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Mirzapur News: महाष्टमी की रात में होती है महानिशा पूजा, दी जाती है बलि
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विंध्याचल। महाष्टमी की निशा में तंत्र साधना की जाती है। इसके लिए देश भर से तांत्रिक विंध्याचल पहुंचने लगे हैं। नवरात्र के प्रथम दिन से ही कई साधकयहां पहाड़ों पर कंदराओं में ध्यानमग्न हैं।
विंध्याचल में शारदीय नवरात्र में तंत्र साधना का विशेष महत्व है। तांत्रिकों और देवी भक्तों को इस समय का वर्ष भर इंतजार रहता है। तंत्र पूजा के लिए विंध्य क्षेत्र में स्थित विभिन्न मंदिरों में तांत्रिकों का जमावड़ा शुरू हो गया है। महाष्टमी की रात्रि में पूजा-अर्चना के लिए तैयारियां को अंतिम रूप दिया जा रहा है। महानिशा पूजन और मां काली पूजन के लिए देश के कोने-कोने से तांत्रिकाें और देवी भक्त आने लगे हैं।
सिद्धपीठ में बड़ी संख्या में भक्त नौ दिनों तक साधना कर सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। त्रिकोण मार्ग पर विभिन्न मंदिराें में तंत्र के अनुष्ठान किए जाते हैं। अष्टभुजा, कालीखोह, तारा देवी मंदिर, काल भैरव, कंकाल काली सहित मंदिराें में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां शुक्रवार को पूरी की जाती रहीं। विंध्य क्षेत्र में साधना का कार्य तो पूरे नवरात्र भर चलता है लेकिन महाष्टमी के दिन इसका विशेष महत्व हो जाता है। दिन की अपेक्षा सांय होते ही त्रिकोण मार्ग पर गहमा-गहमी काफी अधिक बढ़ जाती है। तंत्र साधक वाम मार्ग से उपासना कर सिद्धि प्राप्त करते हैं। विंध्याचल के भैरव कुंड रामगया घाट के श्मशान पर विराजित भगवती मां तारा देवी दस महाविद्या में प्रमुख विद्या हैं।
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शक्ति का शिव से मिलन गंगा के माध्यम से ही संभव हो पाता है क्योंकि पतित पावनी गंगा विंध्यधाम से मां विंध्यवासिनी के चरणों की रज को लेकर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की ओर प्रस्थान करती हैं। काशी में बाबा विश्वनाथ का जब जलाभिषेक होता है तो शक्ति और शिव के मिलन का दुर्लभ सुयोग होता है।
विंध्यधाम में छिपे अनेक रहस्य
विंध्याचल। विंध्यधाम में अनेक रहस्य छिपे हैं। जब कोई साधक भगवती की आराधना करता है तब माता की कृपा से इन रहस्यों पर से पर्दा अपने आप ही हटता चला जाता है। रहस्यों को देख व जान कर भक्त स्वर्ग की आनंद की अनुभूति करता है। यहां देवी का अमोघ स्नेह व आशीर्वाद भक्तों पर सदैव बरसता रहता है। महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज ने अपनी जीवनगाथा में विंध्याचल में अपनी साधना के अनुभवों का वर्णन किया है। कविराज के भक्त डॉ. भगवती शरण सिंह ने मनीषी की लोकयात्रा में इसे विस्तार से लिखा है।
त्रिकोण यात्रा से नष्ट होते हैं पाप
विंध्याचल। मान्यता है कि मां विंध्यवासिनी के दर्शन के उपरांत त्रिकोण यात्रा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। विंध्यधाम को सिद्धपीठ भी कहा जाता है। माता की असीम कृपा शक्ति अल्प समय में भक्तों को सिद्धियों को देने वाली है। विंध्य पर्वत का ईशान कोण में मां विंध्यवासिनी विराजमान हैं। नवरात्र के दिनों में मां विंध्यवासिनी पताका पर विराजती हैं। विंध्याचल ही एकमात्र ऐसा शक्तिपीठ है, जहां देवी के संपूर्ण विग्रह के दर्शन होते है। मां विंध्यवासिनी का यह मंदिर देश के 108 सिद्धपीठों में से एक है। त्रियोगी नारायण उर्फ मिठ्ठू मिश्र ने बताया कि हजारों वर्षों से विंध्य क्षेत्र ज्ञान प्राप्त करने की तपोस्थली रहा है।
