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जन कल्याण के संकल्प से बने महान संत
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वर्ष 2002 में नई दिल्ली में वीतराग स्वामी कल्याणदेव के अभिनंदन ग्रन्थ का विमोचन करते तत्कालीन प्रध?
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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मुजफ्फरनगर। गरीबी और अभाव से घिरे बचपन में मिले सत्संग ने कैसे एक बालक को महान संत बना दिया, यह वीतराग स्वामी कल्याणदेव के वैराग्य, त्याग, तप, पुरुषार्थ और निष्काम सेवा के अनुकरणीय व्यक्तित्व के आदर्श मूल्यों में दिखता है। 21 जून, 1876 को जन्में शिक्षा ऋषि अपने अलौकिक आभा मंडल से सनातन संस्कृति का मुकुट बने थे।
सिसौली के गांव मुंडभर में उनका बचपन बीता। उनके पिता फेरुदत्त धार्मिक थे। माता भोई देवी के साथ बागपत के कोतना गांव ननिहाल में भी कुछ समय रहे। तीन भाइयों राजाराम व रिसाल सिंह में वह सबसे छोटे थे, नाम था कालूराम। बुढ़ाना के बुल्ला भगत की संगत से उनमें आध्यात्म और धर्म की ज्योति जगी। लंबे प्रवास में वहीं रहकर रामायण सुनते थे। साधुओं की फक्कड़ी उन्हें भाने लगी। खेत में काम करते हुए किसानों को पानी पिलाने में रम गए। यहीं से उनमें सेवा का बीज रोपित हुआ। स्नेह में ग्रामीण भी अब ‘कालू भगत’ कहने लगे। दस-बारह साल की उम्र में वो साधु मंडली के साथ अयोध्या दर्शन को चले गए। उसके बाद न वे कभी अपने गांव वापस आए और न मां से मिले। देश के तीर्थों में घूमने के बाद उन्होंने वर्ष 1900 में ऋषिकेश में स्वामी पूर्णानंद से सन्यास की दीक्षा ली और गुरु से नाम पाया स्वामी कल्याणदेव। उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन तब आया, जब उनकी भेंट स्वामी विवेकानंद से हुई थी। शिक्षा ऋषि स्वयं बताते थे कि भगवान के दर्शन गरीब की झोपड़ी में होंगे। ईश्वर के बेटे हैं किसान, मजदूर और गरीब, उनकी सेवा ही प्रभु पूजा है, ये सीख उन्हें स्वामी विवेकानंद से मिली थी।
गांवों में जगाई स्वाधीनता की अलख
मुजफ्फरनगर। महात्मा गांधी से वर्ष 1915 में साबरमती आश्रम में हुई पहली भेंट में उनको ग्रामोत्थान का मूलमंत्र मिला। गांवों की चौपालों पर स्वामी स्वदेशी, हिंदी एवं खादी, गोपालन और स्वाधीनता की अलख जगाने लगे। वर्ष 1921-22 के दौरान उन्होंने लोक सेवक संघ के कार्यकर्ता लाल बहादुर शास्त्री तथा अलगू राय के साथ युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया।
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दुधाहेड़ी गांव में खोला था पहला स्कूल
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1917 में जिले के तत्कालीन डीएम पीडब्लू मार्श की उनके प्रति अगाध श्रद्धा थी, जो मेरठ मंडल के कमिश्नर भी रहे। उनके सहयोग से स्वामी ने ग्रामीणों को श्रमदान को प्रेरित कर गांवों को कच्ची सड़कों से जोड़ा। वर्ष 1926 में मंसूरपुर इलाके के गांव दुधाहेड़ी में संत ने पहली प्राथमिक पाठशाला बनाई थी।
आज सादगी और श्रद्धा से मनाई जाएगी जयंती
मोरना। स्वामी कल्याणदेव की 145वीं जयंती भागवत पीठ शुकदेव आश्रम में सादगी से आज मनाई जाएगी। कोरोना संकट की वजह से सूर्यग्रहण के उपरांत तीन बजे समाधि मंदिर में चरणाभिषेक होगा। भागवत पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज के सानिध्य में विधि विधान से पूजन और यज्ञ होगा।
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सिसौली के गांव मुंडभर में उनका बचपन बीता। उनके पिता फेरुदत्त धार्मिक थे। माता भोई देवी के साथ बागपत के कोतना गांव ननिहाल में भी कुछ समय रहे। तीन भाइयों राजाराम व रिसाल सिंह में वह सबसे छोटे थे, नाम था कालूराम। बुढ़ाना के बुल्ला भगत की संगत से उनमें आध्यात्म और धर्म की ज्योति जगी। लंबे प्रवास में वहीं रहकर रामायण सुनते थे। साधुओं की फक्कड़ी उन्हें भाने लगी। खेत में काम करते हुए किसानों को पानी पिलाने में रम गए। यहीं से उनमें सेवा का बीज रोपित हुआ। स्नेह में ग्रामीण भी अब ‘कालू भगत’ कहने लगे। दस-बारह साल की उम्र में वो साधु मंडली के साथ अयोध्या दर्शन को चले गए। उसके बाद न वे कभी अपने गांव वापस आए और न मां से मिले। देश के तीर्थों में घूमने के बाद उन्होंने वर्ष 1900 में ऋषिकेश में स्वामी पूर्णानंद से सन्यास की दीक्षा ली और गुरु से नाम पाया स्वामी कल्याणदेव। उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन तब आया, जब उनकी भेंट स्वामी विवेकानंद से हुई थी। शिक्षा ऋषि स्वयं बताते थे कि भगवान के दर्शन गरीब की झोपड़ी में होंगे। ईश्वर के बेटे हैं किसान, मजदूर और गरीब, उनकी सेवा ही प्रभु पूजा है, ये सीख उन्हें स्वामी विवेकानंद से मिली थी।
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गांवों में जगाई स्वाधीनता की अलख
मुजफ्फरनगर। महात्मा गांधी से वर्ष 1915 में साबरमती आश्रम में हुई पहली भेंट में उनको ग्रामोत्थान का मूलमंत्र मिला। गांवों की चौपालों पर स्वामी स्वदेशी, हिंदी एवं खादी, गोपालन और स्वाधीनता की अलख जगाने लगे। वर्ष 1921-22 के दौरान उन्होंने लोक सेवक संघ के कार्यकर्ता लाल बहादुर शास्त्री तथा अलगू राय के साथ युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया।
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दुधाहेड़ी गांव में खोला था पहला स्कूल
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1917 में जिले के तत्कालीन डीएम पीडब्लू मार्श की उनके प्रति अगाध श्रद्धा थी, जो मेरठ मंडल के कमिश्नर भी रहे। उनके सहयोग से स्वामी ने ग्रामीणों को श्रमदान को प्रेरित कर गांवों को कच्ची सड़कों से जोड़ा। वर्ष 1926 में मंसूरपुर इलाके के गांव दुधाहेड़ी में संत ने पहली प्राथमिक पाठशाला बनाई थी।
आज सादगी और श्रद्धा से मनाई जाएगी जयंती
मोरना। स्वामी कल्याणदेव की 145वीं जयंती भागवत पीठ शुकदेव आश्रम में सादगी से आज मनाई जाएगी। कोरोना संकट की वजह से सूर्यग्रहण के उपरांत तीन बजे समाधि मंदिर में चरणाभिषेक होगा। भागवत पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज के सानिध्य में विधि विधान से पूजन और यज्ञ होगा।