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अफसरों को जेल में कुछ भी नहीं मिला आपत्तिजनक
ब्यूरो/अमर उजाला, प्रतापगढ़
Updated Sat, 13 Dec 2014 10:27 PM IST
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शासन के निर्देश पर शुक्रवार रात जिला जेल में छापेमारी करने वाले अफसरों को खाली हाथ लौटना पड़ा। बंदियाें को जगाकर बैरकाें में तलाशी ली गई लेकिन अफसर कोई भी आपत्तिजनक सामान बरामद नहीं कर सके।
शासन के निर्देश पर सभी जेलाें में छापेमारी होने की खबरें शाम से ही चर्चा में आ गई थीं लेकिन रात 10 बजे तक जिले के अफसर जेल नहीं पहुंचे। करीब साढे़ 10 बजे रात एडीएम और एएसपी के नेतृत्व में पुलिस बल पहुंचा तो बैरकों के भीतर सो रहे बंदी जगाए जाने पर हंगामा करने लगे। हालांकि भारी भरकम पुलिस बल देखकर वे शांत हो गए। अधिकारियों ने रात करीब साढे़ 11 बजे तक एक-एक बैरक खोलवाकर तलाशी ली लेकिन उन्हें कोई आपत्तिजनक सामान नहीं मिल सका। ऐसे में अफसरों को खाली हाथ लौटना पड़ा।
दिवाली पर जेलर और डाक्टर के बीच हुई मारपीट के बाद बंदियों के इलाज के लिए स्थायी डाक्टर की नियुक्ति नहीं हो सकी है। कुछ दिनों तक सीएमओ ने स्वास्थ्य केंद्राें के डाक्टरों की ड्यूटी लगाई। इसके बाद पुलिस लाइन के डाक्टर एके सिंह को जिम्मेदारी दे दी। सूत्राें के अनुसार डॉ. एके सिंह इलाहाबाद में रहते हैं और पुलिस लाइन के साथ ही जेल के बंदियाें का भी इलाज करते हैं। ऐसे में उनकी उपलब्धता कम ही हो पाती है।
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जिला जेल में अपराधियों की मनमानी के लिए जिले की पुलिस भी कम जिम्मेदार नहीं है। जेल पुलिस चौकी की स्थापना सिर्फ इसी उद्देश्य से की गई थी कि वह जेल में बाहर से होने वाली अवांछित गतिविधियों पर रोक लगाएगी और संदिग्ध लोगों के आनेे की छानबीन करेगी। चौकी की स्थापना के बाद मुलाकातियों का फोटो खींचा जाता था लेकिन बाद में चौकी के लोगों ने जेल से अपना नाता तोड़ लिया जबकि चौकी के लिए जेल प्रशासन ने ही अपना भवन दिया है। जेल में सिपाहियाें की संख्या कम होने के कारण बंदी आए दिन उन्हें धमकाते रहते हैं और किसी अवांछित गतिविधि पर सिपाही ने टोकने की हिम्मत की उसकी पिटाई हो जाती है। दबी जुबान से जेल के अधिकारी भी कहते हैं कि प्रतिबंधित सामान तो बाहर से ही आता है। उसे रोकने के लिए चौकी की पुलिस भी प्रयास कर सकती है लेकिन वह कभी बाहर खड़ी होने वाली बिना नंबर की भी गाड़ियों की चेकिंग नहीं करती।
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शासन के निर्देश पर सभी जेलाें में छापेमारी होने की खबरें शाम से ही चर्चा में आ गई थीं लेकिन रात 10 बजे तक जिले के अफसर जेल नहीं पहुंचे। करीब साढे़ 10 बजे रात एडीएम और एएसपी के नेतृत्व में पुलिस बल पहुंचा तो बैरकों के भीतर सो रहे बंदी जगाए जाने पर हंगामा करने लगे। हालांकि भारी भरकम पुलिस बल देखकर वे शांत हो गए। अधिकारियों ने रात करीब साढे़ 11 बजे तक एक-एक बैरक खोलवाकर तलाशी ली लेकिन उन्हें कोई आपत्तिजनक सामान नहीं मिल सका। ऐसे में अफसरों को खाली हाथ लौटना पड़ा।
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दिवाली पर जेलर और डाक्टर के बीच हुई मारपीट के बाद बंदियों के इलाज के लिए स्थायी डाक्टर की नियुक्ति नहीं हो सकी है। कुछ दिनों तक सीएमओ ने स्वास्थ्य केंद्राें के डाक्टरों की ड्यूटी लगाई। इसके बाद पुलिस लाइन के डाक्टर एके सिंह को जिम्मेदारी दे दी। सूत्राें के अनुसार डॉ. एके सिंह इलाहाबाद में रहते हैं और पुलिस लाइन के साथ ही जेल के बंदियाें का भी इलाज करते हैं। ऐसे में उनकी उपलब्धता कम ही हो पाती है।
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जिला जेल में अपराधियों की मनमानी के लिए जिले की पुलिस भी कम जिम्मेदार नहीं है। जेल पुलिस चौकी की स्थापना सिर्फ इसी उद्देश्य से की गई थी कि वह जेल में बाहर से होने वाली अवांछित गतिविधियों पर रोक लगाएगी और संदिग्ध लोगों के आनेे की छानबीन करेगी। चौकी की स्थापना के बाद मुलाकातियों का फोटो खींचा जाता था लेकिन बाद में चौकी के लोगों ने जेल से अपना नाता तोड़ लिया जबकि चौकी के लिए जेल प्रशासन ने ही अपना भवन दिया है। जेल में सिपाहियाें की संख्या कम होने के कारण बंदी आए दिन उन्हें धमकाते रहते हैं और किसी अवांछित गतिविधि पर सिपाही ने टोकने की हिम्मत की उसकी पिटाई हो जाती है। दबी जुबान से जेल के अधिकारी भी कहते हैं कि प्रतिबंधित सामान तो बाहर से ही आता है। उसे रोकने के लिए चौकी की पुलिस भी प्रयास कर सकती है लेकिन वह कभी बाहर खड़ी होने वाली बिना नंबर की भी गाड़ियों की चेकिंग नहीं करती।