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खीरी में दरकती जा रही हिंदी उन्मेष की परंपरा
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अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल की चार पीढ़ियों से हो रही हिंदी साहित्य साधना
हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए कोई हिंदी सेवी संस्था तक नहीं
लखीमपुर खीरी। हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय स्तर पर जिले को पहचान दिलाने वाले अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल के पुत्र और पौत्र भी हिंदी साहित्य की साधना कर उनकी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि हिंदी साहित्य में इतना बड़ा योगदान देने वाले जिले के अंदर मौजूदा समय में हिंदी को बढ़ावा देने वाली कोई संस्था सक्रिय नहीं है, जो जिले में हिंदी की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सके।
जिले के छोटे से गांव मन्योरा में जन्मे अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल के पिता छेदीलाल शुक्ल अपने समय के जाने माने आशु कवि थे। बंशीधर शुक्ल ने हिंदी काव्य परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि इसे बुलंदियों तक पहुंचाया। अवधी को राष्ट्रीय पहचान दी। अवधी साहित्य में तुलसीदास के बाद बंशीधर शुक्ल का ही नाम लिया जाता है। उनका लिखा गीत ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा’ आजाद हिंद का मार्चिंग सांग बना। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई’...गीत को क्रांतिकारी प्रभातफेरी के दौरान बड़े गर्व से गाते थे। बंधीधर शुक्ल के साहित्य पर देश के कई विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं। यहीं नहीं छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय ने बंशीधर शुक्ल के साहित्य को स्नातक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया।
बंशीधर शुक्ल की रचनाओं का असली मूल्यांकन उनके निधन के बाद हुआ। हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ ने उनकी रचनाओं का संकलन ‘बंशीधर शुक्ल रचनावली’ नाम से प्रकाशित किया। इसके अलावा बंशीधर शुक्ल के परिवारवालों ने राम मडै़या, उठ जाग मुसाफिर भोर भई, और लीडराबाद नाम से काव्य संग्रह का प्रकाशन किया। बंशीधर शुक्ल की रचनाओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनजागरण का काम किया था।
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बंशीधर शुक्ल के पुत्र सत्यधर शुक्ल ने भी अपने पिता की विरासत और परंपरा को नई ऊंचाइयां दी हैं। उन्होंने अवधी और खड़ी बोली में अनेक पुस्तकें लिखीं। उन्हें उनकी संपूर्ण हिंदी साहित्यिक सेवाओं के लिए संस्थान की ओर से साहित्यभूषण पुरस्कार से नवाजा गया। ‘ध्रुव’ महाकाव्य पर उन्हें जायसी पुरस्कार मिला।
चंपा खंड काव्य पर अनुशंसा पुरस्कार और ‘कृष्णा’ महाकाव्य पर जयशंकर प्रसाद पुरस्कार प्राप्त हुआ। सत्यधर शुक्ल के रचना संसार में केवल कविताएं ही नहीं, बल्कि नाटक, कहानी और निबंध भी शामिल हैं। उन्होंने अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली पर भी अपनी कलम चलाई है। फुलबासा की पंचाइति उनका प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।
बंशीधर शुक्ल के पौत्र और सत्यधर शुक्ल के पुत्र गौरव शुक्ल भी अपने परिवार की साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गौरव भी अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उनकी एक पुस्तक ‘आरक्षण बंद करो’ प्रकाशित हो चुकी है जबकि एक काव्य संग्रह स्मृतियों के घेरे में जल्दी ही प्रकाशित होने वाला है। इस तरह बंशीधर शुक्ल की चार पीढ़ियों से हिंदी साधना की परंपरा चली आ रही है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस जिले में हिंदी साधना की ऐसी गौरवशाली परंपरा रही हो वहां मौजूदा समय हिंदी को बढ़ावा देने वाली एक भी संस्था सक्रिय नहीं है, जबकि 15-20 साल पहले तक यहां हिंदी सेवा समिति, हिंदी साहित्य परिषद जैसी संस्थाएं हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए काम कर रहीं थीं। इस समय पं. बंशीधर शुक्ल स्मारक निर्माण एवं साहित्य प्रकाशन समिति और काव्य रंगोली जैसी संस्थाएं छिटपुट काम कर रहीं हैं।
