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‘जिगर’ से लूटी मालिनी अवस्थी ने महफिल, गीतों की झड़ी में देर रात तक भीगे श्रोता
Tue, 18 Jun 2019 10:23 AM IST
Abhishek Singh
अमर उजाला ब्यूरो, मुरादाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, मुरादाबाद
Published by: Abhishek Singh
Updated Tue, 18 Jun 2019 10:23 AM IST
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गायिका मालिनी अवस्थी
- फोटो : Amar Ujala
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पद्मश्री से सम्मानित मशहूर लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने जिगर मंच से भोजपुरी, अवधी और बुंदेली बोलियों में रचे गीतों को अपनी मीठी आवाज दी है। गीतों में छिपी कहानियों को सुनाती मालिनी अवस्थी ने श्रोताओं को एक अनदेखी डोर में देर रात तक बांधे रखा।
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पूर्वांचल के राग ‘उड़ जाओ रे सुगना जमना पार गंगा पार...’ से गायिकी की शुरुआत करके मालिनी अवस्थी श्रोताओं को सियापति श्रीराम के बचपन में ले गई। उन्होंने झूला सुनाया ‘झूला सुनाया .. सिया संग झूलना बगिया में राम ललना...’। इसे सुनकर श्रोता मुग्ध हो गए।
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जिगर मुरादाबादी के शहर में मालिनी अवस्थी ने उनकी मशहूर गजल ‘इक लफ्ज-ए-मोहब्बत का, अदना सा फसाना है...सिमटे तो दिले आशिक, फैले तो जमाना है’ सुनाई। ढोलक की थाप पर ‘मनाए लाओ देवी को, चांदी की गिलसिया में पानी परोसा.. पिलाए लाओ देवी को..’ गाकर उन्होंने श्रोताओं को आनंदित कर दिया।
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वियोग के गीत ‘रेलियां बैरन पिया को लिए जाए रे..’ से उन्होंने पति और पत्नियों के प्यार को शब्दों के धागे में पिरो दिया। साज में की बोर्ड पर सचिन, बेस गिटार पर सेवक, तबले पर मुकेश मधुकर, ढोलक पर अमित ने साथ दिया। कार्यक्रम में अपर जिला अधिकारी नगर राजेंद्र सिंह सेंगर और जिला कृषि अधिकारी डॉ. सुभाष वर्मा मौजूद रहे।
'लोकगीत लोगों की सोच की अभिव्यक्ति'
स्वर साधिका मालिनी अवस्थी के मुताबिक लोकगीत बस लोगों की सोच की ही अभिव्यक्ति है। लोक संस्कृति को पहचानने की विधा ही लोक गायिकी है।
लोकगायिकी को समझाते हुए मालिनी बोलीं कि लोकगीत क्या है, मन के भाव ही है। जीवन के हर पल को लोकगीतों में बुना गया है। हम मेघों के आसमान में घुमड़ने पर गाते हैं, नहीं बरसे तो भी गाते हैं। कजरी, सावन, भादों यानि बरसात के महीने में गाई जाने वाली लोक संगीत है। जब काले मेघ आसमान में घूमने लगें, तब लोग मस्त होकर कजरी गाते हैं। इनका सृजन मनोरंजन के लिए नहीं हुआ था।
उन्होंने कहा कि अब परिवार नहीं रहे, तो लोकगायिकी को भी नुकसान हुआ है। ननद, भाभी की ठिठोली अब कहां है। मान-अभिमान, रूठने में अब प्यार नहीं है। सास-बहू के बीच मनमुटाव भी तो गाया जाता था। अब ऐसा कहां है। परिवार का मतलब भी पति, पत्नी और बच्चे नहीं है। परिवार का मतलब मुंडेर पर बैठी चिरैया, कागा, वो आसमान का बदरा, सब हैं।
यू ट्यूब पर खूब सुने जाते हैं लोकगीत
मैं कहना चाहूंगी कि डिजिटल मीडिया से लोकगीतों के सुनने वालों में बढ़ोत्तरी हुई है। अब परिवार तो बचे नहीं, यू ट्यूब पर ही लोग लोकगीतों को सुनकर आनंदित होते हैं। यह भी बड़ा बदलाव है।