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मेरठ में पुलिस अफसरों की ये चूक बनी बवाल की वजह, ऐसा करते तो नहीं जलता शहर

Sat, 21 Dec 2019 02:11 AM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sat, 21 Dec 2019 02:11 AM IST
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Police officers are negligent behind the protest and violence in Meerut
आला अफसर - फोटो : अमर उजाला

नागरिकता कानून का देशभर में विरोध चल रहा है। इसे लेकर प्रदेश में भी अलर्ट घोषित कर दिया गया था। अलर्ट को लेकर मेरठ पुलिस प्रशासन अपनी पूरी तैयारी का दावा मुख्यमंत्री की वीडियो कांफ्रेंसिंग में भी कर चुका था। विरोध के बहाने बवाल का पूरा इनपुट भी पुलिस प्रशासन के पास बृहस्पतिवार से ही था। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन बवालियों के सामने फेल नजर आया। 

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यहां रही चूक
आला अधिकारियों ने रणनीति के तहत बवाल के प्रमुख केंद्र हापुड़ अड्डा चौराहा पर फोर्स तो तैनात कर दी। लेकिन वहां ऐसे अधिकारियों को तैनात नहीं किया, जो वहां की भौगोलिक स्थिति से पूरी तरह वाकिफ हों। साथ ही क्षेत्र के जिम्मेदार लोगों से भी परिचित हों। होना ये चाहिए था कि नमाज से पहले और बाद में पुलिस प्रशासन को क्षेत्र के जिम्मेदार लोगों को अपने साथ रखना चाहिए था। ताकि उपद्रवियों में शामिल युवा वर्ग को कंट्रोल किया जा सके। लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।
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मेरठ में दंगों और बवाल का अपना इतिहास है। यहां के मिजाज को भांपते हुए जिस अधिकारी ने काम किया, वह बवालियों पर ही नहीं बल्कि बवाल होने से पहले उस पर काबू पाने में भी कामयाब रहे। शुक्रवार को हुआ बवाल पूरी तरह पूर्व नियोजित था। इसका इनपुट भी पुलिस प्रशासन को मिल चुका था। ऐसे में इस बवाल पर काबू पाना मुश्किल तो था, लेकिन असंभव नहीं था। मेरठ के मिजाज को भांपते हुए सधी हुई रणनीति के साथ इस पर काबू पाया जा सकता था। लेकिन पुलिस के आला अधिकारी अति आत्मविश्वास में चूक कर गए।

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शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद हापुड़ रोड, हापुड़ चौराहा से भूमिया पुल तक, कोतवाली क्षेत्र में बवाल होने की पुख्ता सूचना थी। इसकी तैयारी भी सुबह से नजर आई। इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा फोर्स तैनात किया गया था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि इतनी फोर्स के बावजूद बवाली काबू में नहीं आ सके।  

बाहरी लोगों की भीड़ रही चौंकाने वाली 
इस उपद्रव में बड़ी संख्या में ऐेसे भी लोग थे, जो खानाबदोश जैसे थे। इन्हें बाहरी भीड़ के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों की मानें तो यह भीड़ उन लोगों की थी, जो शहर में कूड़ा बीनने के साथ ही मीट फैक्टरियों में काम करते हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर इन लोगों को ही सबसे ज्यादा डर सता रहा है। ऐसे में इस भीड़ का नियोजित षड़यंत्र के तहत बवाल में उपयोग किया गया। 

बंद थे स्कूल कॉलेज और इंटरनेट 
लखनऊ और अलीगढ़ में बवाल होने के बाद से ही मेरठ में चौकसी बढ़ा दी गई थी। एलआईयू और इंटेलीजेंस भी अलर्ट थी। 16 दिसंबर को मेरठ में 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवा भी बंद रही। लखनऊ से लगातार मेरठ के माहौल पर निगरानी की गई। 19 और 20 दिसंबर को शहर के सभी शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गए। बृहस्पतिवार को पुलिस प्रशासन के अफसरों ने हापुड़ अड्डा चौराहे पर आरएएफ व पीएसी के साथ पैदल मार्च किया। शुक्रवार को इंटरनेट बंद कर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश थे।

एक वर्ग ने बंद रखी थीं दुकानें

शुक्रवार को शहर में एक वर्ग के लोगों की दुकानें और अन्य प्रतिष्ठान नहीं खुले। ऐसे में सरकारी तंत्र नहीं भांप पाया कि अंदर क्या चल रहा है। बृहस्पतिवार रात को अलग अलग स्थानों पर गोपनीय मीटिंग भी हुईं। 

पूर्व के बवालों से नहीं ली सीख
मेरठ में बीते एक साल में तीन बड़ी घटनाएं होने के बाद भी पुलिस प्रशासन ने सीख नहीं ली। दो अप्रैल 2018 को भी शहर से लेकर हाईवे तक आगजनी हुई। शोभापुर पुलिस चौकी फूंक दी गई थी। दर्जनों वाहनों में तोड़फोड़ की गई। वहीं आठ मार्च 2019 को मछेरान में कैंट बोर्ड की टीम पर हमला हुआ। दिल्ली रोड पर बसों में लूटपाट और तोड़फोड़ हुई। 200 झोपड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। उसके बाद 30 जून 2019 को शांति मार्च पर बवाल हुआ। फैज-ए-आम से सैकड़ों लोगों ने जुलूस निकाला था। इसमें एसएसपी और आईजी पर गाज गिरी थी।

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