Moradabad: जिला अस्पताल स्टाफ ने बनाया यूट्यूब चैनल, लावारिस मरीजों को अपनों से मिलाया, नई पहल की इसलिए चर्चा
जिला अस्पताल मुरादाबाद के प्रबंधक कुलदीप सक्सेना और स्टाफ ने तलाश अपनों की नाम से यूट्यूब चैनल शुरू किया है। इस पर ऐसे मरीजों की जानकारी साझा की जाएगी जिन्हें लोग लावारिस समझते हैं। तीन माह पहले एक्सीडेंट के बाद भर्ती हुए मानसिक रूप से कमजोर पुलकित को इसी तरह उनके परिवार से मिलाया गया। इस पहल को लोगों ने खूब सराहा है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
26 साल के पुलकित (काल्पनिक नाम) मानसिक रूप से कुछ कमजोर हैं। तीन माह पहले उनका एक्सीडेंट हुआ और वह बुरी तरह जख्मी हो गए। किसी भले आदमी ने उन्हें एंबुलेंस के जरिये जिला अस्पताल पहुंचाया। यहां उन्होंने अस्पताल स्टाफ से मारपीट और अभद्रता तक की। स्टाफ को उनका नाम और पता जानने में आठ दिन लगे।
एक नर्स को काउंसलिंग में उन्होंने अपना पता कुंदरकी का डोमघर बताया। इसके बाद उस क्षेत्र की आशा और आंगनबाड़ी का नंबर तलाशा गया। उनसे वहां के प्रधान का नंबर लिया और अस्पताल स्टाफ ने व्हाट्सएप पर मरीज को फोटो व नाम भेजा। अगले ही दिन गांव से पुलकित के परिजन जिला अस्पताल पहुंचे और स्टाफ के पैरों में गिर पड़े।
वहां से अस्पताल प्रबंधक कुलदीप सक्सेना को प्रेरणा मिली और उन्होंने ऐसे मरीजों को उनके अपनों से मिलाने का जिम्मा उठा लिया जिन्हें लोग लावारिस समझते हैं। प्रबंधक समेत अस्पताल स्टाफ की टीम ने यूट्यूब पर एक चैनल बनाया है जिसका नाम है तलाश अपनों की। 15 दिन पहले बने चैनल में अभी सिर्फ 150 लोग जुड़ पाए हैं लेकिन इस पहल को खूब सराहा जा रहा है।
अस्पताल स्टाफ का मकसद 700 से 1000 लोगों को जोड़ना है। उनका मानना है कि यदि 600-700 जुड़ गए तो शहर के हर मोहल्ले से दो व्यक्ति होंगे। चैनल पर किसी मरीज की जानकारी साझा की जाएगी तो उसके अपनों तक जरूर पहुंचेगी। फिलहाल अस्पताल में ऐसे पांच मरीज भर्ती हैं जिनके अपनों की तलाश जारी है।
मरीजों को कपड़ों के लिए एनजीओ करते हैं मदद
शहर के कुछ एनजीओ ऐसे मरीजों के लिए मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं। वर्क और परिवर्तन दी चेंज नामक दो एनजीओ इन मरीजों के लिए कपड़ों की व्यवस्था करते हैं। कुछ इन्हें खाना भी उपलब्ध कराते हैं। हालांकि खाने की व्यवस्था अस्पताल की ओर से भी रहती है। इन मरीजों को नहलाने से लेकर साफ-सफाई करने तक अलग ही स्टाफ तैनात है।
इमरजेंसी वार्ड में इसी तरह 11 साल का हिमांशु भर्ती है। उसकी आंखों में उमड़ते दर्द के समंदर को पढ़ना बड़ा आसान है। जरा कुरेदिए तो पता चलता है कि बिना मां-बाप के बच्चा पांच साल से सड़कों पर भटक रहा है। अस्पताल उसके रिश्तेदारों की तलाश में जुटा है।
तीन साल में 10 से ज्यादा मरीजों को अपनों से मिलवाया
जिला अस्पताल के स्टाफ ने इस तरह तीन साल में 10 से ज्यादा मरीजों के परिजनों को उनसे मिलवाया है। पहले यह तलाश फेसबुक व व्हाट्सएप पर चलती थी। अब इसे यूट्यूब चैनल का रूप दिया गया है। दिल्ली निवासी सिक्योरिटी गार्ड राजू अस्पताल प्रबंधक को फोन कर आज तक शुक्रिया कहते हैं। चार माह पहले ट्रेन में जहरखुरानी का शिकार होने के बाद वह अपना नाम व पता तक नहीं बता पा रहे थे। फेसबुक के जरिए उनके परिवार को पता चला तो पत्नी व बच्चे दिल्ली से दौड़े चले आए।
मैं जानता हूं कि अपनों को खोने और इनसे अलग रहने का दर्द क्या होता है। सोशल मीडिया के जरिए जब कुंदरकी वाले मरीज के परिजन मिले और अस्पताल आकर पैर पकड़ लिए, तब पता चला कि यह कितना नेक काम है। इसलिए अब चैनल बनाया है। - कुलदीप सक्सेना, जिला अस्पताल, प्रबंधक
अस्पताल के स्टाफ ने सराहनीय पहल की है। लोगों के परिजनों को सोशल मीडिया से जानकारी मिलती है तो वह अस्पताल दौड़े चले आते हैं। कुछ मरीज ऐसे भी हैं जिनके अपने उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं। ऐसे मरीजों के लिए समाज कल्याण विभाग की मदद लेंगे। - डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक