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क्रांतिकारियों की गाथा बताएगा सरसावा का स्वराज मंदिर
Updated Fri, 26 Jan 2018 01:10 AM IST
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सरसावा (सहारनपुर)। नगर के निवासी अनूठे मंदिर में गणतंत्र दिवस मनाते हैं। ये मंदिर किसी धर्म के देवी देवता अथवा भगवान का नहीं अपितु देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराकर आने वाली पीढ़ी के लिए आजादी की महकती हवा की खातिर जान गंवाने क्रांतिकारियों की याद में निर्मित हुआ है।
हम बात कर रहे हैं सरसावा में स्थित स्वराज मंदिर की। जिसके संस्थापक तो अब नहीं है, लेकिन उनके वंशज अब भी स्वराज मंदिर की परिकल्पना को साकार करने में जुटे हुए हैं। स्वराज मंदिर के संयोजक शशीरमण कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर की अवधारणा उनके पिता तथा स्वतंत्रता सेनानी श्यामलाल कौशिक के मन में सन 1970 में आयी थी। उनके पिता का विचार था कि हम देवी देवताओं को तो मंदिरों में पूजते ही हैं, लेकिन जिन्होंने अपने प्राणों को न्यौछावर कर देश को आजादी दिलाई तथा भावी पीढ़ी के लिए शान से मस्तक ऊंचा कर प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया उन्हें भी हमेशा याद रखा जाना चाहिए तथा उनकी भी पूजा होनी चाहिए। जिससे देश की आगामी पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को याद रख एक बेहतर भविष्य की नींव रख सके।
कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर अपने आप में इसलिए अनूठा है क्योंकि यहां आजादी की लड़ाई में सर्वस्व कुर्बान करने वाले आजादी के दीवाने वीर क्रांतिकारियों की जीवनी तथा स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी संगमरमर पत्थरों पर खुदवाया गया है जिससे ये इतिहास वक्त के थपेड़े सह कर भी अमर रह सके तथा पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहे। शशीरमण कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर में अब तक स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में भाग लेने वाले करीब 80 क्रांतिकारियों की जीवनी पत्थरों पर अंकित कराई जा चुकी है तथा ये काम अभी जारी है। संयोजक कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर की स्थापना के लिए उनके पिता श्यामलाल कौशिक द्वारा 7 लोगों की कमेटी का गठन किया गया था। समय के साथ होते बदलाव के बाद अब ये कार्य उनके साथ उत्तराखंड के पूर्व वन मंत्री नवप्रभात शर्मा, पूर्व विधायक सुरेंद्र कपिल तथा जयनाथ शर्मा की देखरेख में चल रहा है जो वर्ष 2020 तक पूरा हो जाएगा तथा स्वराज मंदिर में करीब 100 स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी लिखी होगी। गणतंत्र दिवस के विषय में बात करते हुए कौशिक ने बताया कि उनका जन्म आजादी की खुली हवा में हुआ, लेकिन उनके पिता बात करते हुए बताया करते थे कि राष्ट्र को आजादी तो 1947 में मिल गयी थी, लेकिन अधूरी मिली थी, क्योंकि तब भी अंग्रेजी कानून लागू थे, लेकिन जब 26 जनवरी 1950 को देश को अपना कानून मिला तथा संविधान लागू हुआ तो पूरे देश की तरह सरसावा में भी बेहद खुशी का माहौल था तथा सभी लोग खुशी मनाते हुए सरसावा के प्रसिद्ध झंडा चौक पर एकत्र हो गये। कस्बे के निवासियों के साथ ही गांव देहात के लोग भी इस जश्न में शामिल हुए तथा गुड़ खिलाकर एक दूसरे का मुंह मीठा कराया गया था।
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हम बात कर रहे हैं सरसावा में स्थित स्वराज मंदिर की। जिसके संस्थापक तो अब नहीं है, लेकिन उनके वंशज अब भी स्वराज मंदिर की परिकल्पना को साकार करने में जुटे हुए हैं। स्वराज मंदिर के संयोजक शशीरमण कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर की अवधारणा उनके पिता तथा स्वतंत्रता सेनानी श्यामलाल कौशिक के मन में सन 1970 में आयी थी। उनके पिता का विचार था कि हम देवी देवताओं को तो मंदिरों में पूजते ही हैं, लेकिन जिन्होंने अपने प्राणों को न्यौछावर कर देश को आजादी दिलाई तथा भावी पीढ़ी के लिए शान से मस्तक ऊंचा कर प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया उन्हें भी हमेशा याद रखा जाना चाहिए तथा उनकी भी पूजा होनी चाहिए। जिससे देश की आगामी पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को याद रख एक बेहतर भविष्य की नींव रख सके।
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कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर अपने आप में इसलिए अनूठा है क्योंकि यहां आजादी की लड़ाई में सर्वस्व कुर्बान करने वाले आजादी के दीवाने वीर क्रांतिकारियों की जीवनी तथा स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी संगमरमर पत्थरों पर खुदवाया गया है जिससे ये इतिहास वक्त के थपेड़े सह कर भी अमर रह सके तथा पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहे। शशीरमण कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर में अब तक स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में भाग लेने वाले करीब 80 क्रांतिकारियों की जीवनी पत्थरों पर अंकित कराई जा चुकी है तथा ये काम अभी जारी है। संयोजक कौशिक ने बताया कि स्वराज मंदिर की स्थापना के लिए उनके पिता श्यामलाल कौशिक द्वारा 7 लोगों की कमेटी का गठन किया गया था। समय के साथ होते बदलाव के बाद अब ये कार्य उनके साथ उत्तराखंड के पूर्व वन मंत्री नवप्रभात शर्मा, पूर्व विधायक सुरेंद्र कपिल तथा जयनाथ शर्मा की देखरेख में चल रहा है जो वर्ष 2020 तक पूरा हो जाएगा तथा स्वराज मंदिर में करीब 100 स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी लिखी होगी। गणतंत्र दिवस के विषय में बात करते हुए कौशिक ने बताया कि उनका जन्म आजादी की खुली हवा में हुआ, लेकिन उनके पिता बात करते हुए बताया करते थे कि राष्ट्र को आजादी तो 1947 में मिल गयी थी, लेकिन अधूरी मिली थी, क्योंकि तब भी अंग्रेजी कानून लागू थे, लेकिन जब 26 जनवरी 1950 को देश को अपना कानून मिला तथा संविधान लागू हुआ तो पूरे देश की तरह सरसावा में भी बेहद खुशी का माहौल था तथा सभी लोग खुशी मनाते हुए सरसावा के प्रसिद्ध झंडा चौक पर एकत्र हो गये। कस्बे के निवासियों के साथ ही गांव देहात के लोग भी इस जश्न में शामिल हुए तथा गुड़ खिलाकर एक दूसरे का मुंह मीठा कराया गया था।
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