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विंध्याचल में शारदीय नवरात्र में तंत्र साधना का विशेष महत्व है। तांत्रिकों और देवी भक्तों को इस समय का वर्ष भर इंतजार रहता है। तंत्र पूजा के लिए विंध्य क्षेत्र में स्थित विभिन्न मंदिरों में तांत्रिकों का जमावड़ा शुरू हो गया है। महाष्टमी की रात्रि में पूजा-अर्चना के लिए तैयारियां को अंतिम रूप दिया जा रहा है। महानिशा पूजन और मां काली पूजन के लिए देश के कोने-कोने से तांत्रिकाें और देवी भक्त आने लगे हैं।
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सिद्धपीठ में बड़ी संख्या में भक्त नौ दिनों तक साधना कर सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। त्रिकोण मार्ग पर विभिन्न मंदिराें में तंत्र के अनुष्ठान किए जाते हैं। अष्टभुजा, कालीखोह, तारा देवी मंदिर, काल भैरव, कंकाल काली सहित मंदिराें में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां शुक्रवार को पूरी की जाती रहीं। विंध्य क्षेत्र में साधना का कार्य तो पूरे नवरात्र भर चलता है लेकिन महाष्टमी के दिन इसका विशेष महत्व हो जाता है। दिन की अपेक्षा सांय होते ही त्रिकोण मार्ग पर गहमा-गहमी काफी अधिक बढ़ जाती है। तंत्र साधक वाम मार्ग से उपासना कर सिद्धि प्राप्त करते हैं। विंध्याचल के भैरव कुंड रामगया घाट के श्मशान पर विराजित भगवती मां तारा देवी दस महाविद्या में प्रमुख विद्या हैं।
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शक्ति का शिव से मिलन गंगा के माध्यम से ही संभव हो पाता है क्योंकि पतित पावनी गंगा विंध्यधाम से मां विंध्यवासिनी के चरणों की रज को लेकर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी की ओर प्रस्थान करती हैं। काशी में बाबा विश्वनाथ का जब जलाभिषेक होता है तो शक्ति और शिव के मिलन का दुर्लभ सुयोग होता है।
विंध्यधाम में छिपे अनेक रहस्य
विंध्याचल। विंध्यधाम में अनेक रहस्य छिपे हैं। जब कोई साधक भगवती की आराधना करता है तब माता की कृपा से इन रहस्यों पर से पर्दा अपने आप ही हटता चला जाता है। रहस्यों को देख व जान कर भक्त स्वर्ग की आनंद की अनुभूति करता है। यहां देवी का अमोघ स्नेह व आशीर्वाद भक्तों पर सदैव बरसता रहता है। महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज ने अपनी जीवनगाथा में विंध्याचल में अपनी साधना के अनुभवों का वर्णन किया है। कविराज के भक्त डॉ. भगवती शरण सिंह ने मनीषी की लोकयात्रा में इसे विस्तार से लिखा है।
त्रिकोण यात्रा से नष्ट होते हैं पाप
विंध्याचल। मान्यता है कि मां विंध्यवासिनी के दर्शन के उपरांत त्रिकोण यात्रा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। विंध्यधाम को सिद्धपीठ भी कहा जाता है। माता की असीम कृपा शक्ति अल्प समय में भक्तों को सिद्धियों को देने वाली है। विंध्य पर्वत का ईशान कोण में मां विंध्यवासिनी विराजमान हैं। नवरात्र के दिनों में मां विंध्यवासिनी पताका पर विराजती हैं। विंध्याचल ही एकमात्र ऐसा शक्तिपीठ है, जहां देवी के संपूर्ण विग्रह के दर्शन होते है। मां विंध्यवासिनी का यह मंदिर देश के 108 सिद्धपीठों में से एक है। त्रियोगी नारायण उर्फ मिठ्ठू मिश्र ने बताया कि हजारों वर्षों से विंध्य क्षेत्र ज्ञान प्राप्त करने की तपोस्थली रहा है।