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कलियुग का अमृत है भागवत कथा
Updated Wed, 07 Mar 2018 11:28 PM IST
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कोपागंज। क्षेत्र के सहरोज गांव में चल रहे साप्ताहिक संगीतमय श्री भागवत कथा के दूसरे दिन अनूपानंद जी महराज ने कहा कि भगवान का दूसरा नाम ही सत्य है। सत्यनिष्ठ प्रेम के पुजारी भक्त भगवान के अति प्रिय होते हैं। कलियुग में कथा का आश्रय ही सच्चा सुख प्रदान करता है। कथा श्रवण करने से द:ुख और पाप मिटते हैं। सभी प्रकार के सुख एवं शांति की प्राप्ति होती है।
कहा कि भागवत कलियुग का अमृत है और सभी दुखों की एक ही औषधि भागवत कथा है। यह अवरोध मिटाने वाली उत्तम अवसाद है। भागवत का आश्रय करने वाला कोई भी दु:खी नहीं होता। भगवान शिव ने सुखदेव बनकर सारे संसार को भागवत सुनाई है। कथाकार भरत व्यास ने श्रोताओं को कर्मो का सार बताते हुए कहा कि अच्छे और बुरे कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। उन्होंने भीष्म पितामह का उदाहरण देते हुए कहा कि भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शैय्या पर लेटे थे। जब भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर लेटे थे तब वे सोच रहे थे कि मैंने कौन सा पाप किया है, जो मुझे इतने कष्ट सहन करना पड़ रहा है। उसी वक्त भगवान कृष्ण भीष्म पितामह के पास आते हैं। तब भीष्म पितामह कृष्ण से पूछते हैं कि मैंने ऐसे कौन से पाप किए हैं कि बाणों की शैय्या पर लेटा हूं पर प्राण नहीं निकल रहे हैं। तब भगवान कृष्ण ने भीष्म पितामह से कहा कि आप अपने पुराने जन्मों को याद करो और सोचो कि आपने कौन सा पाप किया है। भीष्म पितामह बहुत ज्ञानी थे। उन्होंने कृष्ण से कहा कि मैंने अपने पिछले जन्म में रत्ती भर भी पाप नहीं किया है। इस पर कृष्ण ने उन्हें बताते हुए कहा कि पिछले जन्म में जब आप राजकुमार थे और घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। उसी दौरान आपने एक नाग को जमीन से उठाकर फेंक दिया तो कांटों पर लेट गया था पर छह माह तक उसके प्राण नहीं निकले थे। उसी कर्म का फल है जो आप छह महीने तक बाणों की शैय्या पर लेटे हैं। इसका मतलब है कि कर्म का फल सभी को भुगतना होता है। इसलिए कर्म करने से पहले कई बार सोचना चाहिए। भागवत भाव प्रधान और भक्ति प्रधान ग्रंथ है। भगवान पदार्थ से परे है, प्रेम के अधीन है। प्रभु को मात्र प्रेम ही चाहिए। अगर भगवान की कृपा दृष्टि चाहते हैं तो उसको सच्चाई की राह पर चलना चाहिए। इस मौके पर आयोजक शशि प्रकाश राय, प्रधान प्रतिनिधि योगेश राय, इंदुशेखर राय, नागेंद्र, राकेश राय, विष्णु, मनोज, अवधेश, अच्छेलाल साहनी, अमित, सुमित आदि रहे।
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कहा कि भागवत कलियुग का अमृत है और सभी दुखों की एक ही औषधि भागवत कथा है। यह अवरोध मिटाने वाली उत्तम अवसाद है। भागवत का आश्रय करने वाला कोई भी दु:खी नहीं होता। भगवान शिव ने सुखदेव बनकर सारे संसार को भागवत सुनाई है। कथाकार भरत व्यास ने श्रोताओं को कर्मो का सार बताते हुए कहा कि अच्छे और बुरे कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। उन्होंने भीष्म पितामह का उदाहरण देते हुए कहा कि भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शैय्या पर लेटे थे। जब भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर लेटे थे तब वे सोच रहे थे कि मैंने कौन सा पाप किया है, जो मुझे इतने कष्ट सहन करना पड़ रहा है। उसी वक्त भगवान कृष्ण भीष्म पितामह के पास आते हैं। तब भीष्म पितामह कृष्ण से पूछते हैं कि मैंने ऐसे कौन से पाप किए हैं कि बाणों की शैय्या पर लेटा हूं पर प्राण नहीं निकल रहे हैं। तब भगवान कृष्ण ने भीष्म पितामह से कहा कि आप अपने पुराने जन्मों को याद करो और सोचो कि आपने कौन सा पाप किया है। भीष्म पितामह बहुत ज्ञानी थे। उन्होंने कृष्ण से कहा कि मैंने अपने पिछले जन्म में रत्ती भर भी पाप नहीं किया है। इस पर कृष्ण ने उन्हें बताते हुए कहा कि पिछले जन्म में जब आप राजकुमार थे और घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। उसी दौरान आपने एक नाग को जमीन से उठाकर फेंक दिया तो कांटों पर लेट गया था पर छह माह तक उसके प्राण नहीं निकले थे। उसी कर्म का फल है जो आप छह महीने तक बाणों की शैय्या पर लेटे हैं। इसका मतलब है कि कर्म का फल सभी को भुगतना होता है। इसलिए कर्म करने से पहले कई बार सोचना चाहिए। भागवत भाव प्रधान और भक्ति प्रधान ग्रंथ है। भगवान पदार्थ से परे है, प्रेम के अधीन है। प्रभु को मात्र प्रेम ही चाहिए। अगर भगवान की कृपा दृष्टि चाहते हैं तो उसको सच्चाई की राह पर चलना चाहिए। इस मौके पर आयोजक शशि प्रकाश राय, प्रधान प्रतिनिधि योगेश राय, इंदुशेखर राय, नागेंद्र, राकेश राय, विष्णु, मनोज, अवधेश, अच्छेलाल साहनी, अमित, सुमित आदि रहे।
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