराजमान थीं। मां के हाथों में कमल, बाण, शाक-फल और एक तेजस्वी धनुष था। इस स्वरूप में माता ने अपने शरीर से अनेकों शाक प्रकट किए। जिनको खाकर संसार की क्षुधा शांत हुई। इसी दिव्य रूप में उन्होंने असुर दुर्गमासुर और अन्य दैत्यों का संहार किया। तब देवी शाकंभरी रूप में पूजित हुईं।