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खास खबर:टूट रही भजन मंडलियां, युवाओं में नहीं क्रेज
Updated Sun, 04 Mar 2018 12:28 AM IST
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मुजफ्फरनगर। भजनों में भारत की संस्कृति और इतिहास भी छिपा है। चाहे आजादी का आंदोलन रहा हो या फिर समाज सुधार अभियान, भजन मंडलियां प्रचार का जरिया होती थी। बीते पांच दशक से अपने भजनों से वैदिक अलख जगा रहे सहदेव सिंह बेधड़क कहते है कि मॉर्डन म्यूजिक के आगे युवाओं में भजनों का क्रेज खत्म हो रहा है। बे-मतलब शब्दों की तुकबंदी से गीत और भजनों का प्रभाव कम हो गया है।
ग्रामीण अंचल में भजन मंडलियां प्रचार का माध्यम होती थी। संस्कृति और सभ्यता से जुड़े किस्से, कहानी और प्रेरक व्यक्तित्व पर आधारित भजन सुनने को लोग उमड़ते थे। बागपत जिले के गांव शिकोहपुर के चौधरी पृथ्वी सिंह बेधड़क ने अपने भजनों से देश में ख्याति पाई। उनके सानिध्य में 14 वर्ष की आयु में आए पौत्र सहदेव सिंह बेधड़क बीते 55 साल से देश के मंचों पर अपने भजनों का समा बांधे हुए है। आर्य समाज नई मंडी में आए भजनोपदेशक सहदेव सिंह बेधड़क से अमर उजाला ने बातचीत की।
बेधड़क ने कहा कि भजन मंडलियां खत्म हो रही है। आधुनिक संस्कृति के आगे संगीत की यह परंपरा अब युवा पीढ़ी को नहीं लुभाती। भजनों को सीखने वाले शिष्य भी कम हो गए है। पहले भजन याद करने में लंबा वक्त लगता था। अब लिखा भजन पढ़ कर सुनाते है। स्वाध्याय की कमी भी एक वजह है। भजन भी फिल्मी गीतों की तर्ज पर ज्यादा पसंद किए जाते हैं। तर्ज का प्रयोग गलत नहीं, मगर शब्दों में दोष न हो। वर्ष 1967 में भजन मंडली बना कर वेदों का प्रचार शुरु किया था। बड़ौत और हरियाणा के महेंद्रगढ़ में भजन सुनने को भारी भीड़ उमड़ती है। शामली के टोड़ा गांव का ढोलकिया श्यामलाल आर्य 25 साल उनके साथ रहा। घरौंडा के स्वामी भीष्म और शामली के सिंभालका के वीरेंद्र वीर जैसे भजनोपदेशक से प्रेरणा मिली। वोट क्लब दिल्ली पर वर्ष 1976-77 में चौधरी चरण सिंह की मौजूदगी में लाखों किसानों के मंच पर भजन सुनाने की स्वर्णिम यादेें नहीं भूलती। भजन संस्कृति को बचाने के लिए वैदिक संस्थाओं को पहल करनी होगी।
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भजनों की 48 किताबें लिख गए पृथ्वी सिंह
मुजफ्फरनगर। ख्यातिलब्ध पृथ्वी सिंह बेधड़क के भजनों को सुनने की सबसे ज्यादा मांग होती है। सहदेव सिंह बेधड़क बताते है कि जगत में बड़ा बताया काम, बिना काम करने वालों की ना कीमत एक छदाम तथा जिस दिन देश सौंप दे लठौरी को, तब देश का नक्शा बदलेगा जैसे पृथ्वी सिंह के भजन आज भी श्रोता सुनते है। 10 फरवरी 1973 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन शिकोहपुर में हुआ। उन्होंने भजनों की 48 किताबें लिखी थी।
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ग्रामीण अंचल में भजन मंडलियां प्रचार का माध्यम होती थी। संस्कृति और सभ्यता से जुड़े किस्से, कहानी और प्रेरक व्यक्तित्व पर आधारित भजन सुनने को लोग उमड़ते थे। बागपत जिले के गांव शिकोहपुर के चौधरी पृथ्वी सिंह बेधड़क ने अपने भजनों से देश में ख्याति पाई। उनके सानिध्य में 14 वर्ष की आयु में आए पौत्र सहदेव सिंह बेधड़क बीते 55 साल से देश के मंचों पर अपने भजनों का समा बांधे हुए है। आर्य समाज नई मंडी में आए भजनोपदेशक सहदेव सिंह बेधड़क से अमर उजाला ने बातचीत की।
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बेधड़क ने कहा कि भजन मंडलियां खत्म हो रही है। आधुनिक संस्कृति के आगे संगीत की यह परंपरा अब युवा पीढ़ी को नहीं लुभाती। भजनों को सीखने वाले शिष्य भी कम हो गए है। पहले भजन याद करने में लंबा वक्त लगता था। अब लिखा भजन पढ़ कर सुनाते है। स्वाध्याय की कमी भी एक वजह है। भजन भी फिल्मी गीतों की तर्ज पर ज्यादा पसंद किए जाते हैं। तर्ज का प्रयोग गलत नहीं, मगर शब्दों में दोष न हो। वर्ष 1967 में भजन मंडली बना कर वेदों का प्रचार शुरु किया था। बड़ौत और हरियाणा के महेंद्रगढ़ में भजन सुनने को भारी भीड़ उमड़ती है। शामली के टोड़ा गांव का ढोलकिया श्यामलाल आर्य 25 साल उनके साथ रहा। घरौंडा के स्वामी भीष्म और शामली के सिंभालका के वीरेंद्र वीर जैसे भजनोपदेशक से प्रेरणा मिली। वोट क्लब दिल्ली पर वर्ष 1976-77 में चौधरी चरण सिंह की मौजूदगी में लाखों किसानों के मंच पर भजन सुनाने की स्वर्णिम यादेें नहीं भूलती। भजन संस्कृति को बचाने के लिए वैदिक संस्थाओं को पहल करनी होगी।
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भजनों की 48 किताबें लिख गए पृथ्वी सिंह
मुजफ्फरनगर। ख्यातिलब्ध पृथ्वी सिंह बेधड़क के भजनों को सुनने की सबसे ज्यादा मांग होती है। सहदेव सिंह बेधड़क बताते है कि जगत में बड़ा बताया काम, बिना काम करने वालों की ना कीमत एक छदाम तथा जिस दिन देश सौंप दे लठौरी को, तब देश का नक्शा बदलेगा जैसे पृथ्वी सिंह के भजन आज भी श्रोता सुनते है। 10 फरवरी 1973 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन शिकोहपुर में हुआ। उन्होंने भजनों की 48 किताबें लिखी थी।