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यूपी: हाई रिस्क गेम में युवा कर रहे जिंदगी कुर्बान, राजा के बाद टिक-टॉक ने ली कपिल की जान 

Thu, 12 Mar 2020 05:58 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 12 Mar 2020 05:58 PM IST
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Youth losing their life in the craze of making tick-talk videos
गंगनहर - फोटो : अमर उजाला

हाई रिस्क गेम टिक-टॉक में जनपद के युवा जिंदगी कुर्बान कर रहे हैं। टिक-टॉक विडियो बनाने के चक्कर में दस दिन में दो युवकों की जान जा चुकी है। मीरापुर के राज कुरैशी के बाद खिंदडिया गांव के कपिल की स्टंट करते हुए मौत हुई है। टिक-टॉक का ऐसा नशा है जो युवाओं के सिर चढकर बोल रहा है और वह जिंदगी देने पर उतारू हो रहे हैं।

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जिले में 16 साल से 24 साल के बीच के युवाओं पर टिक-टॉक का नशा छाया हुआ है। बच्चे अपने घरों से लेकर सार्वजनिक स्थलों तक टिक-टॉक के लिए विडियो बनाने में मस्त है। उनके मन में यह समा गया है कि जो ज्यादा रिस्क वाली विडियो है वह ज्यादा देखी जा रही है। उनकी विडियो के लाखों, करोड़ों फालोअर होंगे तो वह जल्द ही करोड़पति बन जाएंगे। ऐसी विडियो जो अधिक देखी जाए, बनाने की होड़ युवाओं में लगी है। 
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इस होड़ के चक्कर में बीते दस दिनों में दो युवाओं की मौत हो चुकी है। मीरापुर के 18 साल के राज कुरैशी की दस दिन पहले कुतुबपुर गंगनहर में डूबने से मौत हो गई। मौत का राज तब सामने आया जब उनकी नहर में छलांग लगाते हुए विडियो सामने आई। टिक-टॉक की विडियो बनाते हुए यह हादसा हुआ और राज की जिंदगी चली गई।

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अभी लोग इस घटना को भुला भी नहीं पाए थे कि होली के दिन छपार थाना क्षेत्र के खिंदडिया गांव में दूसरी घटना घटित हो गई। उत्तम शुगर मिल में नौकरी करने वाला कपिल होली उत्सव के दौरान ट्रेक्टर से स्टंट कर रहा था। ट्रेक्टर इस तरह से गिरा कि वह ट्रेक्टर के नीचे आ गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। 

कपिल को टिक टॉक की विडियो बनाने का जुनून चढा था जिसने उसकी जान ले ली। अत्यधिक दु:खद यह है कि 22 साल के कपिल की दो माह पहले ही शादी हुई थी। जिन घरों में बच्चे टिक-टॉक के चंगुल में फंस गए है, सभी परिवार टेंशन में है। यह ऐसा नशा बनता जा रहा है जो जान ले रहा है। 

टैक्नोलॉजी के साथ नए कानून भी बनें
डीएवी कॉलेज के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रमुख समाजशास्त्री डॉ कलम सिंह का कहना है कि युवाओं में स्टेट्स और पैसे को लेकर एक होड़ सी है। आईडेंटी क्राइसेज के चलते युवा इस तरह के कदम उठा लेते हैं, जिनमें उनकी जान चली जाती है। परिवारों में कम्यूनिकेशनगेप बढता जा रहा है। परिवार के सदस्य मोबाईल में अपने आप में खोए हैं। युवाओं की भावनाओं को समझकर उन्हें समझाया जा सकता है। नई टैक्नोलॉजी तो आ रही है, लेकिन उसके साथ नए कानून नहीं बन पा रहे हैं। संसद को समाज की चिंता नहीं है। दुनिया के दूसरे देशों में नई टैक्नोलॉजी के साथ आवश्यकता के हिसाब से नए कानून भी बनते हैं, यहां ऐसा नहीं है। 

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