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आपातकाल का दंशः पीलीभीत में जिला प्रचारक हुआ करते थे मेरठ के मौजूद सांसद राजेंद्र अग्रवाल, 21 महीने रहे थे जेल में
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राजेंद्र अग्रवाल।
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। जब देश में आपातकाल लागू हुआ तब मेरठ के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल पीलीभीत में आरएसएस के जिला प्रचारक हुआ करते थे। उनकी गिरफ्तारी यहीं पर हुई थी। वह 28 जुलाई, 1975 को गिरफ्तार किए गए। इमरजेंसी में 21 महीने जेल में रहे और 24 नवंबर 1977 को रिहा हुए थे। उनसे जुड़ी यादें उस दौर के लोगों के जेहन में आज भी ताजा हैं।
इमरजेंसी के दौर में आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं को पकड़ने के लिए सरकारी तंत्र सक्रिय था और संघ के जिला प्रचारक राजेंद्र कुमार के अलावा नगर प्रचारक सुंदरलाल गंगवार, बीसलपुर के प्रचारक लक्ष्मण सहित अधिकतर प्रचारकों को एक-एक करके बंदी बना लिया था। संघ से जुड़े लोग बताते हैं कि राजेंद्र कुमार के जेल जाने के बाद संघ नेतृत्व ने पीलीभीत जनपद में भूमिगत अभियान संभालने के लिए मेरठ जिले की सरधना तहसील के तहसील प्रचारक का काम संभाल रहे राजेंद्र प्रकाश को यहां भेजा था।
इमरजेंसी के दौर में सरकारी खुफिया तंत्र की निगाहों से बचना आसान नहीं था। अधिकतर प्रचारक उस दौर में किस कदर सावधानी बरतते थे, इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे प्रचारक राजेंद्र प्रकाश ने अपने चार नाम रख लिए थे। जनपद की चारों तहसीलों में उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता था। उस समय संघ की दृष्टि से उत्तराखंड का खटीमा भी पीलीभीत जनपद का हिस्सा हुआ करता था।
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पीलीभीत नगर में जिला प्रचारक राजेंद्र प्रकाश को आरएसएस के कार्यकर्ता मुकेश के नाम से जानते थे। पूरनपुर तहसील में वह सुरेंद्र हो जाते थे। बीसलपुर तहसील में उन्हें अर्जुन के नाम से जाना जाता था। खटीमा तहसील में वह शरद के नाम से पुकारे जाते थे। उस दौर में शाहजहांपुर और पीलीभीत जिलों के लिए भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री महेश नारायण सिंह थे। उन्होंने भी अपना हुलिया बदल लिया था। वह भेष बदलकर गुप्त दौरा करते थे।
सफेद शर्ट और ढीली ढाली पैंट पहनकर दोनों जिलों में नई पीढ़ी के युवकों से वे ऐसे मिलते थे कि उन्हें संघ के कार्यकर्ता भी आसानी से नहीं पहचान पाते थे। जगदीश ढौडियाल उस समय बरेली जिले में आरएसएस के जिला प्रचारक थे। पीलीभीत के जिला प्रचारक राजेंद्र कुमार की गिरफ्तारी के बाद श्री ढौडियाल को बरेली के साथ-साथ पीलीभीत जिले का दायित्व भी सौंपा गया था। ढौढियाल अपनी पहचान बदलकर पीलीभीत जिले का सघन दौरा करते थे। वे संघ कार्यकर्ताओं के साथ गुप्त बैठक करते थे।
तब मथुरा का पंडा बनकर आए थे योगेंद्र
योगेंद्र उस समय सीतापुर के जिला प्रचारक होने के साथ-साथ आरएसएस की सांस्कृतिक शाखा के भी पदाधिकारी थे। वह बहुत अच्छे कलाकार थे। आरएसएस के मुखिया गुरु गोलवलकर के अधिकांश कार्यक्रमों में मंच की साज-सज्जा का काम वे देखते थे। इमरजेंसी के दौर में उन्होंने एक बार पीलीभीत का दौरा किया और कार्यकर्ताओं से संपर्क करके उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित किया था, लेकिन इस दौरे में वे मथुरा का पंडा बनकर आए थे।
बिना नंबर की जावा मोटरसाइकिल पर चलतेे थे प्रचारक
उस दौर में आरएसएस की जावा मोटरसाइकिल प्रचारक के पास थी। जब इरमजेंसी लगी तो इसकी नंबर प्लेट हटा दी गई। राजेंद्र कुमार जेल चले गए। इसी बाइक पर उनके बाद आए प्रचारक भेष बदल कर अपना सफर करते रहे। तब कार्यकर्ता जावा बाइक देखकर पहचान लेते थे कि अपने प्रचारक ही आए हैं।
जेल में किताबें पढ़कर वक्त बिताते थे राजेंद्र अग्रवाल
रामा इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और आरएसएस के कार्यकर्ता करुणाशंकर शुक्ला, राजेंद्र अग्रवाल के साथ जेल में बंद रहे हैं। वह बताते हैं कि राजेंद्र अग्रवाल पढ़ने में बड़े तेज थे। जेल में भी सुबह साढ़े तीन बजे जग जाते थे और दिन में 11 बजे तक पढ़ते थे। इतिहास में उनकी रुचि थी। अधिकतर समय उनका किताबों के साथ बीतता था। करुणाशंकर शुक्ला ने बताया कि वे राजनीतिक बंदी थे। साथ-साथ रहते थे और सुबह की चाय जेल में रखे अपने स्टोव पर बना लेते। इसके लिए चाय की पत्ती और दूध आदि का इंतजाम रात में कर लेते थे।
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इमरजेंसी के दौर में आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं को पकड़ने के लिए सरकारी तंत्र सक्रिय था और संघ के जिला प्रचारक राजेंद्र कुमार के अलावा नगर प्रचारक सुंदरलाल गंगवार, बीसलपुर के प्रचारक लक्ष्मण सहित अधिकतर प्रचारकों को एक-एक करके बंदी बना लिया था। संघ से जुड़े लोग बताते हैं कि राजेंद्र कुमार के जेल जाने के बाद संघ नेतृत्व ने पीलीभीत जनपद में भूमिगत अभियान संभालने के लिए मेरठ जिले की सरधना तहसील के तहसील प्रचारक का काम संभाल रहे राजेंद्र प्रकाश को यहां भेजा था।
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इमरजेंसी के दौर में सरकारी खुफिया तंत्र की निगाहों से बचना आसान नहीं था। अधिकतर प्रचारक उस दौर में किस कदर सावधानी बरतते थे, इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे प्रचारक राजेंद्र प्रकाश ने अपने चार नाम रख लिए थे। जनपद की चारों तहसीलों में उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता था। उस समय संघ की दृष्टि से उत्तराखंड का खटीमा भी पीलीभीत जनपद का हिस्सा हुआ करता था।
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पीलीभीत नगर में जिला प्रचारक राजेंद्र प्रकाश को आरएसएस के कार्यकर्ता मुकेश के नाम से जानते थे। पूरनपुर तहसील में वह सुरेंद्र हो जाते थे। बीसलपुर तहसील में उन्हें अर्जुन के नाम से जाना जाता था। खटीमा तहसील में वह शरद के नाम से पुकारे जाते थे। उस दौर में शाहजहांपुर और पीलीभीत जिलों के लिए भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री महेश नारायण सिंह थे। उन्होंने भी अपना हुलिया बदल लिया था। वह भेष बदलकर गुप्त दौरा करते थे।
सफेद शर्ट और ढीली ढाली पैंट पहनकर दोनों जिलों में नई पीढ़ी के युवकों से वे ऐसे मिलते थे कि उन्हें संघ के कार्यकर्ता भी आसानी से नहीं पहचान पाते थे। जगदीश ढौडियाल उस समय बरेली जिले में आरएसएस के जिला प्रचारक थे। पीलीभीत के जिला प्रचारक राजेंद्र कुमार की गिरफ्तारी के बाद श्री ढौडियाल को बरेली के साथ-साथ पीलीभीत जिले का दायित्व भी सौंपा गया था। ढौढियाल अपनी पहचान बदलकर पीलीभीत जिले का सघन दौरा करते थे। वे संघ कार्यकर्ताओं के साथ गुप्त बैठक करते थे।
तब मथुरा का पंडा बनकर आए थे योगेंद्र
योगेंद्र उस समय सीतापुर के जिला प्रचारक होने के साथ-साथ आरएसएस की सांस्कृतिक शाखा के भी पदाधिकारी थे। वह बहुत अच्छे कलाकार थे। आरएसएस के मुखिया गुरु गोलवलकर के अधिकांश कार्यक्रमों में मंच की साज-सज्जा का काम वे देखते थे। इमरजेंसी के दौर में उन्होंने एक बार पीलीभीत का दौरा किया और कार्यकर्ताओं से संपर्क करके उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित किया था, लेकिन इस दौरे में वे मथुरा का पंडा बनकर आए थे।
बिना नंबर की जावा मोटरसाइकिल पर चलतेे थे प्रचारक
उस दौर में आरएसएस की जावा मोटरसाइकिल प्रचारक के पास थी। जब इरमजेंसी लगी तो इसकी नंबर प्लेट हटा दी गई। राजेंद्र कुमार जेल चले गए। इसी बाइक पर उनके बाद आए प्रचारक भेष बदल कर अपना सफर करते रहे। तब कार्यकर्ता जावा बाइक देखकर पहचान लेते थे कि अपने प्रचारक ही आए हैं।
जेल में किताबें पढ़कर वक्त बिताते थे राजेंद्र अग्रवाल
रामा इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और आरएसएस के कार्यकर्ता करुणाशंकर शुक्ला, राजेंद्र अग्रवाल के साथ जेल में बंद रहे हैं। वह बताते हैं कि राजेंद्र अग्रवाल पढ़ने में बड़े तेज थे। जेल में भी सुबह साढ़े तीन बजे जग जाते थे और दिन में 11 बजे तक पढ़ते थे। इतिहास में उनकी रुचि थी। अधिकतर समय उनका किताबों के साथ बीतता था। करुणाशंकर शुक्ला ने बताया कि वे राजनीतिक बंदी थे। साथ-साथ रहते थे और सुबह की चाय जेल में रखे अपने स्टोव पर बना लेते। इसके लिए चाय की पत्ती और दूध आदि का इंतजाम रात में कर लेते थे।

जिला कारागार पीलीभीत।- फोटो : PILIBHIT