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फादर्स डे पर विशेष:-‘ पिता के संघर्ष की बदौलत मिला मुकाम’
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मुजफ्फरनगर। पापा ने मेरे लिए बहुत संघर्ष किया। आज उन्हीं के प्रयासों की बदौलत ऊंचे मुकाम पर खड़ी हूं। गरीबी से जूझते हुए मुझे न केवल अखाड़े में उतरा, बल्कि परिवार का विरोध भी झेला...फादर्स डे पर अपने पिता सूरजवीर के जज्बे और कर्तव्यनिष्ठा को याद कर अंतरराष्ट्रीय पहलवान दिव्या काकरान भावुक हो जाती हैं। कामनवेल्थ, एशियन गेम्स में देश को कांस्य पदक दिला चुकी दिव्या के पिता की यह कहानी प्रेरक भी है और दिलचस्प भी। बेटी अखाड़ों में लड़कों को पटखनी देकर धूल चटाती थी और पापा सूरजवीर घर खर्च चलाने को अखाड़े के बाहर लंगोट बेचते थे।
वैसे तो हर पिता की सबसे बड़ी खुशी उसकी संतान की कामयाबी में छिपी होती है। माकूल परिस्थितियां नहीं होने के बावजूद पिता सूरजवीर ने ऐसे ही अपनी बेटी दिव्या को देश का शीर्ष पहलवान बनाने की ठान ली। सपने को पूरा करने को उन्होंने जिले के मंसूरपुर क्षेत्र के गांव पुरबालियान को छोड़कर दिल्ली का रुख किया। दिल्ली की गोकलपुरी में किराए पर कमरा लिया। गृहस्थी की जीविका चलाने को पत्नी घर में सिलाई मशीन पर लंगोट सिलती और वे दंगल में बेचने जाते थे। सूरज को पहलवानी की सीख अपने पिता राजेंद्र से मिली थी। उन्होंने पहले बड़े बेटे देव सैन को अखाड़े में प्रशिक्षण दिलाया। बेटी दिव्या का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। वह स्कूल छोड़ घर लौट आती थी। मां संयोगिता ने कहा कि यदि नहीं पढ़ेगी, अखाड़े में कुश्ती लड़नी पड़ेगी। सोचा था कुश्ती में लड़कों के बीच चोट लगेगी तो बेटी स्कूल जाने में भलाई समझेगी। पिता सूरज उसे दिल्ली के राजकुमार अखाड़े में ले गए। मिट्टी पर दिव्या के जुनून को देख वे भांप गए कि बेटी में जज्बा है। बस यही से उन्होंने कड़ा इरादा बना लिया।
सूरजवीर बताते हैं कि हरियाणा के दंगल में जब लंगोट बेचने जाता था, वहां बड़ी संख्या में पहलवानी करती लड़कियों को देख हिम्मत बंधी। दिव्या को सुबह चार बजे अखाड़े ले जाना। खुराक का पूरा ध्यान रखना। बेटी को मल्ल बनाने की मेरी जिद नाते-रिश्तेदारों को नहीं अच्छी लगी। उसके दादा राजेंद्र का मन तब बदला जब दिव्या बड़े दंगल जीतने लगी। दिव्या को दंगल में पहली कुश्ती जीत पर 30 रुपये मिले। अखाड़े में लड़कों से उसकी कुश्ती के विरोध का सामना कोच गोस्वामी ने भी किया। मुझे गर्व है कि दिव्या ने राष्ट्रीय स्तर पर चमकने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब एशियाई खेलों और ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाना ही सपना है। अब अब तक 69 जीत चुकी है। पिता सूरजवीर के दिल में बसी उनकी सफलता की यादें दिव्या को और मजबूत बनाती है। वह कहती है कि कुश्ती में उन्हें जो भी ऊंचाइयां मिली, वो पापा की बदौलत हासिल हुई है। उन्होंने रूढ़िवादिता को दरकिनार कर मुझे अखाड़े में लड़कों के खिलाफ बेझिझक उतारा। साहस और शौर्य का जज्बा दिया। जितनी मेरी उम्र नहीं, उससे ज्यादा पदक में राष्ट्रीय कुश्ती में जीत चुकी हूं। आज भी मेरे पापा ही मेरा खाना बनाते हैं। क्योंकि वो खुद पहलवान रहे है, उन्हें पता है कि मुझे किस तरह की खुराक की जरूरत है। मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं कि मुझे ऐसे पापा मिले, जिन्होंने भूखे प्यासे रहकर अपनी बेटी को राष्ट्रीय धुन सुनते हुए विक्ट्री स्टैंड पर गले में पदक का गौरव पाने का मौका दिया।
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परचून की दुकान चलाकर बेटे को बनाया जज
