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विंध्याचल की पहाड़ियों में ढूढे नहीं मिलते अब शरीफा के पेड़
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जंगलों में नजर नहीं आ रहे शरीफ के पेड़
- फोटो : LALITPUR
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डोंगराखुर्द/ललितपुर। गौना वन रेंज के तहत नाराहट क्षेत्र की विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं में अब शरीफा के पेड़ ढूंढे नहीं मिलते हैं। इसकी वजह अवैध कटान है। करीब तीन दशक पहले डोंगराखुर्द, पटना, पारौल, नाराहट आदि गांवों से सटे जंगलों में सीताफल (शरीफा) की पैदावार खूब होती थी और इसे ट्रकों में भरकर महानगरों की मंडियों में बिकने भेजा जाता था, जो सहरियों की आमदनी का जरिया हुआ करता था।
झांसी मंडल में सबसे बड़ा जंगल ललितपुर में है। इसमें गौना वन रेंज के जंगल में सर्वाधिक जड़ी-बूटी व फलदार पेड़ हुआ करते थे। नाराहट क्षेत्र व उसके आसपास लगने वाले शरीफे की मिठास की प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी। ग्राम डोंगरा खुर्द पटना ,पारौल, नाराहट आदि गांव के समीप स्थित जंगलों एक समय हजारों की संख्या में सीताफल (शरीफा) के पेड़ हुआ करते थे, जिनसे बड़ी मात्रा में सीताफल की पैदावार होती थी।
बुजुर्गों का कहना है कि पुराने जमाने में जंगली क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग जंगलों पर निर्भर थे। जंगलों की जड़ी बूटी, छाल, लकड़ी फल आदि से सहरियों की गुजर बसर चलती थी। लेकिन कालांतर में वन माफियाओं एवं खनन माफियाओं ने अपने निजी स्वार्थों चलते हरे भरे फलदार वृक्षों को उजाड़ दिया। हरियाली का दिनों दिन का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। ललितपुर में एमपी के चंदेरी से सीताफल बिकने आता है। अब ज्यादातर शरीफा के पेड़ मध्य प्रदेश के चंदेरी के जंगलों एवं उसके आसपास ही बचे हैं।
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स्वादिष्ट व फायदेमंद होता है शरीफा
जानकारों के अनुसार, सीताफल को शरीफा नाम से भी जाना जाता है। यह एक स्वादिष्ट और पौष्टिक फल है। इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। सीताफल में एंटीऑक्सीडेंट, मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।
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पांच साल सें सीताफल मुंह पर रखने को नहीं मिला है, पहले यहां हजारों की संख्या में पौधे खड़े दिखाई देते थे। अब धीरे-धीरे करके यह नष्ट होते जा रहे हैं और गिने चुने पेड़ ही दिखते हैं। -राम लाल झां।
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कुछ साल पहले बाहर से सीताफलों के खरीदकार आते थे, जिससे लोगों को रोजगार व आमदनी हो जाती थी। वन विभाग को सीताफल के ज्यादा से ज्यादा पौधे लगवाना चाहिए।- करोड़े पाल
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तीन चार गांव में सीताफलों की भरमार थी। सर्दी के मौसम में लोगों को पर्याप्त मात्रा में खाने के लिए मिल जाते थे और नाते रिश्तेदारों के यहां भी भिजवा देते थे।-मनीराम यादव ।
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कम वर्षा के कारण सीताफलों के पौधे सूख रहे हैं और लोग कच्चे फलों को भी तोड़ लेते हैं, इससे बीज जमीन में नहीं गिर पाता है। इस वजह से जंगलों में नये पौधे नहीं उग पा रहे हैं। पौधरोपण के समय हर साल सीताफलों के पौधे लगवाएं जा रहे हैं।- आर के शाही वन क्षेत्राधिकारी गौना ।
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झांसी मंडल में सबसे बड़ा जंगल ललितपुर में है। इसमें गौना वन रेंज के जंगल में सर्वाधिक जड़ी-बूटी व फलदार पेड़ हुआ करते थे। नाराहट क्षेत्र व उसके आसपास लगने वाले शरीफे की मिठास की प्रसिद्धि दूर-दूर तक थी। ग्राम डोंगरा खुर्द पटना ,पारौल, नाराहट आदि गांव के समीप स्थित जंगलों एक समय हजारों की संख्या में सीताफल (शरीफा) के पेड़ हुआ करते थे, जिनसे बड़ी मात्रा में सीताफल की पैदावार होती थी।
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बुजुर्गों का कहना है कि पुराने जमाने में जंगली क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग जंगलों पर निर्भर थे। जंगलों की जड़ी बूटी, छाल, लकड़ी फल आदि से सहरियों की गुजर बसर चलती थी। लेकिन कालांतर में वन माफियाओं एवं खनन माफियाओं ने अपने निजी स्वार्थों चलते हरे भरे फलदार वृक्षों को उजाड़ दिया। हरियाली का दिनों दिन का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। ललितपुर में एमपी के चंदेरी से सीताफल बिकने आता है। अब ज्यादातर शरीफा के पेड़ मध्य प्रदेश के चंदेरी के जंगलों एवं उसके आसपास ही बचे हैं।
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स्वादिष्ट व फायदेमंद होता है शरीफा
जानकारों के अनुसार, सीताफल को शरीफा नाम से भी जाना जाता है। यह एक स्वादिष्ट और पौष्टिक फल है। इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। सीताफल में एंटीऑक्सीडेंट, मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।
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पांच साल सें सीताफल मुंह पर रखने को नहीं मिला है, पहले यहां हजारों की संख्या में पौधे खड़े दिखाई देते थे। अब धीरे-धीरे करके यह नष्ट होते जा रहे हैं और गिने चुने पेड़ ही दिखते हैं। -राम लाल झां।
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कुछ साल पहले बाहर से सीताफलों के खरीदकार आते थे, जिससे लोगों को रोजगार व आमदनी हो जाती थी। वन विभाग को सीताफल के ज्यादा से ज्यादा पौधे लगवाना चाहिए।- करोड़े पाल
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तीन चार गांव में सीताफलों की भरमार थी। सर्दी के मौसम में लोगों को पर्याप्त मात्रा में खाने के लिए मिल जाते थे और नाते रिश्तेदारों के यहां भी भिजवा देते थे।-मनीराम यादव ।
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कम वर्षा के कारण सीताफलों के पौधे सूख रहे हैं और लोग कच्चे फलों को भी तोड़ लेते हैं, इससे बीज जमीन में नहीं गिर पाता है। इस वजह से जंगलों में नये पौधे नहीं उग पा रहे हैं। पौधरोपण के समय हर साल सीताफलों के पौधे लगवाएं जा रहे हैं।- आर के शाही वन क्षेत्राधिकारी गौना ।