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जीवन में मन की पवित्रता कल्याणकारी : आचार्य
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ललितपुर। आचार्य निर्भय सागर महाराज ने कहा कि प्राणी को नाम का संतोषी नहीं, बल्कि आचरण का संतोषी बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को धन, भोजन और नारी के प्रति लोभ करना चाहिए, जबकि दान देने, पठन और तप आदि करने में लोभ नहीं करना चाहिए। वह रविवार को जैन पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में पर्यूषण पर्व पर प्रवचन दे रहे थे।
आचार्य श्री ने कहा कि पाप की मां तृष्णा, लोभ पिता, आशा बेटी और ईर्ष्या पाप की वहन है। अगर अपनी आत्मा को परमात्मा और घर को अच्छा बनाना है तो परिवार से संबंध मत बनाओ, अपने परिवार को देखो यही शौच धर्म है। उन्होंने कहा कि तन की पवित्रता तो बाहर की पवित्रता रहती है सच्ची पवित्रता तो मन की होती है, जो कल्याणकारी रहती है। धर्मसभा का शुभारंभ श्रेष्ठीजनों ने आचार्य विद्यासागर महाराज, आचार्य अभिनंदन सागर महाराज, आचार्य विपुल सागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
प्रातकाल: आचार्यश्री के सानिध्य में सामयिक प्रतिक्रमण ध्यान श्रावकों द्वारा किया गया, जिसमें ध्यानपूर्वक सम्मेद शिखर तीर्थक्षेत्र की भावपूर्ण वंचना हुई। पुण्यार्जक परिवार ने पूजन के उपरांत भक्तिपूर्वक जैनधर्म के 9वें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू समर्पित किया।
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इधर, अभिनंदनोदय तीर्थ में मुनि सुदत्त सागर महाराज एवं मुनि पदमदत्त सागर महाराज के सानिध्य में श्रावकों ने पर्वराज पर्यूषण पर्व पर प्रभु अभिषेक शांतिधारा की। उन्होंने शौच धर्म को समझाते हुए कहा कि संतोष रूपी जल से अपनी आत्मा को पवित्र कर पावन करने में ही सच्चा सुख है। यह शुचिता का पावन पर्व जीवन में आत्मिक शांति का बोध कराता है। मध्याह्न में तत्वार्थ सूत्र को आचार्य श्री ने श्रावकों को अपने चिंतन द्वारा समझाया।
वहीं, जैन मंदिर आदिनाथ बड़ा मंदिर, चंद्रप्रभु मंदिर डोडाघाट, शांतिनगर मंदिर गांधीनगर, इलाइट जैन मंदिर, सिविल लाइन जैन मंदिर में श्रावकों ने प्रभु की पूजन-अर्चन कर धर्मलाभ लिया। अटामंदिर में धर्मसभा में बह्मचारिणी लवली ने कहा कि संतोष रूपी जल से अपनी आत्मा को पवित्र कर पावन करने में ही सच्चा सुख है। यह शुचिता का पावन पर्व जीवन में आत्मिक शांति का बोध कराता है।
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कर्म व आत्मा को पवित्र करना ही उत्तम शौच धर्म : पंडित दयाचंद
पुलवारा। दशलक्षण महापर्व पर दिगंबर जैन मंदिर में श्रावकों ने विधि-विधान से श्रीजी का सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा व पूजन किया। पंडित दयाचंद शास्त्री ने कहा कि लोभ, लालच का परित्याग और कर्म व आत्मा को पवित्र करना ही उत्तम शौच धर्म है। उन्होंने कहा कि कषाय आदि का त्याग करके जो व्यक्ति निर्लोभी बनता है, वही सही अर्थ में धर्म का पालक है। लोभ कषाय के अभाव पूर्वक आत्मा की शुद्ध परिणति को शौच धर्म कहते हैं। शास्त्रों में शौच धर्म की व्याख्या करते हुए गृहस्थ को परिग्रह परिमाण व्रत व साधुओं को महाव्रत रूप शौच धर्म होता है। अनुयायियों ने उत्तम शौच धर्म को आत्मसात करने का संकल्प लिया। इस मौके पर कोमल चंद्र जैन, राजकुमार जैन, सुरेशचंद्र, संजीव जैन, राकेश जैन, राजीव, आनंद, अक्षय, रूपेंद्र, अमित आदि मौजूद रहे। संवाद