मुजफ्फरनगर। परिवार की परवरिश में जी-जान से मेहनत करते पिता की सीख जीवन की दिशा बदल देती है। उर्दू की तालीम पाए मौहम्मद अनीस भोपा क्षेत्र के गांव जौली के बाजार में परचून की दुकान चलाते है। जिंदगी में पढ़ाई की क्या कीमत होती है, इसकी उन्हें बखूबी समझ थी। उन्होंने अपने बड़े बेटे शारिब अली को ऊंची तालीम दिलाई। हर कदम पर साथ खड़े रहे और आज उनका पुत्र बागपत जिले में सिविल जज के पद पर कार्यरत है। खासियत सिर्फ इतनी ही नहीं है, अनीस का 40 वर्षों से संयुक्त परिवार है। खाना आज भी एक चूल्हे पर बनता है।
जौली गांव के बाजार में परचून की दुकान पर सामान बेचते मौहम्मद अनीस की इलाके में मिसाल दी जाती है। फादर्स डे पर ‘अमर उजाला’ ने उनसे मुलाकात की। हर पिता का सपना होता है कि उसकी औलाद नेक बने और बड़ा ओहदा हासिल करें। ऐसा ही ख्वाब मैंने देखा। पहले गांव में एल्युमिनियम के संदूक बनाता था, फिर परचून की दुकान कर ली। बेटे शारिब अली को प्रारंभिक शिक्षा जौली में दिलाई। उसके बाद शहर के साहात हॉस्टल में रहकर डीएवी इंटर कालेज से उसने हाईस्कूल तथा इंटरमीडिएट किया। पढ़ाई को कई बार पैसे की दिक्कत आई, मगर शारिब को अहसास नहीं होने दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम की शिक्षा पाकर नेट परीक्षा पास की। बेटे की मेहनत रंग लाई, उसे पीसीएस (जे) में यूपी में 9 वीं रैंक मिली। बिहार में भी जज के पद पर उसका चयन हुआ, लेकिन उसने प्रदेश की न्यायिक सेवा को चुना। बुजुर्ग अब्बा अनीस और अम्मी मुस्लेमा फिरदौस को फख्र है कि शारिब ने जज बनकर समाज में उनका सम्मान बढ़ा दिया है। उनके बेटे शारिब अली फिलहाल बीते एक साल से बागपत में सिविल जज के पद पर कार्यरत है। उनकी पत्नि शमसा नकवी पीएचडी है। परिवार में दो बेटी जहेरा और जोनू हैं। परचून की दुकान पर छोटे भाई मौहम्मद नफीस के साथ अनीस की दिनचर्या बीतती है। कहते है, बेटे को सीख दी कि कोर्ट में जब भी न्याय देना, किसी गरीब का दिल न दुखे यह नहीं भूलना। जौली गांव में एक धर्मार्थ अस्पताल खुलवाने को बेटे को प्रेरित किया है। उनका छोटा बेटा मौलाना आमिर है, जो दिल्ली की एक मस्जिद में नमाज पढ़ाता है। मौहम्मद अनीस का परिवार बीते 40 साल से एक चूल्हे पर खाना बनाता है। जज बन गए बेटे ने कई बार अपने पास बुलाया, मगर उनका मन अपने गांव में ही लगता है। दुकान पर आए युवाओं को वे पढ़ाई की कीमत समझते रहते हैं।
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वैसे तो हर पिता की सबसे बड़ी खुशी उसकी संतान की कामयाबी में छिपी होती है। माकूल परिस्थितियां नहीं होने के बावजूद पिता सूरजवीर ने ऐसे ही अपनी बेटी दिव्या को देश का शीर्ष पहलवान बनाने की ठान ली। सपने को पूरा करने को उन्होंने जिले के मंसूरपुर क्षेत्र के गांव पुरबालियान को छोड़कर दिल्ली का रुख किया। दिल्ली की गोकलपुरी में किराए पर कमरा लिया। गृहस्थी की जीविका चलाने को पत्नी घर में सिलाई मशीन पर लंगोट सिलती और वे दंगल में बेचने जाते थे। सूरज को पहलवानी की सीख अपने पिता राजेंद्र से मिली थी। उन्होंने पहले बड़े बेटे देव सैन को अखाड़े में प्रशिक्षण दिलाया। बेटी दिव्या का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। वह स्कूल छोड़ घर लौट आती थी। मां संयोगिता ने कहा कि यदि नहीं पढ़ेगी, अखाड़े में कुश्ती लड़नी पड़ेगी। सोचा था कुश्ती में लड़कों के बीच चोट लगेगी तो बेटी स्कूल जाने में भलाई समझेगी। पिता सूरज उसे दिल्ली के राजकुमार अखाड़े में ले गए। मिट्टी पर दिव्या के जुनून को देख वे भांप गए कि बेटी में जज्बा है। बस यही से उन्होंने कड़ा इरादा बना लिया।
