लक्ष्मीबाई जयंती विशेष: गढ़ गंगा मेले में ही रानी ने रखीं थी 1857 के गदर की नींव
देश की बेटियों के लिए आदर्श झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की आज जयंती है। उनके जीवन से जुड़ी घटनाएं उनके संघर्ष की गाथा को बयान करती हैं। उनके जीवन से ही जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा हम यहां बता रहें हैं जिससे आप समझ पाएंगे कि उनके दिल में देश के लिए किस हद तक प्यार था।
गढ़ के गंगा मेले का आजादी के पुरोधाओं से नजदीकी का रिश्ता रहा है। कई ऐसे दस्तावेज मिलते हैं जिनमें कहा गया है कि साधु-संत के वेश में गढ़ मेले में क्रांतिकारी आम जन को जंग-ए-आजादी की प्रेरणा देने आते थे। भारत के पहले स्वातंत्र्य संग्राम की सिरमौर रहीं रानी लक्ष्मी बाई का भी गढ़ मेले से गहरा नाता रहा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 1856 में गढ़ में आयोजित गंगा मेले में रानी लक्ष्मी बाई खुद आई थीं और उन्होंने महान समाज सुधारक और आर्य समाज की नींव रखने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती से स्वतंत्रता संग्राम के लिए मदद ली थी।
अंग्रेजों के शब्दों में गदर और भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 की तैयारियों से पूर्व झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब पेशवा और तात्या टोपे के साथ कार्तिक मास में गंगा स्नान पर ही लगने वाले मेले पर स्वामी दयानंद सरस्वती से भेंट करने पहुंची थीं। उन दिनों स्वामी दयानंद सरस्वती उदयपुर महाराज के यहां से लौटे थे। गंगा मेले उन्होंने अपनी पाखंड खंडिनी पताका पहराई थी। हिंदू संप्रदाय में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ वह यहां उद्बोधन करते थे।
जब लक्ष्मीबाई, नाना साहेब और तात्या टोपे स्वामी जी से मिले तो उन्होंने उदयपुर नरेश की ओर से दी गई 300 सोने की मोहरें आजादी की लड़ाई के लिए भेंट स्वरूप दीं। इतिहास में मिले प्रमाण की मानें तो स्वामी जी ने तीनों को राजधर्म का पाठ पढ़ाया और कहा कि अपना राज कितना की बुरा हो लेकिन वह अपना होता है। विदेशी राज कितना भी अच्छा हो लेकिन वह बुरा ही होता है। यहां से ही स्वराज और सुराज का नारा सबसे पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया। जिसे पूर्ण करने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी को पूर्ण रूप से अंग्रेजों से मुक्त कराने का सकंल्प लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती की ओर मिले आर्थिक सहयोग को उन्होंने सेना के राशन पर खर्च किया।
रानी लक्ष्मी बाई का सामना करने वाले अंग्रेज कर्नल ह्यूज के शब्दों में 1858 के गदर से जुड़े सेनानियों में 'एक मात्र मर्द' झांसी की रानी की आज जयंती है। 19 नवंबर 1828 को उनका जन्म वाराणसी में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका जीवन भारतीय महिलाओं को हमेशा प्रेरित करता रहा है। उनके जीवन से जुड़ी घटनाएं उनके संघर्ष की गाथा को बयान करती हैं। उनके जीवन से ही जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा हम यहां सुना रहें हैं जिससे आप समझ पाएंगे कि उनके दिल में देश के लिए किस हद तक प्यार था।
झांसी नरेश गंगाधर राव से इनका विवाह हुआ। गंगाधार राव की असमय मृत्यु हो गई थी। कंपनी के शासक लार्ड डलहौजी ने देशी शासकों का राज्य हड़पने का फार्मूला डाक्टरिन आफ लैप्स के रूप में ईजाद किया था। इसके तहत उन भारतीय शासकों के राज्य को कंपनी के राज्य में शामिल कर लिया जाता था जो निःसंतान थे। गंगाधर राव ने मृत्यु से पूर्व ही दामोदर नामके एक पुत्र को दत्तक यानी गोद लिया। चूंकि इंग्लिश लाॅ में गोद लिए पुत्र या पुत्री को संपत्ति का वारिस होने की कोई परंपरा नहीं थी इसलिए उन्होंने इसे वैध नहीं माना।
यहीं से शुरू हुआ अंग्रेजों और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष। उन्होंने इसके लिए अपने बचपन के मित्र नाना साहेब पेशवा और तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को झांसी से खदेड़ने का बीड़ा उठाया। चूंकि उस समय भारत रियासतों में बंटा था लिहाजा कई रियासतें अंग्रेजों को अपने राज्य से भगाने में लगी हुईं थीं। दिल्ली के आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की सदारत में आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका गया था।