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सुखद रहा भीम आर्मी की राजनीति का पहला कदम
Updated Fri, 01 Jun 2018 01:07 AM IST
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सुखद रहा भीम आर्मी की राजनीति का पहला कदम
सहारनपुर। हिंसा को लेकर सुर्खियों में आई भीम आर्मी सेना का राजनीति में पहला कदम सुखद रहा है। इस जीत के बाद उनके इरादों को पंख लग गए हैं। भीम आर्मी अब 2019 के आम चुनावों में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाने की तैैयारी में जुट गई है। कैराना उप चुनाव में भी भीम आर्मी प्रमुख चंदशेखर उर्फ रावण को कई सियासी न्यौते आए थे, मगर किन्हीं कारणों से उन्हें तवज्जो नहीं दी गई। ऐसे में अगले साल होने वाले चुनावों में रावण के चुनाव मैदान में उतरने की संभावनाएं जताई।
2014 में बाबा भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ पर हुए विवाद के बाद भीम आर्मी चर्चाओं में आई थी। पिछले साल सहारनपुर में हुई हिंसा में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक उसका नाम गूंजा था। हिंसा में संस्थापक चंदशेखर उर्फ रावण, राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन, राष्ट्रीय प्रवक्ता मंजीत सिंह नौटियाल और जिलाध्यक्ष कमल वालिया समेत कई पदाधिकारियों को हिंसा में जेल जाना पड़ा था। रावण तो रासुका लगने के कारण अब तक जेल में है। राष्ट्रीय स्तर पर भीम आर्मी को समर्थन मिलने के बाद से भीम आर्मी ने दलित वर्ग को नया नेतृत्व देने की जमीन तलाशनी शुरू कर दी थी। उसमें उसे काफी हद तक कामयाबी भी मिली। बाकायदा कई प्रदेशों में भीम आर्मी अपने कैडर कैंप लगा चुकी है। हालांकि, खुले तौर पर भीम आर्मी राजनीति में उतरने को लेकर ना-नुकुर करती रही। कैराना उप चुनाव की घोषणा के बाद कई सियासी दलों ने जेल में जाकर रावण से संपर्क साधा था। बातचीत भी हुई, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला। कैराना उप चुनाव में भीम आर्मी ने रालोद-सपा गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन देने का दांव चला था। आर्मी कार्यकर्ताओं ने समर्थन देने के साथ गांव-गली तक दलित बाहुल्य क्षेत्रों में लोगों को भाजपा के खिलाफ लामबंद किया। पुनर्मतदान में भीम आर्मी कार्यकर्ता कई गांवों में सक्रिय नजर आए। उन्होंने पूरा फोकस दलित मतदाताओं पर रखा। बृहस्पतिवार को आए उप चुनाव के नतीजे ने उनकी बांछें खिला दीं, क्योंकि इस जीत से उनका वजूद बढ़ा है। भीम आर्मी अब 2019 के चुनावों के मद्देनजर अपनी रणनीति बनाने की तैयारी में जुट गई है।
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सहारनपुर। हिंसा को लेकर सुर्खियों में आई भीम आर्मी सेना का राजनीति में पहला कदम सुखद रहा है। इस जीत के बाद उनके इरादों को पंख लग गए हैं। भीम आर्मी अब 2019 के आम चुनावों में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाने की तैैयारी में जुट गई है। कैराना उप चुनाव में भी भीम आर्मी प्रमुख चंदशेखर उर्फ रावण को कई सियासी न्यौते आए थे, मगर किन्हीं कारणों से उन्हें तवज्जो नहीं दी गई। ऐसे में अगले साल होने वाले चुनावों में रावण के चुनाव मैदान में उतरने की संभावनाएं जताई।
2014 में बाबा भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ पर हुए विवाद के बाद भीम आर्मी चर्चाओं में आई थी। पिछले साल सहारनपुर में हुई हिंसा में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक उसका नाम गूंजा था। हिंसा में संस्थापक चंदशेखर उर्फ रावण, राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन, राष्ट्रीय प्रवक्ता मंजीत सिंह नौटियाल और जिलाध्यक्ष कमल वालिया समेत कई पदाधिकारियों को हिंसा में जेल जाना पड़ा था। रावण तो रासुका लगने के कारण अब तक जेल में है। राष्ट्रीय स्तर पर भीम आर्मी को समर्थन मिलने के बाद से भीम आर्मी ने दलित वर्ग को नया नेतृत्व देने की जमीन तलाशनी शुरू कर दी थी। उसमें उसे काफी हद तक कामयाबी भी मिली। बाकायदा कई प्रदेशों में भीम आर्मी अपने कैडर कैंप लगा चुकी है। हालांकि, खुले तौर पर भीम आर्मी राजनीति में उतरने को लेकर ना-नुकुर करती रही। कैराना उप चुनाव की घोषणा के बाद कई सियासी दलों ने जेल में जाकर रावण से संपर्क साधा था। बातचीत भी हुई, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला। कैराना उप चुनाव में भीम आर्मी ने रालोद-सपा गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन देने का दांव चला था। आर्मी कार्यकर्ताओं ने समर्थन देने के साथ गांव-गली तक दलित बाहुल्य क्षेत्रों में लोगों को भाजपा के खिलाफ लामबंद किया। पुनर्मतदान में भीम आर्मी कार्यकर्ता कई गांवों में सक्रिय नजर आए। उन्होंने पूरा फोकस दलित मतदाताओं पर रखा। बृहस्पतिवार को आए उप चुनाव के नतीजे ने उनकी बांछें खिला दीं, क्योंकि इस जीत से उनका वजूद बढ़ा है। भीम आर्मी अब 2019 के चुनावों के मद्देनजर अपनी रणनीति बनाने की तैयारी में जुट गई है।
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