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राजनीति की बिसात पर मोहरा बन रहे दलित
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Thu, 11 May 2017 12:28 AM IST
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राजनीति
- फोटो : demo
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सहारनपुर के सड़क दूधली में दलित मुस्लिम टकराव हुआ तो भाजपा आक्रामक थी, शब्बीरपुर में दलित स्वर्ण टकराव हुआ तो बसपा और दलित संगठन भीम आर्मी ने आक्रामक रुख अपना लिया है।
25 दिन के भीतर हुई इन दो घटनाओं ने सहारनपुर के भाईचारे को खतरे में डाल दिया है। सियासत की बिसात पर दांव खेलने वाले हाथ अलग है, निशाने अलग है, सियासी फायदे- नुकसान का गणित अलग है, लेकिन दांव पर दलित ही है। दलितों के नाम पर उन्हें ही मोहरा बनाया जा रहा है।
कहीं पाले से खिसक गए दलितों को वापस अपने पाले में खींचकर लाने की कसक है तो कहीं इनको अपने पाले में लाकर हिंदुत्व एजेंडे की धार को और तेज करने की मंशा। सियासत के दो पाटों के बीच पिस दलित ही रहे हैं। ।
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प्रशासन भी इस हिंसा के पीछे की सियासत को समझ रहा है और यही कारण है कि बवाल के अगले दिन ही सर्वदलीय बैठक के जरिए इसे थामने की कोशिश की।
बंपर बहुमत से सूबे की सत्ता में आई भाजपा सरकार ने अपना चुनावी शंखनाद सहारनपुर से किया था, मगर उसी सहारनपुर से भाजपा के किले को भेदने की तैयारी की जा रही है।
पिछले कई दिनों से उबाल मार रहे बवाल के पीछे सियासी दलों का परोक्ष रूप से हाथ है। इस पूरे बवाल को हवा देकर भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे की धार को जातीय संघर्ष के तीरों से कुंद करना चाह रहे हैं।
कारण, हिंदुत्व के ताने-बाने से अलग हुआ तो बसपा को इसका सीधा फायदा मिल सकता है। उधर, हाशिए पर चला गया पश्चिमी यूपी का मुस्लिम वोट भी भाजपा के मुकाबले के लिए उसे विकल्प के रूप में देखेगा।
2014 में हुए लोकसभा चुनाव और फिर 2017 में विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच भाजपा ने दलित मतों में जबरदस्त सेंधमारी की। इसका नतीजा यह रहा कि बसपा अपनी सियासी जमीन नहीं बचा पाई।
उधर, मुस्लिम कांग्रेस और सपा गठबंधन के साथ चला गया। अपने बेहद मजबूत गढ़ सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली में बसपा खाता तक नहीं खोल पाई। यही कारण है कि अब सियासी दल भाजपा से मुकाबले से पहले उसके किले को तहस-नहस करना चाहती हैं।
यही कारण है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर कांड में राजपूत-दलित संघर्ष को सूबे की सत्ता तक से जोड़ने से सियासी लोग गुरेज नहीं कर रहे हैं। बता दें, सहारनपुर में वर्ष 2007 में पांच, 2012 में चार विधायक बसपा के रहे थे।
ऐसे ही मुजफ्फरनगर में तीन सीटों पर बसपा ने जीत हासिल की थी। इसके अलावा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली सहित लोकसभा पर बसपा से दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जरिए जीत हासिल कर ली थी। मगर, वर्ष 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में विरोधियों पटखनी देते हुए भाजपा ने जबरदस्त बढ़त बनाई।
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25 दिन के भीतर हुई इन दो घटनाओं ने सहारनपुर के भाईचारे को खतरे में डाल दिया है। सियासत की बिसात पर दांव खेलने वाले हाथ अलग है, निशाने अलग है, सियासी फायदे- नुकसान का गणित अलग है, लेकिन दांव पर दलित ही है। दलितों के नाम पर उन्हें ही मोहरा बनाया जा रहा है।
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कहीं पाले से खिसक गए दलितों को वापस अपने पाले में खींचकर लाने की कसक है तो कहीं इनको अपने पाले में लाकर हिंदुत्व एजेंडे की धार को और तेज करने की मंशा। सियासत के दो पाटों के बीच पिस दलित ही रहे हैं। ।
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प्रशासन भी इस हिंसा के पीछे की सियासत को समझ रहा है और यही कारण है कि बवाल के अगले दिन ही सर्वदलीय बैठक के जरिए इसे थामने की कोशिश की।
बंपर बहुमत से सूबे की सत्ता में आई भाजपा सरकार ने अपना चुनावी शंखनाद सहारनपुर से किया था, मगर उसी सहारनपुर से भाजपा के किले को भेदने की तैयारी की जा रही है।
पिछले कई दिनों से उबाल मार रहे बवाल के पीछे सियासी दलों का परोक्ष रूप से हाथ है। इस पूरे बवाल को हवा देकर भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे की धार को जातीय संघर्ष के तीरों से कुंद करना चाह रहे हैं।
कारण, हिंदुत्व के ताने-बाने से अलग हुआ तो बसपा को इसका सीधा फायदा मिल सकता है। उधर, हाशिए पर चला गया पश्चिमी यूपी का मुस्लिम वोट भी भाजपा के मुकाबले के लिए उसे विकल्प के रूप में देखेगा।
2014 में हुए लोकसभा चुनाव और फिर 2017 में विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच भाजपा ने दलित मतों में जबरदस्त सेंधमारी की। इसका नतीजा यह रहा कि बसपा अपनी सियासी जमीन नहीं बचा पाई।
उधर, मुस्लिम कांग्रेस और सपा गठबंधन के साथ चला गया। अपने बेहद मजबूत गढ़ सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली में बसपा खाता तक नहीं खोल पाई। यही कारण है कि अब सियासी दल भाजपा से मुकाबले से पहले उसके किले को तहस-नहस करना चाहती हैं।
यही कारण है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर कांड में राजपूत-दलित संघर्ष को सूबे की सत्ता तक से जोड़ने से सियासी लोग गुरेज नहीं कर रहे हैं। बता दें, सहारनपुर में वर्ष 2007 में पांच, 2012 में चार विधायक बसपा के रहे थे।
ऐसे ही मुजफ्फरनगर में तीन सीटों पर बसपा ने जीत हासिल की थी। इसके अलावा वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली सहित लोकसभा पर बसपा से दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जरिए जीत हासिल कर ली थी। मगर, वर्ष 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में विरोधियों पटखनी देते हुए भाजपा ने जबरदस्त बढ़त बनाई।