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त्याग दान नहीं होता : जैन मुनि
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त्याग दान नहीं होता : जैन मुनि
मुजफ्फरनगर। पंचायती मंदिर जैन मिलन में चल रहे दशलक्षण महापर्व के अष्टम दिन प्रणम्य सागर महाराज ने उत्तम त्याग धर्म का मर्म समझाया। बताया कि जब व्यक्ति क्रोध, मान, माया और लोभ को उपशम करते हुए अपने भीतर शीतलता, मृदुता, ऋजुता और शुचिता का भाव लाता है तब वह सत्य को जानने लगता है। मुनि श्री ने बताया कि त्याग दान नहीं होता, क्योंकि त्याग अपनी बुराइयों का, दोषों का किया जाता है और दान अच्छी चीजों का किया जाता है।
मिट्टी का उदाहरण देते हुए जैन मुनि ने समझाया कि माटी के तपने के बाद उसने अपनी सभी अशुद्धियों का त्याग कर दिया, अब उसमें गुणों का समावेश हो गया। उसने एक सुंदर लाल कलश का रूप ले लिया है। अब वह माटी अपना सर्वस्व अर्पण कर चुकी है। माटी अब कलश बनकर दूसरों पर उपकार करने के लिए तत्पर है। अब उसे अपने अस्तित्व का भी कोई डर नहीं है। उन्होंने कहा कि अपने दुर्गुणों का धीरे-धीरे छोड़ना ही त्याग है। अपने भीतर से राग को दूर करना, अपना ममत्व को छोड़ना ही त्याग है। वृक्ष अपने फलों का , गाय अपने दूध का, नदी अपने पानी का त्याग करते हैं। उस त्याग के बाद वे उससे कोई आसक्ति भी नहीं रखते हैं। यही उत्तम त्याग है।
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मुजफ्फरनगर। पंचायती मंदिर जैन मिलन में चल रहे दशलक्षण महापर्व के अष्टम दिन प्रणम्य सागर महाराज ने उत्तम त्याग धर्म का मर्म समझाया। बताया कि जब व्यक्ति क्रोध, मान, माया और लोभ को उपशम करते हुए अपने भीतर शीतलता, मृदुता, ऋजुता और शुचिता का भाव लाता है तब वह सत्य को जानने लगता है। मुनि श्री ने बताया कि त्याग दान नहीं होता, क्योंकि त्याग अपनी बुराइयों का, दोषों का किया जाता है और दान अच्छी चीजों का किया जाता है।
मिट्टी का उदाहरण देते हुए जैन मुनि ने समझाया कि माटी के तपने के बाद उसने अपनी सभी अशुद्धियों का त्याग कर दिया, अब उसमें गुणों का समावेश हो गया। उसने एक सुंदर लाल कलश का रूप ले लिया है। अब वह माटी अपना सर्वस्व अर्पण कर चुकी है। माटी अब कलश बनकर दूसरों पर उपकार करने के लिए तत्पर है। अब उसे अपने अस्तित्व का भी कोई डर नहीं है। उन्होंने कहा कि अपने दुर्गुणों का धीरे-धीरे छोड़ना ही त्याग है। अपने भीतर से राग को दूर करना, अपना ममत्व को छोड़ना ही त्याग है। वृक्ष अपने फलों का , गाय अपने दूध का, नदी अपने पानी का त्याग करते हैं। उस त्याग के बाद वे उससे कोई आसक्ति भी नहीं रखते हैं। यही उत्तम त्याग है।
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