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Mirzapur News: चौलाई<bha>--</bha><bha>--</bha>-नई प्रजाति
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सीखड़। सेहत से भरपूर चौलाई की खेती से जुड़े किसानों के लिए अच्छी खबर है। अदलपुरा स्थित सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने चौलाई की ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसकी उत्पादकता पहले से दो गुनी है और मुलायम तना होने की वजह से खाने में पहले से ज्यादा स्वाद मिलेगा। वहीं पौष्टिकता भी भरपूर रहेगी।
विगत कई वर्षों से केंद्र में पत्तेदार सब्जियों पर शोध कार्य चल रहा है जिसमें से एक प्रमुख पत्तीदार सब्जी चौलाई है। संस्थान के द्वारा चौलाई की दो किस्में विकसित की गई हैं।काशी चैलाई-1 व काशी सुहावनी किस्म का विकास किया गया है। यह दोनों किस्में उत्तर प्रदेश राज्य में जलवायु की दृष्टि से उपयुक्त है। आम चौलाई की पौधों में दो महीने में फूल आ जाते हैं जिससे ये खाने योग्य नहीं रह जाते। जबकि नई प्रजाति के पौधों का विकास ज्यादा होता है व पुष्पन देर से होता है। इनमें पांच से छह महीने बाद फूल आता है। जिससे इन्हें बार बार काटने और उगने की प्रक्रिया के चलते तब तक खाया जा सकता है। काशी सुहावनी किस्म का तना व पत्तियाँ हरी, मुलायम तथा स्वादिष्ट होती हैं। पत्तियों में प्रोटीन की मात्रा शुष्क भार के आधार पर 15.5 प्रतिशत होता है। काशी चौलाई-1 का तना बैगनी तथा पत्ते बैगनी-हरे रंग के होते हैं। यह दोनों किस्म ग्रीष्म एवं वर्षाकाल में सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है। इनका औसत उपज क्षमता 30-33 टन प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म व्हाइट रस्ट रोग के प्रति भी सहनशील है। संस्थान के निदेशक डॉ. तुषार कांति बेहरा ने बताया कि यह किस्में गृह-वाटिका में लगाने के लिये उपयुक्त हैं जिसके अनवरत उपभोग से पोषण सुरक्षा प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. विद्या सागर ने बताया कि इन दोनों किस्मों के बीज किसानों के लिये उपलब्ध हैं।
चौलाई की खास बातें - चौलाई ग्रीष्मकालीन पत्तीदार सब्जी है जो बहुत कम समय में उपयोग के लिये तैयार हो जाती है। पत्तियां मुलायम रसीली व पोषण की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी होती है। इनमें लौह तत्व प्रोटीन शुष्क भार के आधार पर पायी जाती है। इसमें पाच्य प्रोटीन 80 प्रतिशत होता है, जिसका जैव मूल्य 75-80 प्रतिशत है। पत्तियों में 220 पीपीएम विटामिन ’के’ पाया जाता है। चौलाई में विटामिन ’ए’ बीटा कैरोटीन के रूप में पाया जाता है। बीटा कैरोटीन विटामिन ’ए’ का पूर्वगामी पदार्थ है। चैलाई की कुछ ऐसी किस्में है जिनको पत्तियों के साथ-साथ दानों के लिए उगाते हैं।
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विगत कई वर्षों से केंद्र में पत्तेदार सब्जियों पर शोध कार्य चल रहा है जिसमें से एक प्रमुख पत्तीदार सब्जी चौलाई है। संस्थान के द्वारा चौलाई की दो किस्में विकसित की गई हैं।काशी चैलाई-1 व काशी सुहावनी किस्म का विकास किया गया है। यह दोनों किस्में उत्तर प्रदेश राज्य में जलवायु की दृष्टि से उपयुक्त है। आम चौलाई की पौधों में दो महीने में फूल आ जाते हैं जिससे ये खाने योग्य नहीं रह जाते। जबकि नई प्रजाति के पौधों का विकास ज्यादा होता है व पुष्पन देर से होता है। इनमें पांच से छह महीने बाद फूल आता है। जिससे इन्हें बार बार काटने और उगने की प्रक्रिया के चलते तब तक खाया जा सकता है। काशी सुहावनी किस्म का तना व पत्तियाँ हरी, मुलायम तथा स्वादिष्ट होती हैं। पत्तियों में प्रोटीन की मात्रा शुष्क भार के आधार पर 15.5 प्रतिशत होता है। काशी चौलाई-1 का तना बैगनी तथा पत्ते बैगनी-हरे रंग के होते हैं। यह दोनों किस्म ग्रीष्म एवं वर्षाकाल में सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है। इनका औसत उपज क्षमता 30-33 टन प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म व्हाइट रस्ट रोग के प्रति भी सहनशील है। संस्थान के निदेशक डॉ. तुषार कांति बेहरा ने बताया कि यह किस्में गृह-वाटिका में लगाने के लिये उपयुक्त हैं जिसके अनवरत उपभोग से पोषण सुरक्षा प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. विद्या सागर ने बताया कि इन दोनों किस्मों के बीज किसानों के लिये उपलब्ध हैं।
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चौलाई की खास बातें - चौलाई ग्रीष्मकालीन पत्तीदार सब्जी है जो बहुत कम समय में उपयोग के लिये तैयार हो जाती है। पत्तियां मुलायम रसीली व पोषण की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी होती है। इनमें लौह तत्व प्रोटीन शुष्क भार के आधार पर पायी जाती है। इसमें पाच्य प्रोटीन 80 प्रतिशत होता है, जिसका जैव मूल्य 75-80 प्रतिशत है। पत्तियों में 220 पीपीएम विटामिन ’के’ पाया जाता है। चौलाई में विटामिन ’ए’ बीटा कैरोटीन के रूप में पाया जाता है। बीटा कैरोटीन विटामिन ’ए’ का पूर्वगामी पदार्थ है। चैलाई की कुछ ऐसी किस्में है जिनको पत्तियों के साथ-साथ दानों के लिए उगाते हैं।
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