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सूरजवीर बताते हैं कि हरियाणा के दंगल में जब लंगोट बेचने जाता था, वहां बड़ी संख्या में पहलवानी करती लड़कियों को देख हिम्मत बंधी। दिव्या को सुबह चार बजे अखाड़े ले जाना। खुराक का पूरा ध्यान रखना। बेटी को मल्ल बनाने की मेरी जिद नाते-रिश्तेदारों को नहीं अच्छी लगी। उसके दादा राजेंद्र का मन तब बदला जब दिव्या बड़े दंगल जीतने लगी। दिव्या को दंगल में पहली कुश्ती जीत पर 30 रुपये मिले। अखाड़े में लड़कों से उसकी कुश्ती के विरोध का सामना कोच गोस्वामी ने भी किया। मुझे गर्व है कि दिव्या ने राष्ट्रीय स्तर पर चमकने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब एशियाई खेलों और ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाना ही सपना है। अब अब तक 69 जीत चुकी है। पिता सूरजवीर के दिल में बसी उनकी सफलता की यादें दिव्या को और मजबूत बनाती है। वह कहती है कि कुश्ती में उन्हें जो भी ऊंचाइयां मिली, वो पापा की बदौलत हासिल हुई है। उन्होंने रूढ़िवादिता को दरकिनार कर मुझे अखाड़े में लड़कों के खिलाफ बेझिझक उतारा। साहस और शौर्य का जज्बा दिया। जितनी मेरी उम्र नहीं, उससे ज्यादा पदक में राष्ट्रीय कुश्ती में जीत चुकी हूं। आज भी मेरे पापा ही मेरा खाना बनाते हैं। क्योंकि वो खुद पहलवान रहे है, उन्हें पता है कि मुझे किस तरह की खुराक की जरूरत है। मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं कि मुझे ऐसे पापा मिले, जिन्होंने भूखे प्यासे रहकर अपनी बेटी को राष्ट्रीय धुन सुनते हुए विक्ट्री स्टैंड पर गले में पदक का गौरव पाने का मौका दिया।
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परचून की दुकान चलाकर बेटे को बनाया जज
मुजफ्फरनगर। परिवार की परवरिश में जी-जान से मेहनत करते पिता की सीख जीवन की दिशा बदल देती है। उर्दू की तालीम पाए मौहम्मद अनीस भोपा क्षेत्र के गांव जौली के बाजार में परचून की दुकान चलाते है। जिंदगी में पढ़ाई की क्या कीमत होती है, इसकी उन्हें बखूबी समझ थी। उन्होंने अपने बड़े बेटे शारिब अली को ऊंची तालीम दिलाई। हर कदम पर साथ खड़े रहे और आज उनका पुत्र बागपत जिले में सिविल जज के पद पर कार्यरत है। खासियत सिर्फ इतनी ही नहीं है, अनीस का 40 वर्षों से संयुक्त परिवार है। खाना आज भी एक चूल्हे पर बनता है।
जौली गांव के बाजार में परचून की दुकान पर सामान बेचते मौहम्मद अनीस की इलाके में मिसाल दी जाती है। फादर्स डे पर ‘अमर उजाला’ ने उनसे मुलाकात की। हर पिता का सपना होता है कि उसकी औलाद नेक बने और बड़ा ओहदा हासिल करें। ऐसा ही ख्वाब मैंने देखा। पहले गांव में एल्युमिनियम के संदूक बनाता था, फिर परचून की दुकान कर ली। बेटे शारिब अली को प्रारंभिक शिक्षा जौली में दिलाई। उसके बाद शहर के साहात हॉस्टल में रहकर डीएवी इंटर कालेज से उसने हाईस्कूल तथा इंटरमीडिएट किया। पढ़ाई को कई बार पैसे की दिक्कत आई, मगर शारिब को अहसास नहीं होने दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम की शिक्षा पाकर नेट परीक्षा पास की। बेटे की मेहनत रंग लाई, उसे पीसीएस (जे) में यूपी में 9 वीं रैंक मिली। बिहार में भी जज के पद पर उसका चयन हुआ, लेकिन उसने प्रदेश की न्यायिक सेवा को चुना। बुजुर्ग अब्बा अनीस और अम्मी मुस्लेमा फिरदौस को फख्र है कि शारिब ने जज बनकर समाज में उनका सम्मान बढ़ा दिया है। उनके बेटे शारिब अली फिलहाल बीते एक साल से बागपत में सिविल जज के पद पर कार्यरत है। उनकी पत्नि शमसा नकवी पीएचडी है। परिवार में दो बेटी जहेरा और जोनू हैं। परचून की दुकान पर छोटे भाई मौहम्मद नफीस के साथ अनीस की दिनचर्या बीतती है। कहते है, बेटे को सीख दी कि कोर्ट में जब भी न्याय देना, किसी गरीब का दिल न दुखे यह नहीं भूलना। जौली गांव में एक धर्मार्थ अस्पताल खुलवाने को बेटे को प्रेरित किया है। उनका छोटा बेटा मौलाना आमिर है, जो दिल्ली की एक मस्जिद में नमाज पढ़ाता है। मौहम्मद अनीस का परिवार बीते 40 साल से एक चूल्हे पर खाना बनाता है। जज बन गए बेटे ने कई बार अपने पास बुलाया, मगर उनका मन अपने गांव में ही लगता है। दुकान पर आए युवाओं को वे पढ़ाई की कीमत समझते रहते हैं।