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आचार्य श्री ने कहा कि पाप की मां तृष्णा, लोभ पिता, आशा बेटी और ईर्ष्या पाप की वहन है। अगर अपनी आत्मा को परमात्मा और घर को अच्छा बनाना है तो परिवार से संबंध मत बनाओ, अपने परिवार को देखो यही शौच धर्म है। उन्होंने कहा कि तन की पवित्रता तो बाहर की पवित्रता रहती है सच्ची पवित्रता तो मन की होती है, जो कल्याणकारी रहती है। धर्मसभा का शुभारंभ श्रेष्ठीजनों ने आचार्य विद्यासागर महाराज, आचार्य अभिनंदन सागर महाराज, आचार्य विपुल सागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
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प्रातकाल: आचार्यश्री के सानिध्य में सामयिक प्रतिक्रमण ध्यान श्रावकों द्वारा किया गया, जिसमें ध्यानपूर्वक सम्मेद शिखर तीर्थक्षेत्र की भावपूर्ण वंचना हुई। पुण्यार्जक परिवार ने पूजन के उपरांत भक्तिपूर्वक जैनधर्म के 9वें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक पर निर्वाण लाडू समर्पित किया।
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इधर, अभिनंदनोदय तीर्थ में मुनि सुदत्त सागर महाराज एवं मुनि पदमदत्त सागर महाराज के सानिध्य में श्रावकों ने पर्वराज पर्यूषण पर्व पर प्रभु अभिषेक शांतिधारा की। उन्होंने शौच धर्म को समझाते हुए कहा कि संतोष रूपी जल से अपनी आत्मा को पवित्र कर पावन करने में ही सच्चा सुख है। यह शुचिता का पावन पर्व जीवन में आत्मिक शांति का बोध कराता है। मध्याह्न में तत्वार्थ सूत्र को आचार्य श्री ने श्रावकों को अपने चिंतन द्वारा समझाया।
वहीं, जैन मंदिर आदिनाथ बड़ा मंदिर, चंद्रप्रभु मंदिर डोडाघाट, शांतिनगर मंदिर गांधीनगर, इलाइट जैन मंदिर, सिविल लाइन जैन मंदिर में श्रावकों ने प्रभु की पूजन-अर्चन कर धर्मलाभ लिया। अटामंदिर में धर्मसभा में बह्मचारिणी लवली ने कहा कि संतोष रूपी जल से अपनी आत्मा को पवित्र कर पावन करने में ही सच्चा सुख है। यह शुचिता का पावन पर्व जीवन में आत्मिक शांति का बोध कराता है।
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कर्म व आत्मा को पवित्र करना ही उत्तम शौच धर्म : पंडित दयाचंद
पुलवारा। दशलक्षण महापर्व पर दिगंबर जैन मंदिर में श्रावकों ने विधि-विधान से श्रीजी का सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा व पूजन किया। पंडित दयाचंद शास्त्री ने कहा कि लोभ, लालच का परित्याग और कर्म व आत्मा को पवित्र करना ही उत्तम शौच धर्म है। उन्होंने कहा कि कषाय आदि का त्याग करके जो व्यक्ति निर्लोभी बनता है, वही सही अर्थ में धर्म का पालक है। लोभ कषाय के अभाव पूर्वक आत्मा की शुद्ध परिणति को शौच धर्म कहते हैं। शास्त्रों में शौच धर्म की व्याख्या करते हुए गृहस्थ को परिग्रह परिमाण व्रत व साधुओं को महाव्रत रूप शौच धर्म होता है। अनुयायियों ने उत्तम शौच धर्म को आत्मसात करने का संकल्प लिया। इस मौके पर कोमल चंद्र जैन, राजकुमार जैन, सुरेशचंद्र, संजीव जैन, राकेश जैन, राजीव, आनंद, अक्षय, रूपेंद्र, अमित आदि मौजूद रहे। संवाद