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हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए कोई हिंदी सेवी संस्था तक नहीं
लखीमपुर खीरी। हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय स्तर पर जिले को पहचान दिलाने वाले अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल के पुत्र और पौत्र भी हिंदी साहित्य की साधना कर उनकी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि हिंदी साहित्य में इतना बड़ा योगदान देने वाले जिले के अंदर मौजूदा समय में हिंदी को बढ़ावा देने वाली कोई संस्था सक्रिय नहीं है, जो जिले में हिंदी की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सके।
जिले के छोटे से गांव मन्योरा में जन्मे अवधी सम्राट बंशीधर शुक्ल के पिता छेदीलाल शुक्ल अपने समय के जाने माने आशु कवि थे। बंशीधर शुक्ल ने हिंदी काव्य परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि इसे बुलंदियों तक पहुंचाया। अवधी को राष्ट्रीय पहचान दी। अवधी साहित्य में तुलसीदास के बाद बंशीधर शुक्ल का ही नाम लिया जाता है। उनका लिखा गीत ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा’ आजाद हिंद का मार्चिंग सांग बना। ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई’...गीत को क्रांतिकारी प्रभातफेरी के दौरान बड़े गर्व से गाते थे। बंधीधर शुक्ल के साहित्य पर देश के कई विश्वविद्यालयों में शोध हुए हैं। यहीं नहीं छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय ने बंशीधर शुक्ल के साहित्य को स्नातक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया।
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बंशीधर शुक्ल की रचनाओं का असली मूल्यांकन उनके निधन के बाद हुआ। हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ ने उनकी रचनाओं का संकलन ‘बंशीधर शुक्ल रचनावली’ नाम से प्रकाशित किया। इसके अलावा बंशीधर शुक्ल के परिवारवालों ने राम मडै़या, उठ जाग मुसाफिर भोर भई, और लीडराबाद नाम से काव्य संग्रह का प्रकाशन किया। बंशीधर शुक्ल की रचनाओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनजागरण का काम किया था।
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बंशीधर शुक्ल के पुत्र सत्यधर शुक्ल ने भी अपने पिता की विरासत और परंपरा को नई ऊंचाइयां दी हैं। उन्होंने अवधी और खड़ी बोली में अनेक पुस्तकें लिखीं। उन्हें उनकी संपूर्ण हिंदी साहित्यिक सेवाओं के लिए संस्थान की ओर से साहित्यभूषण पुरस्कार से नवाजा गया। ‘ध्रुव’ महाकाव्य पर उन्हें जायसी पुरस्कार मिला।
चंपा खंड काव्य पर अनुशंसा पुरस्कार और ‘कृष्णा’ महाकाव्य पर जयशंकर प्रसाद पुरस्कार प्राप्त हुआ। सत्यधर शुक्ल के रचना संसार में केवल कविताएं ही नहीं, बल्कि नाटक, कहानी और निबंध भी शामिल हैं। उन्होंने अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली पर भी अपनी कलम चलाई है। फुलबासा की पंचाइति उनका प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।
बंशीधर शुक्ल के पौत्र और सत्यधर शुक्ल के पुत्र गौरव शुक्ल भी अपने परिवार की साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गौरव भी अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उनकी एक पुस्तक ‘आरक्षण बंद करो’ प्रकाशित हो चुकी है जबकि एक काव्य संग्रह स्मृतियों के घेरे में जल्दी ही प्रकाशित होने वाला है। इस तरह बंशीधर शुक्ल की चार पीढ़ियों से हिंदी साधना की परंपरा चली आ रही है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस जिले में हिंदी साधना की ऐसी गौरवशाली परंपरा रही हो वहां मौजूदा समय हिंदी को बढ़ावा देने वाली एक भी संस्था सक्रिय नहीं है, जबकि 15-20 साल पहले तक यहां हिंदी सेवा समिति, हिंदी साहित्य परिषद जैसी संस्थाएं हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए काम कर रहीं थीं। इस समय पं. बंशीधर शुक्ल स्मारक निर्माण एवं साहित्य प्रकाशन समिति और काव्य रंगोली जैसी संस्थाएं छिटपुट काम कर रहीं हैं।